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याकूब की फांसी पर सुप्रीम कोर्ट में अंतिम फैसला आज

मुंबई में 1993 हुए सिलसिलेवार धमाकों में मौत की सजा पाने वाले एकमात्र मुजरिम याकूब अब्दुल रज्जाक मेमन को 30 जुलाई को दी जाने वाली फांसी को लेकर अनिश्चतता बरकरार...

Author July 28, 2015 11:40 AM
शीर्ष अदालत ने 2 जून 2014 को मेमन की मौत की सजा के अनुपालन पर रोक लगा दी थी। (एक्सप्रेस आर्काइव)

मुंबई में 1993 हुए सिलसिलेवार धमाकों में मौत की सजा पाने वाले एकमात्र मुजरिम याकूब अब्दुल रज्जाक मेमन को 30 जुलाई को दी जाने वाली फांसी को लेकर सोमवार को अनिश्चतता बरकरार रही। सुप्रीम कोर्ट ने अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी से इस बाबत कोई फैसला करने से पहले अंतिम न्यायिक विकल्प सुधारात्मक याचिकाओं से संबंधित नियमों पर मंगलवार स्थिति स्पष्ट करने के लिए कहा।

पीठ ने अटार्नी जनरल से कहा कि याकूब मेमन की मौत की सजा पर अमल पर रोक लगाने की अपील पर किसी फैसले से पहले वे सुधारात्मक याचिका के संबंधित नियम और इसके दायरे पर स्थिति स्पष्ट करें। न्यायमूर्ति एआर दवे और न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ के पीठ ने अंतिम विकल्प के तौर पर सुधारात्मक याचिका के खारिज करने की अपनी ही प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए हैरत जताई कि उपलब्ध होने के बावजूद पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करने वाले शीर्ष अदालत के वे जज इस पीठ का हिस्सा क्यों नहीं थे जिसने 21 जून को उसकी सुधारात्मक याचिका को खारिज किया था।

अटार्नी जनरल का विचार था कि सुधारात्मक याचिका 21 जुलाई को खारिज होने के साथ ही दोषी को उपलब्ध सारे कानूनी विकल्प अब खत्म हो चुके हैं जबकि मेमन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन का दावा था कि मेमन की सुधारात्मक याचिका पर गौर करते समय शीर्ष अदालत ने सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया।

रामचंद्रन ने कहा कि सुधारात्मक याचिका लंबित होने के दौरान मौत का फरमान ही जारी नहीं किया गया बल्कि टाडा अदालत ने मेमन को यह बताने का अवसर भी नहीं दिया कि क्या उसने उपलब्ध सारे कानूनी विकल्प अपना लिए हैं।

उन्होंने मेमन को उसे फांसी दिए जाने की की तारीख की जानकारी देने में हुई देरी की भी आलोचना की। इस तारीख के बारे में उसे 13 जुलाई को बताया गया था। उन्होंने कहा कि टाडा न्यायाधीश ने मौत की सजा पर अमल के लिए 90 दिन का नोटिस दिया था लेकिन राज्य सरकार ने सिर्फ 17 दिन का नोटिस दिया। राज्य सरकार का आदेश समय पूर्व है। उन्होंने कहा कि 30 अप्रैल को मौत का फरमान जारी करने के मसले को चुनौती दी गई है जो इस न्यायालय की ओर से प्रतिपादित नियमों के आलोक में पूरी तरह मनमाना है।

मेमन को नेशनल ला यूनिवर्सिटी दिल्ली से संबद्ध डेथ पेनाल्टी लिटीगेशन क्लीनिक से समर्थन मिला। इस संगठन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता टीआर अंद्यारूजिना ने भी मौत के फरमान पर रोक लगाने का अनुरोध करते हुए यही दलील दी। ऐसा लगता था कि न्यायमूर्ति जोसेफ मेमन के वकील से सहमत थे जब उन्होंने कहा कि शायद सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि सुधारात्मक याचिका शीर्ष अदालत के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों के समक्ष जाने के बाद उस पीठ के पास भी जानी चाहिए थी जिसने उसकी मौत की सजा की पुष्टि के मामले में नौ अप्रैल, 2015 को पुनर्विचार याचिका पर अंतिम सुनवाई की थी।

इस मामले की सुनवाई शुरू होते ही अटार्नी जनरल ने कहा कि वे सीबीआइ, महाराष्ट्र सरकार और केंद्र की ओर से पेश हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें मुंबई की टाडा अदालत की ओर से 30 अप्रैल को जारी मौत के फरमान पर रोक की मेमन की अर्जी पर जवाब देने के लिए कुछ वक्त चाहिए। लेकिन यह अहसास होते ही कि पीठ इस मामले की सुनवाई के लिए तैयार है, उन्होंने दलील दी कि इस कैदी को उपलब्ध सारे कानूनी विकल्प खत्म हो चुके हैं। उसकी दया याचिकाओं को राज्यपाल और राष्ट्रपति पहले ही अस्वीकार कर चुके हैं।

न्यायमूर्ति कुरियन ने ऐसे मामलों में दोषी की ओर से राज्यपाल और राष्ट्रपति के दया याचिका दायर करने सहित विभिन्न प्रक्रियाओं के बारे में सवाल उठाए। वे जानना चाहते थे कि रहम की भीख मांगने का क्या चरण है। उन्होंने कहा कि खुले हाथों से रहम की मांग की जा रही है और यह सांविधानिक प्रक्रिया है। न्यायमूर्ति कुरियन ने अटार्नी जनरल के इस कथन से सहमति जताई कि इसका न्यायिक प्रक्रिया से कोई संबंध नहीं है। इस पर न्यायाधीशों ने टिप्पणी की कि आप सारे कानूनी विकल्प खत्म होने के बाद ही रहम की गुजारिश करते हैं।

अटार्नी जनरल जब इस मामले के पूरे घटनाक्रम पर विस्तार से अपनी बात रख रहे थे तो इस दौरान न्यायमूर्ति कुरियन ने सुधारात्मक याचिका के बारे में कई सवाल किए और वे जानना चाहते थे कि सुधारात्मक याचिका की प्रक्रिया क्या होती है। रोहतगी ने जोर देकर कहा कि इस मामले से संबंधित किसी भी पहलू को 21 मार्च, 2013 के मूल फैसले के आलोक में देखना चाहिए। इसी फैसले के अंतर्गत न्यायालय ने मेमन को दोषी ठहराने और मौत की सजा देने के टाडा अदालत के 2007 के फैसले को सही ठहराया था क्योंकि तथ्य तो बदल नहीं सकते। उन्होंने कहा कि दया का सवाल भी न्यायिक प्रक्रिया पर नहीं बल्कि अपराध के तथ्यों पर निर्भर करता है। न्यायमूर्ति दवे ने एक मौके पर कहा कि न्यायालय गुण दोष के सवाल पर अब गौर नहीं कर सकता। इसमें फैसला करने के लिए अब और कुछ नहीं बचा है।

अटार्नी जनरल ने इस मामले में शीर्ष अदालत की कार्यवाही का जिक्र करते हुए कहा कि शीर्ष अदालत में 21 मार्च, 2013 को मौत की सजा की पुष्टि और 30 जुलाई को प्रथम पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद मेमन के भाई ने राष्ट्रपति के पास उसी साल अगस्त के पहले हफ्ते में दया याचिका दायर की क्योंकि उस समय 14 अगस्त को उसे फांसी दी जानी थी। दया याचिका लंबित होने के दौरान उसकी सजा के अमल पर रोक लगा दी गई थी और उसकी याचिका राज्यपाल के पास भेज दी गई जिन्होंने 14 नवंबर, 2013 को इसे अस्वीकार कर दिया था। बाद में राष्ट्रपति ने भी 11 अप्रैल, 2014 को अस्वीकार कर दिया था।

रोहतगी ने कहा कि दया याचिका के निपटारे में विलंब के आधार पर मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील करने संबंधी फैसले के बाद न्यायिक प्रक्रिया का दूसरा दौर शुरू हुआ। इसमें मेमन की दूसरी पुनर्विचार याचिका पर खुली अदालत में सुनवाई हुई जिसमें वह राहत पाने में विफल रहा। अटार्नी जनरल ने कहा कि टाडा अदालत की ओर से 30 अप्रैल को जारी मौत के फरमान की यह पृष्ठभूमि है और इसके बाद ही मेमन ने सुधारात्मक याचिका दायर की जिसे न्यायालय ने 21 जुलाई को अस्वीकार कर दिया।

(भाषा)

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