बांग्लादेश में हिंदू परिवारों पर हमले पर भड़कीं लेखिका तस्लीमा नसरीन, कहा- ‘जिहादिस्तान’ बनता जा रहा बांग्लादेश, मदरसे फैला रहे नफरत

हाल ही में बांग्लादेश दुर्गापूजा के दौरान हिंदू मंदिरों पर हमले किए गए और हमलावरों के एक समूह ने रंगपुर जिले के पीरगंज गांव में हिंदुओं के करीब 29 घरों में आग लगा दी थी।

Bangladesh, Minorities
लेखिका तस्लीमा नसरीन (Indian Express archive photo)

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा और उनके धार्मिक स्थलों पर हमले की घटनाओं पर लेखिका तस्लीमा नसरीन ने गहरी चिंता जताई हैं। उन्होंने हाल ही में दुर्गा पूजा के दौरान हिंदू परिवारों पर हुए हमले पर गहरा रोष जताते हुए सरकार पर तीखी टिप्पणी की हैं। कहा बांग्लादेश “जिहादिस्तान बनता जा रहा है। यहां मदरसे नफरत फैला रहे हैं।” उन्होंने कहा ,”प्रधानमंत्री शेख हसीना को अच्छी तरह पता है कि दुर्गापूजा के समय हमेशा हिंदुओं पर जिहादियों के हमले का खतरा रहता है तो उनकी सुरक्षा के उपाय क्यों नहीं किये गए ?”

कुछ दिन पहले बांग्लादेश के कोमिला इलाके में दुर्गापूजा के एक पंडाल में कथित ईशनिंदा के बाद हिंदू मंदिरों पर हमले किए गए और कोमिला, चांदपुर, चटगांव, कॉक्स बाजार, बंदरबन, मौलवीबाजार, गाजीपुर, फेनी सहित कई जिलों में पुलिस और हमलावरों के बीच संघर्ष हुआ। इस दौरान हमलावरों के एक समूह ने रंगपुर जिले के पीरगंज गांव में हिंदुओं के करीब 29 घरों में आग लगा दी थी। इसके अलावा इस्कान मंदिर पर हमला कर पुजारी की हत्या कर दी गई।

तस्लीमा नसरीन ने कहा कि यह बेहद हैरानी की बात है कि दुर्गा पूजा के दौरान बांग्लादेश की सरकार ने अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा के लिए कदम नहीं उठाए। उन्होंने कहा, ” यही हाल रहा तो अब दहशत के कारण बचे-खुचे हिंदू भी वहां नहीं रहेंगे। सरकार चाहती तो उनकी रक्षा कर सकती थी। यह हिंदू विरोधी मानसिकता चिंताजनक है। विभाजन के समय वहां 30 प्रतिशत अल्पसंख्यक थे, जो अब घटकर नौ प्रतिशत रह गए हैं तथा आने वाले समय में और कम होंगे।”

तसलीमा को 28 साल पहले 1993 में उनके चर्चित उपन्यास ‘लज्जा’ के प्रकाशन के बाद बांग्लादेश से निष्कासित कर दिया गया था। यह उपन्यास भारत में 1992 में हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश में हिंदू विरोधी दंगों की पृष्ठभूमि पर आधारित थी। लेखिका तस्लीमा नसरीन ने कहा कि सरकार सियासी फायदे के लिये मज़हब का इस्तेमाल कर रही है और मदरसे कट्टरपंथी पैदा करने में लगे हैं। कहा, सभी सरकारों ने अपने राजनीतिक लाभ के लिए धर्म का इस्तेमाल किया। उन्होंने इस्लाम को राजधर्म बना दिया, जिससे वहां हिंदुओं और बौद्धों की स्थिति दयनीय हो गई है।

वे बोलीं, “राजनीति को धर्म से अलग रखना जरूरी है। हिंदू दुकानों, घरों या मंदिरों में आग लगाने वाले लोग अकेले दोषी नहीं है। सरकारों ने इतने साल वोट बैंक की राजनीति के लिए उन्हें ऐसा करने का आधार दिया। इस पर रोक लगनी चाहिए। यह अच्छी बात है कि चटगांव में इस हिंसा के विरोध में रैली में इतनी बड़ी तादाद में लोगों ने भाग लिया, जिनमें मुस्लिम भी थे। इसका बड़ा श्रेय सोशल मीडिया को जाता है।”

तसलीमा ने बेशुमार संख्या में मदरसों और मस्जिदों के निर्माण का विरोध करते हुए कहा, “बांग्लादेश में बेवजह इतनी मस्जिद और मदरसे बनाए जा रहे हैं। मजहबी उपदेशों का चलन बढ़ गया है जो अनपढ़ गरीबों को इस्लाम के नाम पर कट्टरपंथी बना रहा हैं। कुरान अरबी में है और हर कोई पढ़ नहीं सकता, लिहाजा ये कट्टरपंथी अपने हिसाब से उसकी व्याख्या करते हैं । ऐसे में जब कुरान की निंदा की अफवाह फैलती है तो ये लोग मारने पर उतारू हो जाते हैं।”

तसलीमा ने कहा, “आप देश को क्या बनाना चाहते हैं ? दूसरा तालिबान ? सारी आर्थिक प्रगति बेकार है अगर दिमाग में ऐसा जहर भरा जा रहा है। इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं है लेकिन वहां इसकी शिक्षा दी ही नहीं जा रही।”

उन्होंने कहा, “मैं पूरे जीवन कट्टरपंथियों के निशाने पर रही क्योंकि मैंने महिलाओं और मानवाधिकार के मसले पर लिखा। मुझे मेरे देश से 28 साल पहले निकाल दिया गया और किसी सरकार ने मुझे दोबारा आने नहीं दिया। लज्जा आज तक वहां प्रतिबंधित है और किसी ने इसका विरोध भी नहीं किया। मुझे बहुत दुख होता है।”

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