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गिरमिटिया और गांधी का साझा रचने वाले गिरिराज का निधन, आज सुबह 10 बजे होगा अंतिम संस्कार

हिंदी साहित्य में गिरिजराज किशोर का लेखन अपना सार प्रस्तुत करते हुए कहता है कि साहित्य सुविधा की चीज नहीं है।

23 मार्च 2007 को साहित्य और शिक्षा के लिए गिरिराज किशोर को पद्मश्री पुरस्कार से विभूषित किया गया।

हिंदुस्तानी माटी का खून-पसीना, औपनिवेशिक शोषण, अहिंसक आंदोलन और इतिहास की बारीकियों के साथ लिखा एक अक्षर दस्तावेज ‘पहला गिरमिटिया’ रचने वाले गिरिराज किशोर का रविवार सुबह कानपुर में उनके आवास पर हृदय गति रुकने से निधन हो गया। वे 83 वर्ष के थे। वे कानपुर में रहते थे। तीन महीने पहले गिरने के कारण उनके कूल्हे में फ्रैक्चर हो गया था जिसके बाद से वे लगातार बीमार चल रहे थे। उन्होंने अपना देहदान किया है। उनका अंतिम संस्कार सोमवार सुबह दस बजे होगा।

हिंदी साहित्य में गिरिजराज किशोर का लेखन अपना सार प्रस्तुत करते हुए कहता है कि साहित्य सुविधा की चीज नहीं है। उसके लिए खुद को तपाना पड़ता है। सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक चेतना से लैस होना होता है। उन्होंने भारत की सांस्कृतिक सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रचाव और विन्यास को पारदर्शी तरीके से समझने की बड़ी चुनौती का सामना किया। इस तरह वे आजाद भारत के संघर्ष का नया सर्ग, अक्षर दस्तावेज तैयार कर पाए। अपने विपुल रचना संसार के बीच उनकी पहचान ‘पहला गिरमिटिया’ से वैसी ही बनी, जैसे विश्व में गांधी से भारत की पहचान बनी। यह उपन्यास गांधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास पर आधारित है।

औपनिवेशिक गुलामी की दास्तां से आगे बढ़कर दलित चेतना पर ‘परिशिष्ट’ और ‘यथाप्रस्तावित’ उपन्यास रचकर साबित करते हैं कि गांधीवादी चेतना के औजार से हाशिए को केंद्र में रचा जा सकता है। ‘ढाई घर’ के बाद तो वे हिंदी समाज में घर-घर के लेखक हो गए। वर्ष 1991 में प्रकाशित इस कृति को 1992 में ही ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित कर दिया गया था।

गिरिराज किशोर का जन्म आठ जुलाई 1937 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फररनगर में हुआ था। उनके पिता जमींदार थे। उन्होंने कम उम्र में ही घर छोड़ दिया और स्वतंत्र लेखन किया। जुलाई 1966 से 1975 तक कानपुर विश्वविद्यालय में सहायक और उपकुलसचिव के पद पर सेवारत रहे तथा दिसंबर 1975 से 1983 तक आइआइटी कानपुर में कुलसचिव पद की जिम्मेदारी संभाली।

उनके कहानी संग्रहों में ‘नीम के फूल’, ‘चार मोती बेआब’, ‘पेपरवेट’, ‘रिश्ता और अन्य कहानियां’, ‘शहर-दर-शहर’, ‘हम प्यार कर लें’, ‘जगत्तारनी’ एवं अन्य कहानियां, ‘वल्द’ ‘रोजी’, और ‘यह देह किसकी है?’ प्रमुख हैं। इसके अलावा, ‘लोग’, ‘चिड़ियाघर’, ‘दो’, ‘इंद्र सुनें’, ‘दावेदार’, ‘तीसरी सत्ता’, ‘यथा प्रस्तावित’, ‘परिशिष्ट’, ‘असलाह’, ‘अंर्तध्वंस’, ‘ढाई घर’, ‘यातनाघर’, उनके कुछ प्रमुख उपन्यास हैं।

महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीकी अनुभव पर आधारित महाकाव्यात्मक उपन्यास ‘पहला गिरमिटिया’ ने उन्हें साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान दिलाई। हिंदी साहित्य में गांधी की चिंता और चिंतन के साथ उनके सत्याग्रही मूल्यों को कथन और कथानक के बीच रचनात्मक स्वीकृति दिलाने वालों में जैनेंद्र कुमार, विष्णु प्रभाकर के बाद गिरिराज किशोर का नाम काफी यशस्वी है। उनके निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर छा गई है।

23 मार्च 2007 को साहित्य और शिक्षा के लिए गिरिराज किशोर को पद्मश्री पुरस्कार से विभूषित किया गया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनके निधन पर कहा- प्रख्यात साहित्यकार, कालजयी रचना ‘पहला गिरमिटिया’ के लेखक, पद्मश्री गिरिराज किशोर जी के देहावसान से साहित्य जगत व संपूर्ण प्रबुद्ध समाज में एक निर्वात उत्पन्न हो गया है। प्रभु श्री राम से प्रार्थना है कि उनकी पुण्य आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान प्रदान करें।

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