ताज़ा खबर
 

भारत दुनिया के 27 फीसद टीबी रोगियों का घर

विश्व टीबी दिवस पर इस बीमारी के खिलाफ लड़ाई छेड़ने के लिए स्वास्थ्य विशेषज्ञ एकजुट हुए और कहा कि दुनिया की कुल आबादी के 17.7 फीसद हिस्से के साथ भारत दुनिया के 27 फीसद तपेदिक (टीबी) रोगियों का घर है। सबसे बड़ी चुनौती अव्यक्त तपेदिक के मामलों की है जो करीब 40 फीसद के आसपास है।

प्रतीकात्मत फोटो

विश्व टीबी दिवस पर इस बीमारी के खिलाफ लड़ाई छेड़ने के लिए स्वास्थ्य विशेषज्ञ एकजुट हुए और कहा कि दुनिया की कुल आबादी के 17.7 फीसद हिस्से के साथ भारत दुनिया के 27 फीसद तपेदिक (टीबी) रोगियों का घर है। सबसे बड़ी चुनौती अव्यक्त तपेदिक के मामलों की है जो करीब 40 फीसद के आसपास है। यह मरीज दूसरों को भी संक्रमित कर देते हैं। पोर्टिया मेडिकल के चिकित्सा निदेशक डॉ एम उदय कुमार मया ने प्रमुख चुनौतियों के बारे में बताया कि भारत में लगभग 40 फीसद आबादी में लेटेंट यानी अव्यक्त टीबी है और इसे ठीक किए बिना टीबी उन्मूलन संभव नहीं। सक्रिय टीबी वो है जो रोगियों के बैक्टीरिया से संक्रमित होता है। औसतन लगभग 10 फीसद अनुपचारित अव्यक्त टीबी के मामले सक्रिय रूप में बदल जाते हैं और यह कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोगों में अधिक होता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) भारत जैसे देशों में केवल सक्रिय टीबी वाले रोगियों के इलाज की सिफारिश करता है, जिसकी अधिक समस्या है। हालांकि, इस बीमारी का उन्मूलन तब तक संभव नहीं हो सकता जब तक कि अव्यक्त टीबी वाले लोगों को भी लक्षित नहीं किया जाता है। वैश्विक स्तर पर भारत में टीबी के साथ-साथ मल्टी-ड्रग-प्रतिरोधी टीबी रोगियों का सबसे अधिक बोझ है। देश को एचआइवी से संबंधित टीबी के सबसे अधिक मामलों की श्रेणी में भी दूसरे स्थान पर रखा गया है। हेल्दी में क्लिनिक एडवाइजरी बोर्ड के प्रमुख डॉ रामानंदा श्रीकांतिया नादिग ने कहा कि तपेदिक के खिलाफ लड़ाई अहम निर्धारकों में से एक है किसी टीबी रोगी का इलाज के बाद पूरी तरह से ठीक होना, क्योंकि कोई भी बचा हुआ बैक्टीरिया संभावित रूप से एक दवा-प्रतिरोधी के रूप में विकसित हो सकता है। टीबी का दवा-प्रतिरोधी या कई दवा-प्रतिरोधी रूप इलाज के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण है और जीवन के नुकसान को रोकने के लिए यह बहुत ही ठोस प्रयासों की मांग करता है। 2015 में 93,000 रोगियों ने दवा प्रतिरोधी टीबी का इलाज कराया। एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारक टीबी क ा सटीक रूप से पहचान करना है क्योंकि ठीक से पहचान ना होने पर मरीज की जान को खतरा हो सकता है।

सही उपाय के बारे में टिप्पणी करते हुए हार्ट केयर फाउंडेशन आॅफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ केके अग्रवाल ने कहा कि बीमारी का मुकाबला करने के अनेक प्रयासों के बावजूद तपेदिक (टीबी) विशेष रूप से भारत में एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल बना हुआ है। इसलिए सभी स्तरों पर ठोस प्रयासों के माध्यम से इस बीमारी के उन्मूलन के लिए की गई प्रतिबद्धता पर कदम बढ़ाना है। टीबी मुक्त भारत के लिए 2025 को समय सीमा के रूप में निर्धारित किया गया है, जो डब्लूएचओ की ओर से निर्धारित वैश्विक समय सीमा से पांच साल आगे है। हालांकि लक्ष्य महत्वाकांक्षी है, लेकिन इसे हासिल करने के लिए भारत को और संसाधन जुटाने होंगे। प्रारंभिक निदान और पूर्ण उपचार टीबी को रोकने और नियंत्रित करने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। प्रत्येक मामले को नोटिफाइ या अधिसूचित करने और जागरूकता के जरिए स्थिति से जुड़े कलंक को दूर करने की आवश्यकता है। सभी उल्लेखनीय रोगों के लिए डीटीआर पर आधारित नजरिया होना चाहिए यानी-डायग्नोज, ट्रीट एंड रिपोर्ट। थूक का उपयोग करके जिंकस्पर्म टेस्ट से इसकी पहचान करनी चाहिए।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 CBDT ने बयान जारी कर ‘येदुरप्पा डायरी’ के पन्नों को बताया संदिग्ध, बढ़ सकती हैं भाजपा की मुश्किलें
2 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक में फर्जीवाड़ा! जावेद अख्तर ने खोली पोल
3 EPFO का दावा- जनवरी में 8.96 लाख लोगों को मिले जॉब, 17 महीने में 76.48 लाख नए रोजगार
IPL 2020 LIVE
X