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संसद की कार्यवाही से हटाया गया पीएम मोदी के भाषण का शब्द, दो साल पहले भी हो चुका ऐसा

संसद की कार्यवाही से प्रधानमंत्री के भाषण के किसी अंश को निकाले जाने की घटना आमतौर पर बहुत ही कम देखने को मिलती है। साल 2018 में भी पीएम मोदी के भाषण से कुछ शब्द कार्यवाही से बाहर किए गए थे, जब उन्होंने कांग्रेस नेता बीके हरिप्रसाद पर तंज कसा था।

Edited By प्रमोद प्रवीण नई दिल्ली | Updated: February 8, 2020 8:58 AM
राज्यसभा में पीएम नरेंद्र मोदी। (फोटो- RSTV स्क्रीनशॉट)

राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बृहस्पतिवार (06 फरवरी) को दिए गए भाषण के एक शब्द को सदन की कार्यवाही से निकाल दिया गया है। राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडू ने पीएम मोदी द्वारा राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई चर्चा के जवाब में दिए गए भाषण में से एक शब्द को कार्यवाही से निकालने की कार्रवाई की है। विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद के भाषण से भी एक शब्द को कार्यवाही से निकाला गया है।

राज्यसभा सचिवालय ने एक बयान में कहा, ‘‘सभापति ने राज्यसभा की 6 फरवरी को शाम 6.20 से 6.30 के बीच कुछ अंश को कार्यवाही से निकालने का निर्देश दिया है।’’प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के संदर्भ में कांग्रेस के रुख बदलने को लेकर टिप्पणी करते हुए यह शब्द कहा था। नायडू ने बृहस्पतिवार को मोदी के भाषण समाप्त करने के बाद नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद द्वारा मांगे गये स्पष्टीकरण के दौरान एक शब्द को भी सदन की कार्यवाही से निकाल दिया है।

संसद की कार्यवाही से प्रधानमंत्री के भाषण के किसी अंश को निकाले जाने की घटना आमतौर पर बहुत ही कम देखने को मिलती है। साल 2018 में भी पीएम मोदी के भाषण से कुछ शब्द कार्यवाही से बाहर किए गए थे, जब उन्होंने कांग्रेस नेता बीके हरिप्रसाद पर तंज कसा था।

साल 2013 में भी तत्कालीन विपक्ष के नेता अरुण जेटली के साथ गरमागरम बहस के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की राज्यसभा में टिप्पणियों से कुछ शब्द को संसदीय कार्यवाही से बाहर कर दिया गया था। जेटली की टिप्पणी से भी कुछ शब्दों को हटाया गया था।
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संसद में असंसदीय शब्दों का एक बड़ा संकलन है। हर साल सूची में नए शब्द जोड़े जाते हैं। हाल ही में पप्पू, बहनोई, दामाद जैसे शब्द भी जोड़े गए हैं। गोडसे या महात्मा गांधी के हत्यारे, नाथूराम गोडसे, भी असंसदीय शब्द हुआ करता था लेकिन 2015 में तत्कालीन लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने इसे अस्वाभाविक शब्दों की सूची से हटा दिया। इस शब्द का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर भाजपा और विपक्ष के बीच गांधीजी पर चर्चा के दौरान किया जाता था।

(भाषा इनपुट्स के साथ)

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