भारतीय संसद और राज्यों की विधान सभा में 33 प्रतिशत सीटों पर महिला आरक्षण लागू करने का मुद्दा इस समय चर्चा में है। मगर यह मुद्दा भारत विभाजन के पहले से उठता रहा है। सरोजिनी नायडू, हंसा मेहता और बेगम एजाज रसूल जैसी नेताओं ने तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत से महिलाओं को आरक्षण दिए जाने की मांग की थी। हालांकि उनकी मांग ब्रिटिश शाmसकों ने उनकी मांग नहीं मानी।
स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़े अन्य अभियानों के चलते महिला आरक्षण पर उस समय ज्यादा चर्चा भी नहीं हो पाई मगर स्वतंत्र भारत के लिए संविधान तैयार करने के लिए संविधान सभा गठित हुई तो उसमें 15 महिलाएं भी शामिल की गईं। इन महिलाओं के नाम थे – अम्मू स्वामीनाथन, दक्षिणायनी वेलायुधन, बेगम एजाज रसूल, दुर्गाबाई देशमुख, हंसा जीवराज मेहता, कमला चौधरी, लीला रॉय, मालती चौधरी, पूर्णिमा बनर्जी, राजकुमारी अमृत कौर, रेणुका राय, सरोजिनी नायडू, सुचेता कृपलानी, विजया लक्ष्मी पंडित और एनी मस्करीन। इनमें दक्षिणायनी वेलायुधन अनुसूचित जाति से थीं।
संविधान सभा में जब महिला आरक्षण पर चर्चा हुई तो उसमें महिला सदस्यों को विशेष रूप से उनका पक्ष रखने का अनुरोध किया गया। हैरत की बात है कि संविधान सभा में शामिल 15 में से 12 महिलाओं ने उन्हें विशेष आरक्षण दिए जाने का समर्थन नहीं किया। इन महिलाओं की दलील थी कि यह ‘विशेष आरक्षण’, ‘समान अवसर’ के सिद्धान्त के खिलाफ है इसलिए वे इसका समर्थन नहीं करतीं।
राजकुमारी अमृत कौर ने संविधान सभा में चर्चा के दौरान कहा, “”हमें किसी भी प्रकार के संरक्षण या विशेष रियायत की आवश्यकता नहीं है। हम केवल समान अवसर और एक ऐसा समान मंच चाहते हैं जहां हम अपनी योग्यता सिद्ध कर सकें। आरक्षण जैसा शब्द हमारी क्षमता पर संदेह पैदा करता है और यह महिलाओं के आत्म-सम्मान के विरुद्ध है।””
हंसा मेहता ने महिलाओं की ओर से संविधान सभा में चार्टर पेश करते समय बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा था, “हमने कभी भी विशेष अधिकारों की मांग नहीं की है। हमने कभी आरक्षित सीटों, अलग निर्वाचक मंडल या सरकारी पदों में कोटे की मांग नहीं की है। हमने केवल सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की मांग की है।”
बेगम एजाज रसूल ने धर्म और लिंग आधारित, दोनों तरह के आरक्षण का विरोध किया था। उनका मुख्य तर्क था, “आरक्षण समुदायों और वर्गों के बीच दूरियां पैदा करता है। हमें एक ऐसी प्रणाली विकसित करनी चाहिए जहां प्रतिभा और राष्ट्र के प्रति समर्पण ही चुनाव का एकमात्र आधार हो।”
अनुसूचित वर्ग से आने वाली दक्षायणी वेलायुधन ने सामाजिक न्याय और जातिगत भेदभाव के संदर्भ में आरक्षण की आवश्यकता का समर्थन किया था। सुचेता कृपलानी ने महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया लेकिन आरक्षण के मुद्दे पर वे तटस्थ बनी रहीं।
संविधान सभा की 15 महिला सदस्यों में से अधिकांश द्वारा महिला आरक्षण को खारिज करने के कारण संविधान में इसकी व्यवस्था नहीं हो सकी। भारत का संविधान पूरी तरह तैयार होकर 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ तो उसमें एससी (SC) और एसटी (ST) के लिए तो राजनीतिक आरक्षण का प्रावधान था लेकिन महिलाओं के लिए कोई विशेष कोटा नहीं रखा गया था।
महिला आरक्षण का मुद्दा फिर उठा
भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के आकस्मिक निधन के बाद इंदिरा गांधी 1966 में देश की तीसरी और पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। एक महिला के प्रधानमंत्री बनने के बावजूद संसद और विधान सभा में महिला आरक्षण की कोई औपचारिक पहल नहीं हुई।
राजनीति में महिला आरक्षण देने का मुद्दा दुबारा राजीव गांधी सरकार के दौरान उभरा। राजीव सरकार ने 1989 में ग्राम पंचायतों में महिला आरक्षण लागू करने का प्रस्ताव पेश किया जो राज्यसभा में पारित नहीं हो सका।
पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार ने 1992 में 73वें और 74वें संविधान संशोधन के जरिए स्थानीय निकायों और ग्राम पंचायतों में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव पारित किया।
इसके बाद संसद और विधानसभाओं में आरक्षण की मांग तेज हुई। 1996 में देवगौड़ा सरकार ने महिला आरक्षण बिल पेश किया, लेकिन विरोध के चलते पास नहीं हो सका। वाजपेयी सरकार (1998–2003) और मनमोहन सिंह सरकार में साल 2010 में यह राज्यसभा से पारित हो गया, लेकिन यह लोकसभा में अटक गया।
लंबे अंतराल के बाद 2023 में मोदी सरकार ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पारित किया, जिसमें लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है। हालांकि, इसे लागू करने के लिए जनगणना और परिसीमन की शर्तों के कारण अभी तक अमल नहीं हो सका, जिससे यह मुद्दा अब भी लंबित बना हुआ है।
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