40 साल की बाजूबाई धोमा वडवी नंदुरबार जिले के खड़कपानी गांव के वडवी पाड़ा नाम की पहाड़ी बस्ती में रहती हैं। यहां की महिलाएं और लड़कियां कई वर्षों से हर दिन करीब तीन किलोमीटर का सफर तय कर पानी लेने जाती हैं और फिर सिर पर 7 से 10 किलो वजन वाले स्टील के बर्तनों में पानी ढोकर लाती रही हैं। हालांकि, पिछले पांच दिनों से इस बस्ती में सुबह 9 से 10 बजे के बीच पानी का टैंकर पहुंच रहा है जिससे महिलाओं को रोजाना की इस कठिन यात्रा से राहत मिली है। बाजूबाई कहती हैं, ”हम बचपन से ही पानी लाने के इतने आदी हो चुके हैं कि अब अगर पानी लेने न जाना पड़े तो अजीब सा लगता है।”

इंडियन एक्सप्रेस में छपी न्यूज़ रिपोर्ट के बाद पानी के ये टैंकर यहां पहुंचने लगे हैं। जिला कलेक्टर मिताली सेठी ने पुष्टि की कि यह पहल केंद्र सरकार के जल शक्ति मंत्रालय और राज्य सरकार के बीच हुई चर्चा के बाद शुरू हुई। यह मामला तब सामने आया जब इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट केंद्र सरकार के संज्ञान में आई।

मिताली सेठी ने कहा, ”न्यूज़ रिपोर्ट के बाद जल शक्ति मंत्रालय की एक टीम ने पिछले सप्ताह राज्य सरकार के साथ बैठक कर स्थिति का आकलन किया और जल संकट से निपटने के लिए तत्काल उठाए जा सकने वाले कदमों पर चर्चा की। साथ ही, जिले में लंबे समय तक जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हम राज्य सरकार को एक विस्तृत प्रस्ताव भी भेजने की तैयारी कर रहे हैं।”

बाजूबाई ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, ”यह महसूस करना कि अब पानी हमारे पास आ रहा है, किसी सपने जैसा लगता है। पिछले चार दिनों से हमें पानी के लिए वह लंबा और कठिन सफर तय नहीं करना पड़ा है। हम उम्मीद करते हैं कि यह राहत हमेशा बनी रहे और हमें दोबारा उस परेशानी का सामना न करना पड़े।”

2 जून को पब्लिश हुई रिोर्ट रिपोर्ट ‘लॉन्ग वॉक फॉर वॉटर: हाउ स्कैरसिटी इज ब्रेकिंग वीमेन इन महाराष्ट्र्स ट्राइबल बेल्ट’ में उन कठिन परिस्थितियों को उजागर किया गया था जिनका सामना यहां की महिलाएं वर्षों से कर रही हैं। रिपोर्ट में बताया गया था कि मुश्किल रास्तों पर सिर पर भरे हुए पानी के बर्तन ढोने के कारण महिलाओं में गर्भाशय बाहर निकलने (यूटरिन प्रोलैप्स), गर्भपात, लगातार रहने वाले मांसपेशियों और हड्डियों के दर्द समेत कई स्त्री रोग संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं। डॉक्टरों ने भी इन स्वास्थ्य समस्याओं को पानी ढोने के भारी बोझ से जोड़कर देखा था।

वडवी पाड़ा की महिलाओं ने बताया कि रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद सरकारी अधिकारी बस्ती में पहुंचे। उन्होंने महिलाओं की स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के बारे में जानकारी ली और उस रास्ते का भी निरीक्षण किया जिस पर चलकर महिलाएं रोज पानी लाने जाती थीं।

Water shortage
वर्षों से पानी के लिए 3 किमी पैदल चल रहे थे ग्रामीण

ग्रामीणों के लिए पानी के टैंकर का पहुंचना दशकों से अनदेखी की जा रही समस्या की आखिरकार सुनवाई होने जैसा है। 48 वर्षीय जेठूबाई जोमा वालवी ने कहा, ”यह किसी सपने के सच होने जैसा लग रहा है। पिछले चार दिनों से हमारे गांव में पानी का टैंकर आ रहा है। ऐसा महसूस होता है मानो भगवान खुद हमारी तकलीफ दूर करने के लिए यहां आ गए हों।”

खड़कपानी की सरपंच टिंकाबाई ईश्वर ने कहा कि पानी के टैंकरों की व्यवस्था राहत तो दे रही है लेकिन अभी यह पर्याप्त नहीं है। उन्होंने बताया, ”खड़कपानी गांव में वडवी पाड़ा, पाटिल पाड़ा और पडवी पाड़ा सहित तीन बस्तियां हैं। फिलहाल गांव में एक या दो टैंकर भेजे जा रहे हैं लेकिन तीनों बस्तियों की जरूरतों को पूरा करने के लिए यह पर्याप्त नहीं है। हमने हर एक बस्ती के लिए एक-एक टैंकर यानी कुल तीन टैंकरों की मांग की है। इसके अलावा पाइपलाइन के जरिए जलापूर्ति और एक नए बोरवेल बनाने की भी मांग की गई है। ये शुरुआती कदम हैं लेकिन इससे उम्मीद जगी है कि लंबे समय से चली आ रही पानी की समस्या का स्थायी समाधान मिल सकता है।”

हालांकि, ग्रामीणों का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में अभी भी कई चुनौतियां बनी हुई हैं। आमतौर पर टैंकर गांव में करीब 30 मिनट तक ही रुकता है जिससे सभी परिवारों को पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता। पानी की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

ग्रामीण महिला ममता ने कहा, ”टैंकर से मिलने वाला पानी मददगार जरूर है लेकिन यह सभी लोगों की जरूरतों के लिए पर्याप्त नहीं है। यह पानी बोरवेल से लाया जाता है, इसलिए पीने से पहले हमें इसे छानना पड़ता है। हमारी जरूरत है कि पीने के लिए साफ और सुरक्षित पानी अलग उपलब्ध कराया जाए जबकि नहाने और घरेलू कामकाज के लिए अलग पानी की व्यवस्था हो।”

नंदुरबार के आदिवासी समुदायों के साथ दो दशकों से काम कर रहीं सामाजिक कार्यकर्ता निर्मला वसावे का मानना है कि पानी के टैंकरों की व्यवस्था को केवल अस्थायी राहत के तौर पर देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, ”टैंकरों के जरिए जो पानी उपलब्ध कराया जा रहा है, वह बोरवेल से आता है और पूरी तरह पीने योग्य नहीं है। लोगों को साफ और फिल्टर किया हुआ पेयजल उपलब्ध कराया जाना चाहिए जबकि घरेलू उपयोग के लिए पानी के अलग सोर्स की व्यवस्था होनी चाहिए।”

निर्मला वसावे ने बताया कि कई सालों से जिला और राज्य प्रशासन को कई सुझाव दिए गए हैं जिनमें छोटे चेक डैमों का निर्माण, वर्षा जल संचयन (रेनवॉटर हार्वेस्टिंग) की व्यवस्था और भूजल पुनर्भरण (ग्राउंडवॉटर रिचार्ज) परियोजनाएं शामिल हैं। हालांकि, अब तक इन प्रस्तावों पर बहुत कम काम हो सका है। उनके अनुसार, जल संकट का स्थायी समाधान तभी संभव है जब दीर्घकालिक और टिकाऊ जल प्रबंधन योजनाओं को जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।

maharashtra village water crisis
खबर छपी तो हरकत में आया प्रशासन, पहुंचने लगा पानी का टैंकर

इस मामले पर प्रशासन का कहना है कि तत्काल राहत के साथ-साथ दीर्घकालिक समाधान पर भी काम किया जा रहा है। ‘मिशन जल बंधु’ के तहत जल-संकटग्रस्त गांवों में भूजल संरक्षण के काम किए जा रहे हैं और मॉनसून से पहले जलाशयों की गाद निकासी (डीसिल्टिंग) का काम चल रहा है। जिन गांवों में पाइपलाइन के जरिए पानी की सप्लाई पहुंचने में ज्यादा समय लग सकता है, वहां पानी के स्टोरेज वाले बड़े ड्रम वितरित किए जा रहे हैं।

इसके अलावा, गांवों को जोड़ने वाली सड़कों के निर्माण और सुधार का काम भी इसी वर्ष शुरू होने की उम्मीद है। जिला प्रशासन ने सड़क संपर्क को लेकर एक व्यापक योजना तैयार कर जनजातीय विकास विभाग को भेजी है।

जिला कलेक्टर मिताली सेठी ने कहा, ”हम यह दावा नहीं कर सकते कि समस्या पूरी तरह हल हो गई है क्योंकि यह दशकों पुरानी चुनौती है। लेकिन हम एक साथ कई स्तरों पर काम कर रहे हैं ताकि लोगों को राहत मिल सके और स्थायी समाधान विकसित किया जा सके।”

जिला प्रशासन के अनुसार, वर्तमान में सरकारी टैंकर अक्कलकुवा तालुका के चार गांवों- खड़कपानी, मोलगी, छोटे उदेपुर और पिंपलखुटा और धड़गांव तालुका के नौ गांवों- बिलगांव, सवायदिगर, सिंदीदिगर, पडली, गोर्या, राडीकलम, काकरदे, नवे तोरणमाल और पिंपलबारी में पानी की आपूर्ति कर रहे हैं।

62 वर्ष की लीलाबाई देवला ने कहा, ”इतने सालों तक किसी ने हमारी परेशानी नहीं सुनी। मुझे खुशी है कि अब शायद छोटी बच्चियों को वह दर्द और संघर्ष नहीं झेलना पड़ेगा जो हमने पूरी जिंदगी सहा है। मैं उम्मीद करती हूं कि उन्हें गर्भपात, गर्भाशय बाहर निकलने जैसी समस्याओं और अन्य स्वास्थ्य परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा जिनसे हमारी पीढ़ी की कई महिलाएं प्रभावित हुई हैं।”