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खतरा बनते हिमनद

वैश्विक तापमान में दो डिग्री सेल्सियस की वृद्धि के साथ लगभग सत्तर फीसद छोटे हिमनद भी पिघल जाएंगे। घटते हिमनदों के कारण हिमालय क्षेत्र में झीलें बनती जा रही हैं। 2005 में अकेले उत्तराखंड में लगभग एक सौ सत्ताईस ऐसी हिमनद झीलों को सूचीबद्ध किया गया था। अब इनकी संख्या बढ़ कर चार सौ हो गई है।

सांकेतिक फाेटो।

वेंकटेश दत्ता
हाल के वर्षों के आंकड़े देखें तो पता चलता है कि भारत में अचानक बाढ़ की घटनाएं बढ़ रही हैं। हिमाचल प्रदेश में पिछले हफ्ते अचानक आई बाढ़ ने भविष्य के उन खतरों के बारे में फिर चेता दिया है जो आने वाले वर्षों में बादल फटने, हिमस्खलन, झीलों के फटने और जमीन धंसने जैसी पर्यावरणीय घटनाओं से हिमालयी राज्यों को परेशान करने वाले हैं। हमने 2013 में उत्तराखंड में देख चुके हैं कि प्रकृति अगर अपनी पर आ जाए तो किस तरह से बड़ी आपदाएं तबाही मचा सकती हैं। लेकिन क्या ऐसी प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और क्षति को कम करना संभव है? हालांकि पूरी तरह से तो प्राकृतिक घटनाओं को रोक पाना संभव नहीं है, पर मानव द्वारा ऐसी विनाशकारी घटनाओं के खतरों को कम करने के लिए कुछ उपाय तो किए ही जा सकते हैं।

पिछले साल उत्तराखंड के चमोली जिले में हिमनदों का फटना पारिस्थितिकीय असंतुलन का बड़ा उदाहरण है। ऐसी घटनाएं मानवीय गतिविधियों के कारण ज्यादा हो रही हैं। हिमालय पर्वत श्रृंखला एक अस्थिर श्रृंखला है। चट्टानों के समायोजन में थोड़ा-सा भी परिवर्तन विनाशकारी भूस्खलन का कारण बन सकता है। इन कारकों के बावजूद संवेदनशील हिमालयी पट्टी में बार-बार विस्फोट, पत्थर उत्खनन, निर्माण, सुरंगों की खुदाई और बांधों का निर्माण जैसी गतिविधियां बदस्तूर जारी हैं। उत्तराखंड के चमोली जिले में इस साल सात फरवरी को अचानक आई बाढ़ में सत्तर सा ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी और कम से कम दो सौ लोग लापता हो गए थे।

बड़े पैमाने पर बर्फ और चट्टानें ऊपर से बहते हुए कई किलोमीटर नीचे चले आए थे। इस बाढ़ ने ऋषिगंगा बिजली संयंत्र और पांच सौ बीस मेगावाट की तपोवन-विष्णुगढ़ पनबिजली परियोजना को तबाह कर डाला था। दरअसल अनियोजित विकास के कारण हमने हिमालय जैसे संवेदनशील इलाकों में कई प्राकृतिक नालों और नदियों पर बड़े पैमाने पर निर्माण कर लिए हैं। इससे नदियों का रास्ता रुकता गया और उनके प्रवाह पर असर पड़ने लगा। हाल में हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में यही हुआ। भारी बारिश के कारण कांगड़ा जिले के ऊपरी धर्मशाला में बाढ़ आ गई। अचानक आई इस बाढ़ में खड़ी कारें बहने लगी और कई मकान ढह गए।

दरअसल भारत जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहा है। औसत वैश्विक तापमान में वृद्धि के साथ-साथ बारिश में भी बदलाव दिख रहा है। पिछले कुछ सालों में ऐसी चिंताजनक प्रवृत्ति विकसित हो गई है जिसमें विस्तारित अवधि के लिए बारिश नहीं होती और फिर अचानक से अत्यधिक बारिश हो जाती है। कई जगहों पर बादल फट रहे हैं। बिजली गिरने की घटनाएं बढ़ रही हैं। अचानक बारिश से बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाएं भी तेजी से बढ़ी हैं। इससे जानमाल का नुकसान तो होता ही है, कृषि भूमि को काफी नुकसान पहुंचता है। उपग्रह से प्राप्त चित्रों से पता चलता है कि हिमनद झीलों के निर्माण में वृद्धि के साथ-साथ अचानक बाढ़ का खतरा भी बढ़ रहा है।

हिमाचल प्रदेश में बारिश ने जो कहर बरपाया, वह प्रकृति के नाराज होने का प्रमाण है। जलवायु परिवर्तन आकलन रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक तापमान में वृद्धि से इक्कीसवीं सदी के अंत तक यानी 2071 से 2100 के बीच भारत में बाढ़ की घटनाओं में भयानक रूप से तेजी आएगी। हिमालयी पट्टी में 2.6 डिग्री सेल्सियस तक तापमान में वृद्धि का अनुमान है। 2030 तक गर्मी की तीव्रता में दो से बारह प्रतिशत की वृद्धि होने की संभावना है। इससे अचानक बाढ़ की घटनाएं बढ़ेंगी, बाढ़ से जगह-जगह जमीन धंसने का भी खतरा बढ़ेगा। कुल मिला कर इन सारी प्राकृतिक आपदाओं का असर कृषि पर पड़ता है, जिससे खाद्य सुरक्षा को खतरा पैदा होता है।

ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर ग्लेशियर ताजे पानी का सबसे बड़ा स्रोत होते हैं। हिमालयी क्षेत्र में हिमपात और हिमनद पूरे उपमहाद्वीप में विभिन्न नदियों के लिए पानी के बड़े स्रोत हैं। ये स्रोत ब्रह्मपुत्र, सिंधु और गंगा जैसी नदियों में पानी के सतत प्रवाह को बनाए रखते हैं। एक अरब से अधिक लोगों का जीवन इन नदियों पर ही निर्भर है। वैश्विक तापमान में वृद्धि के साथ, हिमालय के ग्लेशियर द्रव्यमान और सतह क्षेत्र दोनों में लगातार कम हो रहे हैं। हिमनदों के सिकुड़ने का पता उस छोटे हिमयुग के समय से भी लगाया जा सकता है जो लगभग सात सौ साल पहले शुरू हुआ था। तब से दुनिया वैश्विक तापमान में अभूतपूर्व वृद्धि देख रही है। ग्रीन हाउस गैसों के बढ़ते स्तर से बीसवीं शताब्दी में तापमान में वृद्धि और तेजी से हुई।

1980 के दशक के बाद से तापमान ग्राफ तेजी से बढ़ा। अध्ययन बताते हैं कि 1850 से 2070 तक वैश्विक तापमान में दो डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से बड़े और मध्यम आकार के पैंतालीस प्रतिशत हिमनद गायब हो जाएंगे। यह भी अनुमान है कि वैश्विक तापमान में दो डिग्री सेल्सियस की वृद्धि के साथ लगभग सत्तर प्रतिशत छोटे हिमनद भी पिघल जाएंगे। घटते हिमनदों के कारण हिमालय क्षेत्र में झीलें बनती जा रही हैं। 2005 में अकेले उत्तराखंड में लगभग एक सौ सत्ताईस ऐसी हिमनद झीलों को सूचीबद्ध किया गया था। अब इनकी संख्या बढ़ कर चार सौ हो गई है। यानी डेढ़ दशक में ढाई गुना हिमनद झीलें बन गईं। ऊंचाई पर बनने वाली ये झीलें हर वक्त बड़ा खतरा लिए होती हैं, क्योंकि झील के फटने की स्थिति में अचानक बाढ़ आने से कोई नहीं रोक सकता।

हिमनद झीलों से उत्पन्न जोखिमों का समुचित प्रबंधन करने के लिए सबसे पहले इनके निर्माण के बारे में नियमित और सक्रिय रूप से अध्ययन होने चाहिए। वैज्ञानिकों को इन पर सतत निगरानी रखने की जरूरत है। कुछ हिमनदों पर अध्ययन पहले से चल रहा है। लेकिन भारत में हिमनदों का अध्ययन अभी सुव्यवस्थित रूप नहीं ले पाया है। जरूरत इस बात की है कि भारत में हिमनदों का एक समेकित मूल्यांकन किया जाए, जिससे उनमें हर साल होने वाले बदलावों की निगरानी की जा सके। इसके लिए संबंधित राज्य सरकारों को अग्रणी भूमिका निभानी होगी।

यदि हिमनदों को नियमित जांच के दायरे में रखा जाता है, तो इससे उन झीलों को पहचानना आसान हो जाएगा जिनके जल्द ही खतरनाक रूप ले लेने की संभावना है। ऐसे कई उदाहरण हैं जब भू-तकनीक और संरचनात्मक उपायों को लागू कर हिमनद झीलों से होने वाले खतरों को कम करने में कामयाबी मिली है। ऐसी झीलों से धीरे-धीरे पानी की निकासी के लिए चैनल बनाए जाते हैं। इससे झीलों पर दबाव कम होने लगता है और उनके फटने का खतरा कम हो जाता है। इतना ही नहीं, इस तरह के उपाय अचानक बाढ़ में बहने वाले पानी की मात्रा को भी कम कर देते हैं।

इसके अलावा हिमनद झीलों पर खतरे की सूचना देने वाली प्रणाली भी लगाई जा सकती है जो पानी के अचानक और ज्यादा बहाव की स्थिति में मानव बस्तियों को तुरंत सचेत कर दें। किसी भी महत्त्वपूर्ण परियोजना को शुरू करने से पहले हर पर्यावरणीय आकलन में हिमनदों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, बांध निर्माण से पहले पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट में उस क्षेत्र के हिमनदों के लिए बांध के संभावित खतरों को शामिल करना चाहिए। आकलन रिपोर्ट में पूरे जलग्रहण क्षेत्र पर ध्यान देना चाहिए। यदि एहतियाती उपायों को गंभीरता से नहीं लिया जाता है और बेतरतीब विकास मॉडल को चुनौती नहीं दी जाती हैं, तो वह समय दूर नहीं है जब हमारा जीवन उन हॉलीवुड फिल्मों के दृश्य को प्रतिबिंबित करेगा, जिनमें अंत में पृथ्वी को खत्म होते हुए दिखाया जाता है।

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