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1971 की जंग लड़ने वाले रिटायर्ड विंग कमांडर का दावा- पाकिस्तान पर जीत के बाद इंदिरा सरकार ने घटा दी थी सैनिकों की पेंशन

रिटायर्ड विंग कमांडर कुलदीप शिवा के अनुसार युद्धबंदी पाकिस्तानी सूबेदार ने जनरल सैम मानेकशॉ से मिलने के बाद कहा कि मुझे अब पता चल गया है कि भारतीय फौज ने पाकिस्तानी फौज कैसे हराया।

surrender of pakistani army in 1971 war1971 के युद्ध के बाद भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण करती पाकिस्तानी सेना। ((Source: Indian Defense Ministry/Associated Press))

भारत ने 1971 के युद्ध में पाकिस्तान को जिस तरह शिकस्त दी उसकी कहानियां आज भी सुनी-सुनायी जाती हैं। लेकिन युद्ध जीतने के बाद भारत सरकार ने सैनिकों को मिलने वाली पेंशन कम कर दी थी। ये दावा किया है 31 सालों तक भारतीय वायु सेना की सेवा करने के बाद रिटायर होने वाले विंग कमांडर (रिटार्यड) कुलदीप शिवा ने। समाचार वेबसाइट रेडिफ से विशेष बातचीत में कुलदीप शिवा ने बताया है कि वो जून 1971 में वायु सेना में शामिल हुए थे। उस समय उनकी उम्र  21 साल थी और हंटर लड़ाकू विमान उड़ाते थे। शिवा ने वेबसाइट को युद्ध के दौरान अपने अनुभवों के साथ ही उस युद्ध का नेतृत्व कर रहे भारतीय सैन्य प्रमुख  सैम मानेकशॉ से जुड़ी यादें भी साझा की हैं। शिवा ने युद्ध के बाद तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार द्वारा सैनिकों की पेंशन कम किए जाने की भी बात कही है। 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध तीन दिसंबर से 16 दिसंबर तक चला था।

फील्ड मार्शल सैम होरमुसजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ का जन्म तीन अप्रैल 1914 को हुआ था। उनका देहांत 27 जून 2008 को हुआ था। उन्हें उनकी बहादुरी के कारण “सैम बहादुर” कहा जाता था। वो पहले भारतीय सैनिक थे जिसे फील्ड मार्शल बनाया गया था। मानेकशॉ ने दूसरे विश्व युद्ध में ब्रिटिश इंडियन आर्मी के अधिकारी के तौर पर भाग लिया था। अपने चार दशक लम्बे सैन्य जीवन में मानेकशॉ ने पांच युद्धों में हिस्सा लिया था। मानेकशॉ आठ जून 1969 में भारतीय सेना के प्रमुख बनाए गए। मानेकशॉ को जून 1972 में रिटायर होना था लेकिन इंदिरा गांधी सरकार ने उनका कार्यकला छह महीने के लिए बढ़ा दिया और  वो 15 जनवरी 1973 को रिटायर हुए थे।

शिवा ने सैम मानेकशॉ की तारीफ करते हुए उन्हें अतुलनीय नेता बताया। शिवा इस बात के लिए भी मानेकशॉ के अंदर इतना साहस था कि वो प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को कह सके कि भारतीय सेना अप्रैल-मई में हमला नहीं कर सकती। वो बहुत ही भद्र और हंसमुख नेता थे। उनका सभी स्वाभाविक तौर पर सम्मान करते थे। शिवा बताते हैं कि उन्होंने एक बार मानेकशॉ को कहते सुना था, “ये मूंछ देखते हो, मूंछ नीची नहीं होनी चाहिए।”

field marshal sam manekshaw सैम मानकेशा पहले भारतीय थे जिसे फील्ड मार्शल की उपाधि मिली थी।

युद्ध के बाद मानेकशॉ मेरठ स्थित युद्धबंदी कैंप गए थे। एक पाकिस्तानी सूबेदार ने उन्हें सलाम किया। जनरल मानेकशॉ ने उससे कैंप देखने की इजाजत मांगी। वो शौचालय गए और सफाईकर्मी से हाथ मिलाया।  उन्होंने सैनिकों से पूछा कि उनके बिस्तर में खटमल या मच्छर तो नहीं हैं। उन्होंने बंदियों को मिलने वाले खाने के बारे में भी पूछताछ की। शिवा के अनुसार जब मानेकशॉ कैंप से जाने लगे तो सूबेदार ने उनसे कहा कि हमें अब पता चला कि हिन्दुस्तानी फौज ने पाकिस्तानी फौज को कैसे हराया। यहां सेना प्रमुख जवानों को देखने आ रहे हैं और वहां पलटन के अफसर भी नजर नहीं आते।

शिवा को इस बात का मलाल है कि जनरल मानेकशॉ के रिटायर होने के तीन महीने बाद ही तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने पूर्व सैनिकों को मिलने वाली पेंशन उनके वेतन का 50 प्रतिशत कर दी, जबकि पहले सैनिकों उनके वेतन का 70 प्रतिशत पेंशन के तौर पर मिलता था। हालांकि जब वेतन का 70 प्रतिशत पेंशन की तौर पर मिलता था तब सैनिकों की रिटायरमेंट की उम्र भी कम थी।  शिवा के अनुसार इंदिरा गांधी ने सैनिकों के उलट नागरिक सेवा वालों की पेंशन वेतन के 30 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत की थी। शिवा लिखते हैं, “इंदिरा गांधी ने मानेकशॉ को रिटायरमेंट के बाद पाकिस्तान पर जीत दिलाने का इस तरह इनाम दिया।”

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