महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर से सियासी हलचल तेज है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) फिर से राजनीतिक संकट के दौर से गुजरती हुई नजर आ रही है। खबरों में कहा जा रहा है कि पार्टी के कई सांसद उद्धव का साथ छोड़ सकते हैं। इन्हीं विद्रोह की खबरों के बीच उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) ने अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर उनसे संसद में पार्टी के किसी भी अलग हुए गुट को मान्यता न देने का आग्रह किया है। जिसमें यह तर्क दिया गया है कि संविधान अब किसी राजनीतिक दल में “विभाजन” को कानूनी मान्यता प्रदान नहीं करता है।

इस कदम को शिवसेना (यूबीटी) द्वारा 2022 के एकनाथ शिंदे जैसे विद्रोह की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए एक पूर्व-नियोजित प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। इससे पहले कि बागी सांसद सदन में मान्यता प्राप्त करने के लिए औपचारिक रूप से अध्यक्ष से संपर्क करें। यह ऐसे समय में हो रहा है जब बागी सांसद दिल्ली में हैं और संभवतः अध्यक्ष से मिलेंगे।

पार्टी की ओर से भेजे गए एक विस्तृत पत्र में शिवसेना (यूबीटी) संसदीय दल के नेता अरविंद सावंत ने कहा कि ऐसी खबरें सामने आई हैं कि पार्टी के चिन्ह पर चुने गए कुछ सांसद या तो लोकसभा अध्यक्ष से एक अलग समूह के रूप में मान्यता प्राप्त करने या किसी अन्य राजनीतिक दल के साथ विलय करने की योजना बना रहे हैं, या पहले ही उनसे संपर्क कर चुके हैं।

इन रिपोर्टों का हवाला देते हुए सावंत ने कहा कि इस तरह के किसी भी कदम को संवैधानिक समर्थन प्राप्त नहीं होगा। उन्होंने पत्र में कहा कि शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) एक राजनीतिक दल है और कानून की नजर में भी एक ही दल रहेगा।

यह घटनाक्रम शिवसेना (यूबीटी) में एक और दरार पैदा करने के प्रयासों को लेकर बढ़ती राजनीतिक अटकलों के बीच आया है। लगभग चार साल बाद जब शिंदे जून 2022 में विधायकों के साथ पार्टी छोड़कर चले गए थे, जिससे अविभाजित शिवसेना में विभाजन हुआ और अंततः चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को आधिकारिक शिवसेना के रूप में मान्यता दी। इसी बीच, पार्टी ने अपने सांसदों को गुरुवार को संसदीय दल की बैठक में भाग लेने के लिए व्हिप जारी किया।

सिर्फ संख्याएं ही मायने नहीं रखतीं- सावंत

सावंत ने तर्क दिया कि 2003 में 91वें संवैधानिक संशोधन के बाद, दल-बदल विरोधी कानून अब किसी राजनीतिक दल में विभाजन को मान्यता नहीं देता है, जिससे उन विधायकों को मिलने वाली सुरक्षा समाप्त हो गई है जो पहले अपनी मूल पार्टी से अलग हो जाते थे। उन्होंने कहा कि विभाजन को पहले जो संवैधानिक मान्यता प्राप्त थी, वह अब नहीं रही।

शिवसेना (यूबीटी) नेता ने कहा कि किसी पार्टी के चुनाव चिह्न पर जीतकर संसद पहुंचने वाले सांसदों की वैधता और अधिकार मूल राजनीतिक दल से आते हैं। सिर्फ अलग होकर नया संसदीय समूह बना लेने से वे स्वतंत्र रूप से वैधता का दावा नहीं कर सकते।

सावंत ने 2023 के महाराष्ट्र राजनीतिक संकट में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अदालत ने स्पष्ट रूप से विधायिका विंग पर राजनीतिक दल की सर्वोच्चता को बरकरार रखा था। उन्होंने आगे कहा कि यह फैसला स्पष्ट रूप से विधायिका दल पर राजनीतिक दल की सर्वोच्चता की पुष्टि करता है। विधायिका दल के पास राजनीतिक दल से अलग कोई स्वतंत्र अधिकार स्रोत नहीं है।

सावंत ने तर्क दिया कि सांसद केवल संसद में अपनी संख्या के कारण अपने मूल संगठन से अलग होकर स्वतंत्र रूप से अधिकार का दावा नहीं कर सकते। सावंत ने इस व्याख्या को भी खारिज कर दिया कि दो-तिहाई सांसदों के समर्थन से अलग हुआ दल स्वतः ही दलबदल विरोधी प्रावधानों के तहत संरक्षण की मांग कर सकता है।

पत्र में कहा गया है, “सार्वजनिक रिपोर्टें इस गलत धारणा पर आधारित प्रतीत होती हैं कि केवल संख्यात्मक आवश्यकता ही पर्याप्त है। यह संविधान और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसकी व्याख्या के विपरीत है।”

कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए सावंत ने पत्र में कहा कि दसवीं अनुसूची के तहत छूट केवल तभी उपलब्ध होती है जब मूल राजनीतिक दल स्वयं किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय हो जाता है, न कि केवल तब जब विधायक स्वयं ही अलग होने का निर्णय लेते हैं।

पत्र में कहा गया है, “पैराग्राफ 4 में दो अलग-अलग शर्तों की संचयी संतुष्टि की आवश्यकता है- पहली, मूल राजनीतिक दल का विलय; और दूसरी, संबंधित विधायी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन।”

‘परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं’

शिवसेना (यूबीटी) के सांसद ने विशेष रूप से अध्यक्ष से आग्रह किया कि वे बागी सांसदों द्वारा किए गए किसी भी अनुरोध पर विचार न करें और यह सुनिश्चित करें कि “पार्टी का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाले किसी भी गुट या अलग हुए समूह को कोई अलग मान्यता, दर्जा, विशेषाधिकार या सुविधा प्रदान न की जाए।”

उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि मूल राजनीतिक दल के औपचारिक विलय के बिना अधिकृत पार्टी नेतृत्व से स्वतंत्र रूप से कार्य करने का प्रयास करने वाले किसी भी सांसद को दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता की कार्यवाही का सामना करना पड़ सकता है।

इसमें कहा गया है, “इस तरह के विलय के अभाव में, ऐसा आचरण जिसके द्वारा सदस्य स्वयं को एक अलग राजनीतिक दल के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद 2 के तहत निर्धारित परिणामों को आकर्षित कर सकता है।”

पार्टी ने यह भी संकेत दिया कि यदि कोई सांसद पार्टी के अधिकृत नेतृत्व के विपरीत कार्य करता है तो वह कानूनी कार्यवाही शुरू करने के लिए तैयार है। पत्र में आगे कहा गया है कि पक्ष कानून के अंतर्गत उपलब्ध अपने सभी अधिकारों को सुरक्षित रखता है, जिसमें दसवीं अनुसूची के प्रावधानों का सहारा लेने और आवश्यक उपाय करने का अधिकार भी शामिल है।

‘उद्धव गुट के नेताओं में असंतोष कभी भी विस्फोटक रूप ले सकता’, ‘ऑपरेशन टाइगर’ पर प्रतापराव जाधव का खुलासा

महाराष्ट्र में ‘ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चा है। खबर है कि ‘ऑपरेशन टाइगर’ के तहत उद्धव ठाकरे की शिवसेना के सांसद टूटकर पाला बदल सकते है। कई सांसद एकनाथ शिंदे के संपर्क में बताए जा रहे हैं। शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय देशमुख ने सोमवार को केंद्रीय मंत्री प्रतापराव जाधव से मुलाकात की थी जो शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना से जुड़े हैं। इससे एक दिन पहले, पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे द्वारा बुलाई गई बैठक में पार्टी के नौ लोकसभा सदस्यों में से केवल चार ही व्यक्तिगत रूप से शामिल हुए थे। पढ़ें पूरी खबर।