केंद्र की मोदी सरकार लोकसभा सीटों के परिसीमन और महिला आरक्षण को लागू करने के लिए संविधान संशोधन बिल एक बार फिर पेश कर सकती है। पिछली बार बहुमत के अभाव में सरकार इसे पारित नहीं करा सकी थी, लेकिन अब विपक्षी दलों को साथ लेकर नई रणनीति बनाई जा रही है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस बार केंद्र सरकार डीएमके और तृणमूल कांग्रेस का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रही है। हाल ही में तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में डीएमके को हार का सामना करना पड़ा है। वहीं, पश्चिम बंगाल में भी ममता बनर्जी की हार के बाद तृणमूल कांग्रेस में टूट-फूट की चर्चा है और कुछ सांसद इस्तीफा भी दे चुके हैं।
सरकार की नई रणनीति
सरकार इस बार अपने संविधान संशोधन बिल में स्पष्ट रूप से लिखना चाहती है कि जब लोकसभा की कुल सीटें बढ़ाकर 850 की जाएंगी, तब सभी राज्यों को मिलने वाली सीटों का अनुपात लगभग समान ही बना रहेगा। पिछली बार गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में कई बार यह बात दोहराई थी, लेकिन चूंकि यह प्रावधान कानून में लिखित रूप में नहीं था, इसलिए विपक्ष ने इसे स्वीकार नहीं किया। इस बार सरकार उस कमी को दूर कर सकती है। योजना यह है कि सीटों के बंटवारे के लिए 1971 की जनगणना को ही आधार बनाया जाए। साथ ही, लोकसभा की अधिकतम सीट संख्या 550 से बढ़ाकर 850 की जाएंगी।
इसके अलावा सरकार एक अलग डीलिमिटेशन बिल भी पारित कराना चाहती है। इसके बाद परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा। यह आयोग तय करेगा कि नई लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाएं किस तरह निर्धारित की जाएंगी। वर्तमान में राज्यों के भीतर विधानसभा सीटों के पुनर्गठन के लिए 2001 की जनगणना को आधार माना जाता है, लेकिन सरकार इसे बदलकर 2011 की जनगणना को आधार बना सकती है।
संविधान क्या कहता है?
समझने वाली बात यह भी है कि संविधान का अनुच्छेद 81(3) कहता है कि लोकसभा सीटों का बंटवारा पिछली जनगणना के आधार पर किया जाएगा। इसका सीधा मतलब है कि 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़े लागू हो सकते हैं। सरकार का कहना है कि यदि संविधान संशोधन बिल पारित नहीं होता, तो 2027 की जनगणना पूरी होने के बाद परिसीमन की प्रक्रिया अपने आप शुरू हो जाएगी। ऐसी स्थिति में उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों की आबादी में जो अंतर है, उसका असर सीटों के बंटवारे में भी दिखाई देगा।
इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “दक्षिणी राज्यों के लिए इस प्रस्ताव को मानने में यह एक बड़ी वजह है।” उनका कहना है कि गृह मंत्री अमित शाह पहले भी कह चुके हैं कि लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर 816 होने पर राज्यों की सीटों में करीब 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी।
दक्षिण के राज्यों का डर
हालांकि, दक्षिण भारत के कई राज्य इस तर्क से संतुष्ट नहीं थे। लोकसभा में डीएमके सांसद कनिमोझी करुणानिधि ने कहा था, “परिसीमन आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के एक जज करेंगे, जिनकी नियुक्ति सरकार करेगी। गृह मंत्री कह रहे हैं कि सीटों में 50 प्रतिशत बढ़ोतरी होगी, लेकिन अगर परिसीमन आयोग गृह मंत्री की बात ही नहीं मानेगा तो क्या होगा? न्याय के लिए हम कहां जाएंगे?” जानकारों का मानना है कि डीएमके का रुख स्पष्ट है और वह इस मुद्दे पर लिखित कानूनी गारंटी चाहती है।
पिछली बार लोकसभा में हुई बहस के दौरान अमित शाह ने स्पष्ट कहा था कि किसी भी राज्य के साथ सीटों के मामले में अन्याय नहीं होगा और दक्षिण भारत के राज्यों के हितों का भी पूरा ध्यान रखा जाएगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा था कि कर्नाटक की सीटें 28 से बढ़कर 42 हो सकती हैं, तमिलनाडु की 39 से बढ़कर 59, आंध्र प्रदेश की 25 से बढ़कर 38, तेलंगाना की 17 से बढ़कर 26 और केरल की 20 से बढ़कर 30 हो सकती हैं।
सरकार के पास दो विकल्प
फिलहाल सरकारी सूत्रों का कहना है कि केंद्र सरकार के पास दो विकल्प हैं। पहला, मानसून सत्र में वही पुराना संविधान संशोधन बिल दोबारा पेश कर दिया जाए। दूसरा, बिल में कुछ बदलाव किए जाएं, उसे कैबिनेट से मंजूरी दिलाई जाए और फिर संशोधित स्वरूप में संसद में पेश किया जाए।
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