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2019 में खत्‍म तो नहीं हो जाएगी कांग्रेस? पार्टी के लिए खतरनाक हैं ये पांच संकेत

पार्टी को उत्तरप्रदेश चुनावों में करारी हार मिली है। वहीं मणिपुर और गोवा जैसे राज्य में ज्यादा सीटें होते हुए भी वह सरकार बनाने में नाकाम रही। केवल पंजाब से ही उसे जीत के बाद राहत मिली है।

Author March 15, 2017 16:58 pm
पार्टी के पास कोई एेसा नेता नहीं है जो मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने टिक सके।

5 राज्यों में हुए चुनावों के नतीजे आने के बाद कांग्रेस आलाकमान को गहरा झटका लगा है। सिर्फ एक राज्य पंजाब में उसे सरकार बनाने का मौका मिला है, जबकि मणिपुर और गोवा में ज्यादा सीटें होते हुए भी वह सरकार नहीं बना पाई और दोनों राज्यों में बीजेपी के मुख्यमंत्रियों ने शपथ ले ली। कभी देश की राजनीति पर राज करने वाली कांग्रेस पार्टी आज फर्श पर है। पार्टी के पास कोई एेसा नेता नहीं है जो मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने टिक सके। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की अगुआई में पार्टी कई चुनाव हारी है। यहां तक कि उसके गढ़ माने जाने वाले राज्य उसके हाथ से निकल गए। अमेठी और राजबरेली में बीजेपी उम्मीदवारों की जीत से सोनिया और राहुल गांधी के लिए भी खतरा पैदा हो गया है। कई राजनीतिक पंडित तो यह भी अनुमान लगा रहे हैं कि हालात यही रहे तो पार्टी कहीं 2019 के लोकसभा चुनावों तक गायब ही न हो जाए। आइए आपको बताते हैं एेसे कारण जो इशारा करते हैं कि पार्टी कहीं 2019 तक खत्म ही न हो जाए।

कौन बनेगा पीएम कैंडिडेट: मौजूदा दौर में कांग्रेस के पास एेसा कोई नेता नहीं है जो लोगों के बीच लोकप्रिय हो या जिसकी कांग्रेस में अलग धाक हो। पार्टी सिर्फ अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी के ही कंधों पर टिकी हुई है। राहुल के विरोध में समय-समय पर बागी सुर उठते ही रहे हैं। लिहाजा पार्टी उन्हें पीएम कैंडिडेट बनाने से पहले 100 बार सोचेगी। मनमोहन सिंह शायद ही दूसरी बार प्रधानमंत्री पद के लिए खड़े हों। लिहाजा पार्टी के सामने अपना नया नेता चुनने की बड़ी चुनौती है, जो उसकी डूबती नैया को पार लगा सके।

12 राज्यों में हारी चुनाव: कांग्रेस साल 2014 के लोकसभा चुनावों में सिमटने के बाद से सत्‍ता गंवाती जा रही है। उसने इन चुनावों के बाद हुए बड़े राज्‍यों के विधानसभा चुनाव में हार का सामना किया है। ढाई साल में कांग्रेस महाराष्‍ट्र, हरियाणा, असम जैसे गढ़ भाजपा के हाथों हार चुकी है। झारखंड, जम्‍मू कश्‍मीर, केरल, दिल्‍ली, उत्‍तराखंड जैसे राज्‍य उसके हाथ से फिसल गए। अरुणाचल प्रदेश में बगावत ने उसकी सत्‍ता छीन ली। बिहार में वह जेडीयू और राजद के साथ छोटी साझेदारी बनकर सत्‍ता में आई है। हालांकि पुदुचेरी में जरूर उसे कामयाबी मिली। लेकिन तमिलनाडु, उत्‍तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्‍य जो कई दशकों से उसकी पकड़ से बाहर थे वे उससे दूर ही रहे। इस साल अब गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव होने हैं। गुजरात में कांग्रेस 20 साल से सत्‍ता बाहर है। वहीं हिमाचल प्रदेश में उसके सामने सत्‍ता बचाने की लड़ाई होगी।

कमजोर हो रहा संगठन : कई बार आरोप लगते रहे हैं कि राज्य इकाइयों और आलाकमान के बीच कोई संपर्क नहीं है, जिसके कारण कार्यकर्ताओं का मनोबल लगातार गिरता जा रहा है। यूपी चुनावों के नतीजे आने के बाद कार्यकर्ताओं ने साफ कहा कि पहले कांग्रेस का चुनावी कैंपेन अखिलेश सरकार के खिलाफ था, लेकिन बाद में दोनों पार्टियों ने गठबंधन कर लिया। जमीनी स्तर पर भी कांग्रेस और सपा कार्यकर्ताओं के बीच कोई संतुलन या तालमेल नहीं था, जिसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ा। 27 साल से सूबे की सत्‍ता से बाहर पार्टी अब 10 सीटों के अंदर ही सिमट गई है। यह उसका यहां पर अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन है। कांग्रेस ने सपा के साथ समझौते के तहत 105 सीटों पर यूपी विधानसभा का चुनाव लड़ा था। साथ ही कुछेक सीटों पर गठबंधन के बावजूद सपा और कांग्रेस दोनों के उम्‍मीदवार खड़े थे। बावजूद इसके कांग्रेस केवल सात सीटों को जीत पाई है। यानि की 98 सीटों पर उसे मात मिली है। इन नतीजों ने कांग्रेस को उत्‍तर प्रदेश में पांचवें नंबर की पार्टी बना दिया है। उससे ज्‍यादा तो अपना दल(एस) को सीटें मिल गईं।

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राहुल के नेतृत्व पर सवालिया निशान: हार के बाद राहुल गांधी के नेतृत्व पर ही सवाल खड़ा हो गया है। कांग्रेस पार्टी के महामंत्री और महासचिव उमेश पंडित ने यूपी में कांग्रेस की हार के लिए राहुल गांधी को जिम्मेदार ठहराया था। खबरों के मुताबिक, उमेश पंडित ने कहा था, ‘राहुल गांधी यूपी की हार के लिए जिम्मेदार हैं, उन्होंने यह भी कहा कि प्रशांत किशोर को बीजेपी ने प्लांट करके कांग्रेस में भेजा था।’ उमेश पंडित ने कहा कि राहुल गांधी की टीम जो लोग हैं वह सही नहीं हैं। उस टीम पर सही फीडबैक ना देने का भी आरोप लगाया गया। उमेश पंडित ने कहा कि या तो राहुल गांधी अपनी टीम बदलें, या खुद को बदलें या फिर कांग्रेस के बाकी लोगों और प्रियंका गांधी के लिए रास्ता खाली कर दें।

कोई विजन नहीं: पार्टी सिर्फ नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना में लगी रही। उसने न तो चुनावों में अपना कोई विजन पेश किया और न ही कोई एेसा एेलान किया, जिससे जनता उससे जुड़ सके। वहीं भाजपा ने इस मौके को भुनाया और नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यों को जनता के सामने पेश किया। लिहाजा पार्टी ने 300 से ऊपर सीटें जीतकर इतिहास रच दिया।

पिछले 10 सालों में उत्तर प्रदेश में भाजपा का वोट शेयर दोगुने से भी ज्यादा हो गया है। 2014 के लोकसभा चुनावों में यह सबसे ज्यादा रहा। (आंकड़े प्रतिशत में)

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