केरल के सबरीमाला मंदिर में एक खास उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर रोक के मामले में केरल की वाम लोकतांत्रिक सरकार ने शनिवार को अपना पहले का रुख थोड़ा नरम कर लिया है। सरकार ने कहा कि कई वर्षों से चली आ रही धार्मिक परंपराओं में बदलाव करने से पहले उस धर्म के विद्वानों और समाज सुधारकों से व्यापक सलाह लेना जरूरी है।

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपने लिखित बयान में कहा कि अदालत जब धार्मिक प्रथाओं की समीक्षा करे, तो यह नहीं देखना चाहिए कि वह प्रथा तर्कसंगत है या नहीं। बल्कि यह देखना चाहिए कि क्या लोग वास्तव में और ईमानदारी से उसे अपने धर्म का हिस्सा मानते हैं।

राज्य सरकार का कहना है कि अगर किसी पुरानी धार्मिक परंपरा की न्यायिक समीक्षा करनी हो, तो पहले उस धर्म के प्रसिद्ध धार्मिक विद्वानों और सामाजिक सुधारकों की राय ली जानी चाहिए। इसके बाद ही अदालत को उनके विचारों का निष्पक्ष मूल्यांकन करके फैसला देना चाहिए।

यह मामला उस फैसले से जुड़ा है जिसमें 28 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी को हटाने का आदेश दिया था। अब इस फैसले की समीक्षा से जुड़े संवैधानिक सवालों पर नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ सुनवाई करने वाली है।

वरिष्ठ वकील जयदीप गुप्ता और वकील निशे राजेन शोंकर के जरिए दायर लिखित निवेदन में कहा गया है कि सबरीमाला मंदिर से जुड़े पिछले अनुभव और श्रद्धालुओं की प्रतिक्रिया, जिसमें महिला श्रद्धालु भी शामिल हैं। सरकार के इस पक्ष का समर्थन करती है।

मामले की सुनवाई कर रहा सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर विचार करने के लिए 9 जजों की संविधान पीठ बना चुका है। अदालत ने सात अहम सवाल तय किए हैं, जिनका जवाब यह पीठ देगी। इन सवालों पर सुनवाई शुरू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 7 अप्रैल 2026 की तारीख तय की है।

वे 7 प्रश्न इस प्रकार हैं:

  1. संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धर्म की स्वतंत्रता और संविधान के भाग III के अन्य प्रावधानों के बीच क्या परस्पर संबंध है?
  2. संविधान के अनुच्छेद 25(1) के अंतर्गत “सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य” का दायरा क्या है?
  3. भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के अंतर्गत ‘नैतिकता’ शब्द का दायरा और विस्तार क्या है और क्या इसमें संवैधानिक नैतिकता को शामिल किया गया है?
  4. आवश्यक धार्मिक प्रथाओं की पहचान के संबंध में न्यायिक समीक्षा का दायरा और सीमा क्या है?
  5. भारत के संविधान के अनुच्छेद 25(2)(ख) में प्रयुक्त अभिव्यक्ति “हिंदुओं के वर्ग” का क्या अर्थ है?
  6. क्या अनुच्छेद 26 के अंतर्गत आवश्यक धार्मिक प्रथाओं को संरक्षण प्राप्त है?
  7. क्या कोई व्यक्ति जो किसी धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह से संबंधित नहीं है। जनहित याचिका दायर करके उस धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह की किसी प्रथा पर सवाल उठा सकता है?
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