पश्चिम बंगाल में चुनावी पारा चढ़ने के बीच, उर्दू भाषा को लेकर राजनीति गरमा गई है। तृणमूल कांग्रेस के तरफ से उर्दू में जारी किए गए चुनावी घोषणापत्र को भाजपा ने एक खास समुदाय के लिए तुष्टीकरण की कोशिश करार दिया। वहीं भाजपा के हमले को तृणमूल कांग्रेस ने सांस्कृतिक पहचान को धूमिल करने की कोशिश बताया है।
स्थानीय नेताओं का कहना है कि पश्चिम बंगाल भारत के उन राज्यों में से एक हैं जहां मुस्लिम आबादी काफी है। राजनीतिक पार्टियों का अनुमान है कि प्रदेश में करीब 27 फीसद आबादी मुस्लिम समुदाय की है। इसमें मुर्शिदाबाद राज्य का सबसे अधिक मुसलिम बहुल जिला है।
इसके अलावा मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण 24 परगना, बीरभूम, शहरी क्षेत्रों में कोलकाता के पार्क सर्कस, मेटियाब्रुज, गार्डन रीच सहित दूसरे इलाके में मुस्लिम आबादी बड़े स्तर पर हैं। यहां बोलचाल, पठन-पाठन या रोजमर्रा के काम में उर्दू का प्रयोग होता है। यहीं कारण है कि इस समुदाय तक पहुंच बनाने के लिए उर्दू लंबे समय से राजनीति के केंद्र में रही है।
मुगल काल से उर्दू का प्रभाव
बंगाल में मुगल काल के दौरान से ही प्रशासन और सेना में फारसी व उर्दू का प्रभाव रहा है। भारत विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) और व दूसरे इलाकों से आए मुस्लिम समुदाय के कारण क्षेत्र में उर्दू का इस्तेमाल होता रहा।
मौजूदा समय में पश्चिम बंगाल सरकार ने उर्दू को राज्य की मान्यता प्राप्त भाषाओं में शामिल किया हुआ है।कई जिलों और शहरी इलाकों में उर्दू शिक्षा या प्रशासनिक कामकाज में सीमित रूप से उपयोग किया जाता है। हालांकि राजनीतिक पार्टियां अपने हिसाब से इसका इस्तेमाल करती रही है।
पश्चिम बंगाल चुनाव में टीएमसी ने कितनी सीटें जीतीं?
पिछले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने उत्तर 24 परगना की 33 में से 28, दक्षिण 24 परगना में 31 में से 30, कोलकाता की सभी 11, मुर्शिदाबाद की 22 में से 20 और मालदा की 12 विधानसभा में से 8 विधानसभा में जीत दर्ज की थी। वहीं कई विधानसभा सीटों को उन्होंने वाम गठबंधन से छीना था।
बीजेपी ने लगाया ‘उर्दूस्तान’ बनाने का आरोप
इस मुद्दे पर पश्चिम बंगाल से भाजपा सांसद जगन्नाथ सरकार का कहना है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनावी लाभ को देखते हुए एक विशेष समुदाय को साधने की कोशिश की है। वह शुरू से इस खास वोट बैंक की राजनीति करती हुई आई हैं। वह देश के इस हिस्से को उर्दूस्तान बनाना चाहती हैं।
वहीं तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता डा रिजू दत्ता ने कहा कि भाजपा नेताओं का पढ़ाई से कोई लेना-देना नहीं। उन्हें मालूम होना चाहिए कि घोषणा पत्र को उर्दू में इश्तेहार कहा जाता है। यदि भाजपा नेताओं को उर्दू से परहेज है, तो उन्हें पहले संविधान को बदलना चाहिए। संविधान ने देश के मुसलिम को उतना ही अधिकार दिया है, जितने अन्य नागरिक को मिले हैं। वहीं उर्दू के बारे में उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषण व अन्य जगहों पर उर्दू के काफी शब्दों का प्रयोग करते हैं।
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