सबसे ज्यादा गन्ना पैदा करने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में चीनी का उत्पादन 2019-20 से 2025-26 के बीच 126.4 लाख टन से घटकर 89.5 लाख टन रह गया है।

इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह बड़े पैमाने पर बोई जाने वाली गन्ने की किस्म Co-0238 (करण 4) का ‘रेड रॉट’ बीमारी की चपेट में आना है। गन्ने की पैदावार घटने का असर राज्य की करीब 120 चीनी मिलों पर भी पड़ा है। इन मिलों में पेराई के लिए आने वाले गन्ने की कुल मात्रा में पिछले छह वर्षों में 20 % तक की कमी आई है।

नई किस्म से उम्मीद

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के कोयंबटूर स्थित गन्ना प्रजनन संस्थान (SBI) द्वारा विकसित की गई एक नई किस्म से अब गन्ना उद्योग को कुछ उम्मीदें हैं। इस किस्म का नाम है- Co-20016 (करण 20)।

ऑल इंडिया कोऑर्डिनेटेड रिसर्च प्रोजेक्ट (AICRP) के तहत गन्ने पर काम करने वाली वैरायटी आइडेंटिफिकेशन कमेटी ने 27 मई को Co-0238 की जगह
Co-20016 को उगाने के लिए चुना है।

एक सरकारी अधिकारी ने बताया, “अब इसे सेंट्रल वैराइटल रिलीज कमेटी के सामने रखा जाएगा, जिसकी बैठक अक्टूबर में होने की उम्मीद है। समिति की मंजूरी मिलने और खेती के लिए इसे आधिकारिक तौर पर जारी किए जाने के बाद किसान आने वाले मौसम में इसे लगा सकेंगे।”

अगस्त 2023 में इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) ने ICAR-SBI के साथ मिलकर गन्ने की दो किस्मों Co-20016 और Co-21012 के परीक्षण शुरू किए थे। तीन साल तक चले इस परीक्षण के तहत दो बार नए गन्ने और एक बार पहले से कटे गन्ने के बाद उगने वाली फसल के परीक्षण शामिल थे।

ये परीक्षण महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश के 11 मिलों समेत कुल 16 मिलों में किए गए। उत्तर प्रदेश की इन मिलों में त्रिवेणी इंजीनियरिंग एंड इंडस्ट्रीज, बलरामपुर चीनी मिल्स, डीसीएम श्रीराम, डीसीएम श्रीराम इंडस्ट्रीज, मवाना शुगर्स, अवध शुगर एंड एनर्जी, धामपुर बायो ऑर्गेनिक्स, केएम शुगर मिल्स, सेक्सारिया बिसवां शुगर फैक्ट्री और यूनाइटेड प्रोविंसेज शुगर कंपनी शामिल थीं।

ISMA के महानिदेशक दीपक बल्लानी ने कहा, “दोनों किस्मों के परीक्षण के नतीजे काफी उत्साहजनक हैं।” Co-20016 के लिए परीक्षण पूरे हो चुके हैं, जबकि Co-21012 का परीक्षण अभी चल रहा है।

ISMA के परीक्षण केंद्रों पर Co-20016 की तीन साल की औसत पैदावार 144.6 टन प्रति हेक्टेयर रही। वहीं Co-0238 की औसत पैदावार 116.4 टन प्रति हेक्टेयर थी।

10 महीने की फसल अवधि में गन्ने के रस में चीनी की औसत मात्रा भी Co-20016 में ज्यादा पाई गई। इसमें यह 18.7% थी, जबकि Co-0238 में 18.3% थी।

रेड रॉट रोग से मुकाबला

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि Co-20016 ने रेड रॉट रोग से लड़ने की अच्छी क्षमता दिखाई है, खास तौर पर CF13 नाम के बेहद खतरनाक फंगस के खिलाफ। हालांकि, जब ICAR-SBI ने Co-0238 किस्म विकसित कर 2009 में इसे जारी किया था, तब यह रेड रॉट फैलाने वाले फंगस के उस समय मौजूद CF07 और CF08 प्रकारों के खिलाफ लड़ने में सक्षम था।

ICAR-SBI के पूर्व निदेशक और Co-0238 किस्म विकसित करने वाले वैज्ञानिक डॉ. बख्शी राम ने बताया, “CF13 प्रकार उत्तर प्रदेश और दूसरे उत्तरी राज्यों में Co-0238 की बड़े पैमाने पर एक ही किस्म की खेती किए जाने के कारण सामने आया। फंगस में बदलाव हुआ और यह नए प्रकार में बदल गया। इसके कारण Co-0238 की रोग से लड़ने की क्षमता खत्म हो गई और यह रेड रॉट की चपेट में आने लगी।”

उत्तर प्रदेश के चीनी उद्योग में Co-0238 के योगदान को आंकड़ों से भी समझा जा सकता है।

2012-13 तक यह किस्म केवल कुछ किसानों के खेतों में ISMA के परीक्षण के तौर पर उगाई जाती थी। लेकिन उत्तर प्रदेश में कुल गन्ना क्षेत्र में इसका हिस्सा लगभग शून्य से बढ़कर 2019-20 में 82.2% हो गया। इसी दौरान राज्य में चीनी का उत्पादन 2011-12 के 69.7 लाख टन से बढ़कर 2019-20 में 126.4 लाख टन हो गया।

2016-17 तक उत्तर प्रदेश महाराष्ट्र को पीछे छोड़कर देश का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक राज्य बन गया और 2020-21 तक यह स्थिति बनी रही।

2011-12 से 2019-20 के बीच उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों में पेराई होने वाले गन्ने की मात्रा भी 768.6 लाख टन से बढ़कर 1,118 लाख टन हो गई। हर टन गन्ने से मिलने वाली चीनी की औसत मात्रा भी करीब 9.1% से बढ़कर 11.7% से ज्यादा हो गई।

Co-0238 गन्ना किसानों और चीनी मिलों के लिए फायदेमंद साबित हुई। इस किस्म के गन्ने का तना मोटा होता है, जिससे उत्तर प्रदेश में औसत पैदावार 60 टन प्रति हेक्टेयर से कम से बढ़कर 80 टन से ज्यादा हो गई।

यह किस्म जल्दी तैयार हो जाती थी और दूसरी सामान्य किस्मों की तुलना में कम समय में ही इसमें काफी ज्यादा चीनी जमा हो जाती थी। इससे चीनी मिलों को नवंबर से लेकर अप्रैल के अंत तक पूरे पेराई सीजन में ज्यादा चीनी निकालने में मदद मिलती थी।

एक बड़ी चेतावनी

डॉ. बख्शी राम ने कहा, “इस किस्म के कई फायदे थे, लेकिन मैंने इसकी जरूरत से ज्यादा खेती करने के खिलाफ चेतावनी दी थी। खासकर उत्तर प्रदेश के मध्य, पूर्वी और तराई इलाकों में, जहां खेतों में पानी भरने की समस्या रहती है। पानी भरे खेतों में रेड रॉट फैलने का खतरा ज्यादा होता है और फंगस एक इलाके से दूसरे इलाके तक आसानी से पहुंच सकते हैं। दुर्भाग्य से न तो मिलों ने और न ही किसानों ने मेरी सलाह मानी।”

2020-21 तक उत्तर प्रदेश के कुल गन्ना क्षेत्र के 86.7% हिस्से में Co-0238 की खेती होने लगी थी। वहीं उत्तर भारत के पूरे उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र में करीब 84% गन्ना क्षेत्र में यही किस्म बोई जा रही थी।

इसी समय के आसपास इस किस्म की रेड रॉट से लड़ने की क्षमता तेजी से खत्म होने लगी। इसी दौरान फंगस के नए और ज्यादा खतरनाक प्रकार को CF13 नाम दिया गया।

रेड रॉट फैलाने वाला फंगस गन्ने की उस नस जैसी प्रणाली पर हमला करता है, जिसके जरिए जड़ों से पानी और पोषक तत्व तने, पत्तियों और पौधे के दूसरे हिस्सों तक पहुंचते हैं। संक्रमण होने के बाद यह प्रणाली जाम हो जाती है। इससे पौधे को जरूरी पानी और पोषक तत्व नहीं मिल पाते। नतीजतन पौधा मुरझाने लगता है और आखिरकार गन्ना सिकुड़कर अंदर से खोखला हो जाता है।

डॉ. राम ने कहा, “बीमारी के खिलाफ गन्ने की प्राकृतिक रुप से लड़ने की क्षमता को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि किसी भी गन्ना उत्पादक क्षेत्र में एक ही किस्म की खेती 40-50% से ज्यादा क्षेत्र में न हो।”

ISMA के दीपक बल्लानी को उम्मीद है कि Co-20016 और Co-21012 दोनों ही Co-0238 की जगह लेने में सफल हो सकती हैं।

ISMA के परीक्षणों में Co-21012 की औसत पैदावार 129.4 टन प्रति हेक्टेयर और चीनी की मात्रा 18% रही। यह Co-0238 की 119.7 टन प्रति हेक्टेयर पैदावार और 17.8% चीनी की मात्रा से ज्यादा है। हालांकि, इन नई किस्मों की असली परीक्षा किसानों के खेतों में ही होगी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली जिले के खेड़ी बैरागी गांव के किसान जितेंद्र सिंह हुड्डा ने 2025 में अपनी गन्ने की खेती का क्षेत्र आठ एकड़ से घटाकर छह एकड़ कर दिया था। इस साल उन्होंने इसे और घटाकर चार एकड़ कर दिया। खाली हुई जमीन पर उन्होंने मक्का, उड़द और कम समय में तैयार होने वाला पूसा-1509 बासमती धान लगाया है।

किसान ने कहा, “पहले मुझे एक एकड़ में 38-39 टन गन्ना मिलता था, लेकिन अब यह घटकर सिर्फ 22-23 टन रह गया है। लाल सड़न रोग ने किसानों का गन्ने पर भरोसा काफी कम कर दिया है।”

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