29 जून 2026 को सेशेल्स अपना 50वां स्वाधीनता दिवस मना रहा है। इस खास मौके पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुख्य अतिथि के रूप में समारोह में शामिल हो रहे हैं। यह सिर्फ एक औपचारिक विदेश दौरा नहीं बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत और सेशेल्स के मजबूत रिश्तों तथा भारत की बढ़ती रणनीतिक भूमिका का अहम संकेत है। यह मौजूदगी महज एक पारंपरिक कूटनीतिक शिष्टाचार या अंतरराष्ट्रीय औपचारिकता नहीं है बल्कि यह हिंद महासागर की उस सामरिक बिसात पर नई दिल्ली की एक सोची-समझी और बेहद मजबूत चाल है। जब विक्टोरिया में भारतीय नौसेना और सैन्य बैंड सेशेल्स की परेड में हिस्सा लेंगे तो यह दोनों देशों के बीच दशकों पुराने भरोसे और साझेदारी का प्रतीक होगा।

वैचारिक नजरिए से देखें तो यह आयोजन इस बात का जीवंत दस्तावेज है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संप्रभुता का सम्मान केवल देश के आकार से तय नहीं होता बल्कि संकट के समय एक-दूसरे के काम आने की नीयत से तय होता है।

‘ऑपरेशन फ्लॉवर बूमिंग’ और पांच दशकों का भरोसा

भारत और सेशेल्स के रिश्तों की बुनियाद को समझने के लिए हमें इतिहास के उन पन्नों को पलटना होगा। साल 1976 में जब सेशेल्स ब्रिटिश हुकूमत से आजाद हुआ था। तभी से भारत ने उसे अपने एक रणनीतिक पड़ोसी और मित्र के रूप में स्वीकार किया। लेकिन इस रिश्ते की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा साल 1986 में हुई जिसे कूटनीतिक इतिहास में ‘ऑपरेशन फ्लॉवर बूमिंग’ (Operation Flowers Are Blooming) के नाम से जाना जाता है।

जून 1986 में जब सेशेल्स के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रांस अल्बर्ट रेने एक अंतरराष्ट्रीय दौरे पर थे। उसी समय वहां कुछ आंतरिक और विदेशी ताकतों ने मिलकर लोकतांत्रिक सरकार का तख्तापलट करने की एक साजिश रची। राष्ट्रपति रेने ने उस संकट की घड़ी में नई दिल्ली से मदद की गुहार लगाई। रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत ने बिना समय गंवाए अपनी नौसेना के युद्धपोत ‘आईएनएस विंध्यगिरि’ (INS Vindhyagiri) को तुरंत सेशेल्स के लिए रवाना कर दिया। भारतीय नौसैनिकों ने विक्टोरिया पहुंचकर न केवल तख्तापलट की उस साजिश को नाकाम किया बल्कि वहां के लोकतंत्र की रक्षा भी की। वह एक ऐसा दौर था जब भारत ने दुनिया को यह दिखा दिया था कि वह हिंद महासागर में केवल एक मूकदर्शक नहीं है बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और अपने छोटे पड़ोसियों की संप्रभुता का एक सजग प्रहरी भी है। आज जब सेशेल्स अपनी आजादी के 50 साल पूरे कर रहा है तो उस ऐतिहासिक संकटमोचक भूमिका की यादें दोनों देशों के रणनीतिकारों के दिमाग में ताजा हैं।

चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ और भारत की जवाबी कूटनीति

भू-राजनीति का एक बुनियादी नियम है कि आप अपने पड़ोसी और भूगोल नहीं बदल सकते। सेशेल्स का भूगोल ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है और यही उसकी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी है। हिंद महासागर के पश्चिमी छोर पर मौजूद यह देश, दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्गों (Sea Lines of Communication) के बिल्कुल मुहाने पर है। इस रास्ते से दुनिया का महत्वपूर्ण व्यापार होता है और बड़ी संख्या में तेल टैंकर गुजरते हैं। यही वजह है कि आज यह क्षेत्र दुनिया की महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता का मुख्य अखाड़ा बन चुका है।

पिछले डेढ़ दशक में चीन ने इस क्षेत्र में ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (String of Pearls) नीति के तहत अपनी मौजूदगी को आक्रामक तरीके से बढ़ाया है। श्रीलंका के हम्बनटोटा से लेकर जिबूती के सैन्य बेस तक और पाकिस्तान के ग्वादर से लेकर मालदीव के द्वीपों तक चीन ने जिस तरह अपना जाल बिछाया है और भारत के सुरक्षा घेरे के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। चीन की इस विस्तारवादी नीति का मुकाबला करने के लिए भारत के पास सेशेल्स से बेहतर और विश्वसनीय साझीदार दूसरा कोई नहीं हो सकता।

भारत की जवाबी कूटनीति चीन की तरह किसी देश को कर्ज के जाल में फंसाने की नहीं है बल्कि उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने की है। सेशेल्स की स्वर्ण जयंती पर प्रधानमंत्री की मौजूदगी चीन को यह स्पष्ट संदेश है कि नई दिल्ली अपने इस रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र में किसी भी बाहरी शक्ति के अनुचित हस्तक्षेप को कड़ा कूटनीतिक जवाब देने के लिए तैयार है।

‘सागर’ (SAGAR) नीति की कसौटी पर सेशेल्स

साल 2015 में जब भारत सरकार ने अपनी विदेश नीति के तहत ‘सागर’ (Security and Growth for All in the Region) यानी ‘इस क्षेत्र में सभी की सुरक्षा और विकास’ का दृष्टिकोण दुनिया के सामने रखा था। उस समय कई विश्लेषकों ने इसे महज एक कूटनीतिक नारा माना था। लेकिन पिछले 11 सालों में सेशेल्स के साथ भारत के व्यवहार ने यह साबित कर दिया है कि ‘सागर’ नीति भारत की समुद्री कूटनीति की आत्मा है। भारत ने सेशेल्स में कभी भी एक ‘बड़े भाई’ (Big Brother) की धौंस जमाने वाली छवि नहीं बनाई।

इसके उलट, भारत ने उसकी समुद्री सीमाओं की रक्षा के लिए उसकी अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने का काम किया। हिंद महासागर में समुद्री डकैती (Piracy), नशीली दवाओं की तस्करी और अवैध रूप से होने वाली मछलियों की पकड़ (Illegal Fishing) जैसी चुनौतियां सेशेल्स जैसे छोटे द्वीपीय देशों के लिए अर्थव्यवस्था का संकट बन जाती हैं। भारत ने इन चुनौतियों से लड़ने के लिए सेशेल्स को एक मजबूत सिक्योरिटी सिस्टम ऑफर किया है।

भारत ने 2015 में सेशेल्स के विभिन्न द्वीपों पर छह तटीय निगरानी रडार (Coastal Surveillance Radar Systems) स्थापित किए जिनसे सेशेल्स की समुद्री निगरानी क्षमता मजबूत हुई। भारत और सेशेल्स समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में सूचना साझा करने और Maritime Domain Awareness के लिए भी करीबी सहयोग करते हैं।

एजम्पशन आइलैंड (Assumption Island)

भारत और सेशेल्स के संबंधों की चर्चा तब तक अधूरी है जब तक इसमें ‘एजम्पशन आइलैंड’ (Assumption Island) के मामले का जिक्र न किया जाए। साल 2015 में भारत और सेशेल्स के बीच इस द्वीप पर एक संयुक्त नौसैनिक बुनियादी ढांचा विकसित करने का समझौता हुआ था। भारत का उद्देश्य इस द्वीप पर एक हवाई पट्टी और नौसैनिक गोदी का निर्माण करना था ताकि हिंद महासागर के इस महत्वपूर्ण हिस्से में जहाजों की आवाजाही पर नजर रखी जा सके।

हालांकि, सेशेल्स की अंदरूनी राजनीति और वहां के विपक्ष द्वारा संप्रभुता के मुद्दे पर उठाए गए सवालों के कारण यह प्रोजेक्ट लंबे समय तक कूटनीतिक विवादों के घेरे में रही। जहां एक तरफ भारत इसे इस क्षेत्र की सामूहिक सुरक्षा के लिए जरूरी मानता था, वहीं सेशेल्स के नागरिकों के एक वर्ग को यह डर था कि यह द्वीप एक विदेशी सैन्य अड्डे में तब्दील हो जाएगा। लेकिन हाल के वर्षों में भारत ने अपनी परिपक्व कूटनीति का परिचय देते हुए इस विवाद को हवा देने के बजाय सेशेल्स के नेतृत्व के साथ मिलकर एक ऐसा बीच का रास्ता निकाला जो दोनों देशों की चिंताओं को दूर करता है। भारत ने यह साफ किया कि इस द्वीप पर बनने वाला ढांचा पूरी तरह से सेशेल्स की सेना के नियंत्रण में रहेगा और भारत इसका इस्तेमाल केवल तकनीकी सहयोग और संयुक्त गश्त के लिए करेगा।

विकास साझेदारी: ईंट-पत्थरों से इतर दिलों का जुड़ाव

भारत और सेशेल्स का रिश्ता केवल बंदूकों, जहाजों और रडारों तक ही सीमित नहीं है। भारत ने सेशेल्स के सामाजिक और प्रशासनिक ढांचे को खड़ा करने में भी एक बड़ी भूमिका निभाई है। नई दिल्ली द्वारा दी गई ‘अनुदान सहायता’ (Grant Assistance) के तहत सेशेल्स की राजधानी विक्टोरिया में कई ऐसी महत्वपूर्ण इमारतों का निर्माण किया गया है जो वहां के लोकतंत्र का प्रतीक हैं।

नई संसद इमारत और केंद्रीय न्यायालय: सेशेल्स की आलीशान नई संसद की इमारत और वहां का ‘सेंट्रल कोर्ट कॉम्प्लेक्स’ भारत की आर्थिक सहायता और इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना है।

क्षमता निर्माण (Capacity Building): सेशेल्स के प्रशासनिक और रक्षा ढांचे की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वहां के 50 फीसदी से अधिक सैन्य, नौसैन्य और पुलिस कर्मियों को भारत के राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) और भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रशिक्षित किया गया है।

साझा समंदर

सेशेल्स की स्वतंत्रता का यह स्वर्ण वर्ष कूटनीति के एक नए अध्याय की शुरुआत है। एक ऐसे दौर में जब दुनिया के कई बड़े देश अपने आर्थिक और सैन्य हितों को साधने के लिए छोटे और कमजोर देशों को अपनी भू-राजनीतिक शतरंज का मोहरा बना रहे हैं, वहां भारत और सेशेल्स का यह गठजोड़ एक मिसाल पेश करता है।

आसान शब्दों में कहें तो किसी भी देश की ताकत सिर्फ उसकी सैन्य शक्ति से नहीं बल्कि अपने सहयोगी देशों के साथ भरोसेमंद रिश्तों से भी तय होती है। सेशेल्स के 50वें राष्ट्रीय दिवस पर भारत के प्रधानमंत्री की मौजूदगी इसी भरोसे और मजबूत साझेदारी का संदेश देती है। 29 जून को जब विक्टोरिया में सेशेल्स के राष्ट्रीय ध्वज के साथ भारत का तिरंगा लहराया तो यह दुनिया के लिए एक स्पष्ट संकेत रहा कि हिंद महासागर किसी एक देश का प्रभाव क्षेत्र नहीं बल्कि साझेदारी, संप्रभुता के सम्मान और शांतिपूर्ण सहयोग का क्षेत्र है।

सेशेल्स की स्वर्ण जयंती में शामिल होकर भारत ने एक बार फिर दिखाया है कि वह केवल एक रणनीतिक साझेदार ही नहीं बल्कि अपने मित्र देशों का भरोसेमंद साथी भी है। यही भरोसा आने वाले समय में हिंद महासागर क्षेत्र में दोनों देशों के रिश्तों को और मजबूत करेगा।