राष्ट्रीय स्वयं सेवक (आरएसएस) के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले की हालिया टिप्पणी ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। उन्होंने कहा था कि भारत को पाकिस्तान के साथ बातचीत के दरवाजे बंद नहीं करने चाहिए। इधर पिछले कुछ सालों में भाजपा की केंद्र सरकार ने आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान के साथ बातचीत बंद कर रखी हैं। सरकार का कहना है कि आतंकवाद और बातचीत दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते।
आरएसएस महासचिव की इस टिप्पणी के कारण विपक्ष ने संगठन और सरकार पर निशाना साधा। आलोचकों ने संगठन पर 2019 के पुलवामा हमले जैसे आतंकी हमलों को मामूली घटना बताकर उनका महत्व कम करने का आरोप लगाया। साथ ही यह भी कहा कि बातचीत की वकालत करना अमेरिका के दबाव के आगे घुटने टेकने जैसा है।
क्या कहा था संघ महासचिव ने?
दत्तात्रेय होसबाले ने पीटीआई को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, “अगर पाकिस्तानी पुलवामा जैसी छोटी-छोटी हरकतें करने का प्रयास करते हैं तो हमें हालात के हिसाब से कड़ा जवाब देना होगा क्योंकि देश की सुरक्षा और आत्म-सम्मान की रक्षा करना जरूरी है। मौजूदा सरकार को इस बात पर ध्यान देना चाहिए और इसका ख्याल रखना चाहिए। लेकिन हमें बातचीत के दरवाजे बंद नहीं करने चाहिए। हमें हमेशा उनसे बातचीत करने के लिए तैयार रहना चाहिए, इसलिए कूटनीतिक रिश्ते बनाए जाते हैं, व्यापार और वाणिज्य चलता रहता है, वीजा दिए जाते हैं। हमें इसे रोकना नहीं चाहिए। बातचीक के लिए हमेशा एक रास्ता खुला रहना चाहिए।”
दत्तात्रेय होसबाले ने आगे कहा, “यह तभी हो सकती है जब ज्यादा से ज्यादा पाकिस्तानी नागरिक इस बात को समझें और पाकिस्तान में गैर सरकारी लोग जैसे- खिलाड़ी, साइंटिस्ट, समुदायों के नेता इन मुद्दों को उठाएं। राजनीतिक नेतृत्व और सैन्य नेतृत्व में भारतीय राजनीति के प्रति कुछ अरुचि पैदा हो गई है। यह ही एक उम्मीद है।”
आलोचना होने पर अपने रुख को सही ठहराते हुए उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि नागरिक समाज के आपसी संबंध क्योंकि हमारे सांस्कृतिक संबंध हैं, हम एक राष्ट्र रहे हैं इसलिए कम से कम कुछ लोगों को तो इस बात पर जोर देना ही चाहिए। अगर ऐसा ही चलता रहा तो मुझे लगता है कि इससे संबंधों में सुधार हो सकता है। लोगों के बीच आपसी संपर्क को अधिक से अधिक बढ़ावा देने की कोशिश की जानी चाहिए।”
विपक्ष ने की जमकर आलोचना
इस पर विपक्षी पार्टी कांग्रेस के सांसद मनीष तिवारी ने पूछा कि 22 अप्रैल 2025 के बाद से जब पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों ने पहलगाम में आतंकी हमला किया था, ऐसा क्या ठोस बदलाव हो गया है कि अब बातचीत की जरूरत पड़ गई है? उन्होंने पूछा, “क्या ऐसा सिर्फ इसलिए है कि आपको किसी ऐसी महाशक्ति से इशारा मिल रहा है जो आज कुछ गलत कारणों से पाकिस्तान का एहसान मान रहा है और इसलिए आपको उनके साथ बातचीत शुरू करने की जरूरत पड़ रही है?
एक ओर राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने होसाबले पर निशाना साधते हुए उनकी टिप्पणी को “बेहद आपत्तिजनक” बताया। तो वहीं पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रमुख महबूबा मुफ्ती और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला जैसे कश्मीरी नेताओं ने आरएसएस महासचिव की बात का समर्थन किया है।
संघ का रुख
पाकिस्तान को लेकर भारत की पड़ोसी नीति पर आरएसएस के पिछले बयानों को देखें तो हम पाएंगे कि दत्तात्रेय होसबाले की टिप्पणियां मोटे तौर पर पाकिस्तान के प्रति आरएसएस के लंबे समय से चले आ रहे और बारीक दृष्टिकोण के मुताबिक है। इस दृष्टिकोण में अक्सर आतंकवाद के प्रति कड़ा रुख और भारत-पाक संबंधों के अलग-अलग चरणों में सुलह भरे संदेशों का मिलाप देखने को मिला है। कई मौकों पर आरएसएस ने लोगों के बीच बातचीत और मेल-जोल को बढ़ाने की वकालत की है। साथ ही आतंकी हमलों को करारा जवाब देने की जरूरत पर भी जोर दिया है।
आरएसएस सूत्रों ने बताया कि दत्तात्रेय का हालिया बयान, “असल में राष्ट्राध्यक्षों के बजाए नागरिक समाज और आम नागरिकों के जरिए बातचीत करने के पक्ष में एक तर्क था। एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा, हमारा मानना है कि पाकिस्तान के आम लोगों के बीच भारत के पक्ष में जनमत तैयार करने की जरूरत है, ताकि वे अपनी सेना का विरोध कर सकें। ऐसा केवल आम लोगों के बीच आपकी संपर्क बढ़ाने से ही हो सकता है।”
पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर के कुछ माह बाद आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने 2 अक्तूबर 2025 को अपने वार्षिक विजयादशमी संबोधन के दौरान भारत के पड़ोसियों को हमारे अपने परिवार का हिस्सा कहा था। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया था कि पड़ोसी देशों की समृद्धि भारत के हित में हैं और केंद्र सरकार को इस दिशा में काम करना चाहिए।
पाकिस्तान का नाम लिए बिना आरएसएस प्रमुख ने कहा, “यह पड़ोसी देश संस्कृति और नागरिकों के बीच लंबे समय से चले आ रहे संबंधों, दोनों ही आधारों पर भारत से जुड़े हुए हैं। इन देशों में शांति, स्थिरता और सुख-समृद्धि सुनिश्चित करना हमारी इन देशों के प्रति स्वाभाविक आत्मीयता से उत्पन्न एक आवश्यकता है, जो हमारे अपने हितों की रक्षा के विचार से कही आगे की बात है।”
28 अगस्त 2025 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मोहन भागवत ने अखंड भारत की अवधारणा पर बोलते हुए साझा सभ्यतागत इतिहास पर जोर दिया था।
उन्होंने कहा था, “अखंड भारत एक सच्चाई है। यह जीवन का एक तथ्य है, जो लोग जान-बूझकर इस सच्चाई से मुंह मोड़ते हैं, उनके साथ क्या हो रहा है? जब से वे अलग हुए हैं, जरा अब उनकी हालत देखिए। क्या वे खुश है या नहीं? कई प्रयास किए गए हैं लेकिन कोई हल नहीं मिल सका। समाधान इसलिए नहीं मिल पाया क्योंकि इस शरीर का जो अंग था, उसे काट दिया गया है। एकमात्र समाधान यही है कि हम यह समझें कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से हम एक हैं और उसी अनुरूप हम व्यवहार करें।”
मोहन भागवत ने आगे कहा था, एक समय था जब भारत के अधिकतर पड़ोसी देश खुद भारत ही थे, भूगोल वही है, नदियां वही है, लोग वही हैं, जंगल भी वही हैं, बस नक्शों पर कुछ लकीरें खींच दी गईं।
विभिन्न शहरों में दिए गए अपने सार्वजनिक भाषणों में, आरएसएस सरसंघचालक ने बार-बार यह तर्क भी दिया कि पाकिस्तान केवल जवाबी सैन्य कार्रवाई की भाषा ही समझता है, और लगातार दी जाने वाली प्रतिक्रियाएँ अंततः इस्लामाबाद को बातचीत की मेज पर ले आएंगी।
पुलवामा हमले के बाद आरएसएस का सख्त
2019 के पुलवामा हमले के बाद आरएसएस ने सख्त रुख अपनाया था। हमले के बात मोहन भागवत ने कहा था, “यह एक कायरतापूर्ण हरकत है, हम इसकी कड़ी निंदा करते हैं। हम इस घटना के जवाब में कार्रवाई की उम्मीद करते हैं। हमने बहुत कुछ सहा है और अब भी सह रहे हैं, उन्हें इसका जवाब मिलेगा।”
पठानकोट के बाद सुलह का रुख
लेकिन इससे पहले पाकिस्तान के प्रति आरएसएस का रुख अक्सर सुलह भरा रहा था, यहां तक कि पठान कोट के आतंकी हमलों के बाद भी।
साल 2016 की जनवरी में पंजाब के पठानकोट में इंडियन एयरफोर्स के अड्डे पर हुए आतंकी हमले के दिन आरएसएस ने पाकिस्तान के साथ सौहार्दपूर्ण संबंधों की जरूरत पर जोर दिया था। साथ ही, उसने पीएम मोदी के कुछ हफ्ते पहले लाहौर के अचानक दौरे का भी समर्थन किया था। यह दौरा पीएम मोदी ने पाकिस्तान के तत्कालीन पीएम नवाज शरीफ की पोती की शादी में शामिल होने के लिए किया था।
दिसंबर 2015 के आखिर में इंदौर में विश्व संघ परिवार के दौरान एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए दत्तात्रेय होसबाले ने पाकिस्तान के साथ सहजीविका के भारतीय दर्शन को स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा था, “यह दुनिया एक कुटुंब है, सभी देशों के लिए जरूरी है, उन्हें यह सीखना ही होगा।”
नवाज शरीफ के घर पीएम मोदी के खाना खाने पर हो रही आलोचना के बारे में उन्होंने कहा था, “हम इसका विरोध नहीं करते। उन्हें लंच क्यों नहीं करना चाहिए था? उन्होंने आगे कहा कि आरएसएस की वसुधैव कुटुंबकम की सोच पीएम मोदी के शरीफ के साथ खाना खाने में झलकती है। लोगों के साथ सौहार्दपूर्ण व्यवहार करना हमारा फर्ज है। यही भारत का धर्म है।”
सितंबर 2015 में आरएसएस ने भी इसी तरह पाकिस्तान के साथ बातचीत का समर्थन किया था और भारत के सभी पड़ोसियों को एक ही शरीर से बना बताया था।
आक्रामक रवैये से नपी-तुली बातचीत की ओर
मोदी युग से भी पहले, पाकिस्तान के प्रति RSS का रवैया हालात के हिसाब से बदलता रहा है। आजादी के तुरंत बाद के दशकों में इस संगठन ने बेहद आक्रामक रुख अपनाए रखा, लेकिन 1990 के दशक के आखिर और 2000 के दशक की शुरुआत में, खास तौर पर पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान, उसने अपने इस रुख में नरमी बरती।
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