राजमाता को क्यों नहीं मिला कभी कोई पद या सम्मान, लेखक रशीद किदवई ने अपनी किताब में बताया इसका कारण

रशीद किदवई के मुताबिक उस समय कई राजनीतिक जानकारों को लगा कि क्यों न इंदिरा गांधी बनाम राजमाता की बहस छेड़ दी जाए।

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राजमाता विजयाराजे सिंधिया (Express Archive)

लेखक रशीद किदवई ने अपनी किताब, ‘द हाउस ऑफ सिंधिया’, में इस बात का जिक्र किया है कि आखिर क्यों राजमाता यानी विजया राजे सिंधिया को कभी कोई बड़ा पद या सम्मान नहीं मिला? किताब, ‘द हाउस ऑफ सिंधिया’ के मुताबिक 1970 के दौर में राजमाता इस बात से नाराज थीं कि आजादी से पहले भी राजपरिवार ने गरीब लोगों की भलाई के लिए इतना कुछ किया तो ऐसे में क्यों राजपरिवार को मिलने वाले खर्च के बारे में ये कहा जा रहा है कि गरीब लोगों का पेट काटकर राजपरिवारों को पाला जा रहा है।

रशीद किदवई के मुताबिक उस समय कई राजनीतिक जानकारों को लगा कि क्यों न इंदिरा गांधी बनाम राजमाता की बहस छेड़ दी जाए। रशीद किदवई के हिसाब से ‘राजमाता को कोई सत्ता का लालच नहीं था। वे अपने मिशन में लगी हुई थीं।’ किदवई ने एक इंटरव्यू में बताया, ‘बीजेपी के संस्थापकों की बात की जाए तो अटल बिहारी वाजपेयी और दूसरे नेताओं को कितना कुछ मिला। लेकिन इस मामले में राजमाता को वैसा मान सम्मान नहीं मिला। जिसकी वो हकदार थीं। साथ ही साथ पितृसत्तात्मक समाज के चलते भी उन्हें उनका हक नहीं मिल सका।’

बता दें कि राजमाता के नाम से मशहूर विजया राजे सिंधिया का जन्म 12 अक्टूबर 1919 को हुआ था। ग्वालियर की राजमाता के रूप में लोकप्रिय, वे एक प्रमुख राजनीतिक व्यक्तित्व थीं। ब्रिटिश राज के दिनों में, ग्वालियर के अंतिम शासक महाराजा जीवाजीराव सिंधिया की पत्नी के रूप में, वह देश के सर्वोच्च शाही शख्सियतों में शुमार थीं।

बाद के जीवन में, वह काफी प्रभाव वाली राजनीतिज्ञ बन गईं और भारतीय संसद के दोनों सदनों के लिए बार-बार चुनी गईं। वह कई दशकों तक जनसंघ की सक्रिय सदस्य और भारतीय जनता पार्टी की सह-संस्थापक भी रहीं। 25 जनवरी 2001 को उनका निधन हुआ।

विजयाराजे ने 1957 में चुनावी राजनीति में कदम रखा जब उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर मध्य प्रदेश की गुना लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। पांच साल बाद, वह ग्वालियर से कांग्रेस के टिकट पर जीतीं। बाद में, उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और 1967 में स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर गुना सीट जीती।

वह जल्द ही भारतीय जनसंघ में शामिल हो गईं और राज्य की राजनीति में भाग लेने के लिए लोकसभा से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने 1967 में जनसंघ के उम्मीदवार के रूप में मध्य प्रदेश में करेरा विधानसभा सीट जीती और राज्य की राजनीति में कदम रखा।

जनसंघ ने 1971 के लोकसभा चुनावों में ग्वालियर क्षेत्र में 3 सीटें जीतने, भिंड से विजया राजे सिंधिया, ग्वालियर से वाजपेयी और गुना से माधवराव सिंधिया को चुनाव में उतारा। विजयाराजे सिंधिया ने 1977 और 1984 में लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा और 1980 में रायबरेली में इंदिरा गांधी से हार गईं।

1989 में, उन्होंने गुना से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सदस्य के रूप में जीत हासिल की, और 1991, 1996 और 1998 में इस सीट को बरकरार रखा। उन्होंने 1999 में वृद्धावस्था के कारण चुनाव नहीं लड़ा।

गौरतलब है कि आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी द्वारा उन्हें जेल में डाल दिया गया था। विजयाराजे 1980 में भाजपा नेतृत्व में सबसे आगे रहीं। उन्होंने पार्टी के राम जन्मभूमि आंदोलन को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद, उसने घोषणा की थी कि “अब वह बिना किसी पछतावे के मर सकती हैं, क्योंकि उन्होंने अपना सपना सच होते देखा है।”

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