Independence day 2026: 15 अगस्त की सुबह, 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13वीं बार दिल्ली के लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराएंगे और देश को संबोधित करेंगे। 2025 में पीएम मोदी ने 103 मिनट तक लंबा भाषण दिया था जो किसी भी प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया अब तक सबसे लंबा भाषण रहा है। भारत के हर प्रधानमंत्री 15 अगस्त को लाल किले पर जाते हैं और ध्वजारोहण करते हैं।

स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से भारतीय प्रधानमंत्रियों के भाषण देने की परंपरा उतनी ही पुरानी है जितनी कि भारत की स्वतंत्रता; इसकी शुरुआत 1947 में जवाहरलाल नेहरू ने की थी। इस परंपरा की शुरुआत 1947 में जवाहर लाल नेहरू ने की थी, हालांकि उनका संबोधन सत्ता हस्तांतरण के एक दिन बाद यानी 16 अगस्त को हुआ था। जवाहर लाल नेहरू ने अपने भाषण ने खुद को भारत का प्रथम सेवक बताया था।

ऐसे में अब सवाल उठता है कि भारत के स्वतंत्रता दिवस समारोह के लिए लाल किले को ही क्यों चुना गया और हर बार यहीं से भाषण क्यों प्रधानमंत्री देते हैं?

दिल्ली रही लंबे समय तक सत्ता का केंद्र

इतिहासकार रिचर्ड एरिक फ्राइकेनबर्ग ने अपनी किताब ‘दिल्ली थ्रू द एजेज: एसेज इन अर्बन हिस्ट्री, कल्चर एंड सोसाइटी’ (1986) की भूमिका में लिखा है, “लंबे समय से और बार-बार, दिल्ली साम्राज्य का केंद्र या ‘सत्ता की गद्दी’ रही है। दिल्ली में एक के बाद एक कई शहर बसे, जिनमें से हर एक किसी बड़े इलाके की राजधानी, गढ़ या केंद्र रहा है। यह सिलसिला हजारों सालों से चल रहा है।”

इतिहासकारों के बीच भी इस बात पर खासा बहस हुई है कि दिल्ली सत्ता का केंद्र क्यों बनी। शायद इससे भी अधिक दिलचस्प बात यह रही कि राजनीतिक महत्व हासिल करने के दौरान दिल्ली महज एक जगह नहीं रही बल्कि वह एक विचार और राजनीतिक सत्ता से जुड़ा नाम भी बन गई।

सबसे पहले दिल्ली सल्तनत 1206-1506 ने दिल्ली को अपनी राजधानी बनाई, यहां से उत्तर भारत के एक बड़े हिस्से पर शासन किया जाता था। इस सल्तनत को मध्यकालीन भारत का एक शक्तिशाली साम्राज्य कहा जाता है। फिर 16वीं सदी में मुगल वंश के संस्थापक बाबर (1483-1530) ने दिल्ली को राजधानी बनाया और सबसे पहले दिल्ली को संपूर्ण हिंदुस्तान की राजधानी कहा था।

इसके एक सदी से भी अधिक समय बाद, 1648 में शाहजहाँ ने यमुना नदी के किनारे शाहजहानाबाद का उद्घाटन किया। इसमें एक मजबूत किलेबंद गढ़ (लाल किला) और उसके चारों ओर बसी एक दीवार से घिरी बस्ती (पुरानी दिल्ली) शामिल थी। 18वीं और 19वीं सदी में मुगल शासन की ताकत तेजी से कम होने के बावजूद, शाहजहानाबाद 1857 तक मुगल राजधानी बनी रही।

इतिहासकार स्वप्ना लिडल ने 2021 में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के लिए लिखा था, “फिर भी, वैध संप्रभु सत्ता के स्रोत के तौर पर मुगल सम्राट की प्रतीकात्मक अहमियत इतनी अधिक थी कि ईस्ट इंडिया कंपनी समेत कई नए राज्यों ने 19वीं सदी तक उनके नाम पर शासन करना और सिक्के जारी करना जारी रखा।” हालांकि 1857 के विद्रोह के बाद यह स्थिति बदल गई।

1857 और ब्रिटिश सत्ता की स्थापना

1857 में ईस्ट इंडिया कंपनी कलकत्ता से भारत पर शासन कर रही थी। उस समय दिल्ली में बहुत कम यूरोपीय थे और उपमहाद्वीप में कंपनी के आर्थिक और राजनीतिक हितों की बड़ी योजनाओं के लिहाज से दिल्ली का कोई खास महत्व नहीं था। लेकिन लोगों के लिए, दिल्ली और मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फर ही स्थानीय सत्ता के सबसे बड़े प्रतीक बने हुए थे। इसी वजह से जब भारतीय सिपाहियों ने अपने ब्रिटिश अफसरों के खिलाफ बगावत की, तो जीतते ही वे दिल्ली पहुँचे तो उन्होंने बीमार बादशाह को अपना नेता घोषित कर दिया।

कंपनी की फौजों के हाथों दिल्ली के पतन (मुगल पतन) ने असल में 1857 के विद्रोह का भविष्य तय कर दिया। इसी ने मुगल बादशाह (जिन्हें रंगून निर्वासित कर दिया गया था) और खुद शहर का भविष्य भी तय कर दिया। फ्राइकेनबर्ग ने लिखा, “दिल्ली को भारी तबाही का सामना करना पड़ा। सैन्य तबाही के बाद सजा के तौर पर शहर को नुकसान पहुँचाया गया, बदले की भावना से यहां तोड़-फोड़ की गई, बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण कराया गया, ऐतिहासिक घरों की परवाह किए बिना रेलवे और उद्योगों का विकास हुआ और आधुनिक नगरपालिका प्रशासन का मिला-जुला असर देखने को मिला।”

शुरुआत में, अंग्रेजों ने पूरे शाहजहानाबाद (दिल्ली) को जमींदोज करने और इस तरह शहर से मुगल साम्राज्य की यादों को मिटाने की योजना बनाई थी। हालाँकि उन्होंने ऐसा पूरी तरह तो नहीं किया, लेकिन शाहजहानाबाद, और खासकर लाल किले पर, बहुत सोच-समझकर ब्रिटिश सत्ता की छाप छोड़ी।

सैमुअल वी. नोए ने फ्राइकेनबर्ग की एडिट की हुई किताब के एक चैप्टर ‘व्हाट हैपन्ड टू मुगल दिल्ली: ए मॉर्फोलॉजिकल स्टडी’ में लिखा, “किले के अंदरूनी हिस्से का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा (करीब 120 एकड़ का इलाका) नष्ट कर दिया गया था। यह इलाका शानदार शाही मंडपों, बगीचों, स्टोर-रूम, बैरकों और कारीगरों व दरबार के अन्य कर्मचारियों के क्वार्टरों से भरा हुआ था। वहाँ रहने वाली बड़ी आबादी को हटाकर, अंग्रेजों ने किले को एक मिलिट्री गैरीसन (सैन्य छावनी) में बदल दिया।”

विद्रोह के बाद के दशकों में, अंग्रेजों ने दिल्ली के सत्ता से जुड़े प्रतीकात्मक महत्व का व्यवस्थित रूप से इस्तेमाल किया- खासकर 1877, 1903 और 1911 के दिल्ली दरबारों के जरिए और फिर 1911 में राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने का फैसला किया।

नई दिल्ली के स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर के प्रोफ़ेसर सुओरो डी. जोआर्दार ने अपने लेख ‘नई दिल्ली: इंपीरियल कैपिटल टू कैपिटल ऑफ र्ल्ड्स लार्जेस्ट डेमोक्रेसी’ (2006) में लिखा, “बड़े भारतीय साम्राज्य में अपनी केंद्रीय स्थिति और कनेक्टिविटी के अलावा, दिल्ली का औपनिवेशिक शासकों के मन में एक प्रतीकात्मक महत्व भी था जैसा कि पुरानी कहावत है: ‘जो दिल्ली पर राज करता है, वह भारत पर राज करता है”

क्यों चुना गया लाल किला?

दिल्ली और उससे जुड़े लाल किले को साम्राज्य का केंद्र माने जाने का लंबा-चौड़ा इतिहास रहा है, इसी कारण भारत की आजादी का जश्न मनाने के लिए इसे चुना गया। यह बात और भी अहम हो जाती है क्योंकि 1946 में इसी किले में सुभाष चंद्र बोस की ‘आजाद हिंद फौज’ के वरिष्ठ अफसरों पर बहुत चर्चित मुकदमे चले थे। इन मुकदमों से लोगों में देशभक्ति की भावना जोरों पर थी और इसने भारतीय जनता के मन में लाल किले को ताकत और प्रतिरोध के प्रतीक के तौर पर मजबूती से स्थापित कर दिया था। इन्हीं कारणों से यह स्वतंत्रता संग्राम का प्रमुख स्मारक बन गया।

स्वप्ना लिडल ने 2021 में लिखा था, “आजादी मिलने के बाद, यह जरूरी था कि लाल किले की जगह को प्रतीकात्मक रूप से भारतीयों के लिए वापस हासिल किया जाए।”

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भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है। 15 अगस्त देश की आजादी की याद दिलाता है, लेकिन पंजाब के शाही इमाम मौलाना उस्मान लुधियानवी के लिए अगस्त का महीना 1947 के बंटवारे की दर्दनाक यादें भी साथ लेकर आता है। विभाजन के दौरान उनके परदादा मौलाना हबीब-उर-रहमान ने पाकिस्तान जाने के बजाय भारत में रहने का फैसला किया था। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें