4 मई 2026 को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के साथ ही ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के राजनीतिक पतन की पटकथा लिखी जाने लगी। टीएमसी एक ऐसी पार्टी जिसकी स्थापना आज से 28 साल पहले हुई थी आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। यह कहानी भारतीय राजनीति के इतिहास के उस मोड़ की है जिसने पश्चिम बंगाल की राजनीति को ना सिर्फ हमेशा के लिए बदल दिया बल्कि देश को एक ऐसा राजनेता दिया जिसने भविष्य में ‘कम्युनिस्टों के अजेय गढ़’ को ढहा दिया।

बात 28 साल पुरानी है, जब 1 जनवरी 1998 को ममता बनर्जी ने आधिकारिक तौर पर कांग्रेस से अलग होकर अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITMC) की स्थापना की थी। यह सिर्फ एक नई पार्टी का गठन नहीं था बल्कि लंबे समय से उबल रहे असंतोष, विचारधारा के टकराव और बंगाल की धरती पर खुद को साबित करने की छटपटाहट का नतीजा था। आइये समझते हैं कि आखिर वो क्या परिस्थितियां थीं जिन्होंने ममता बनर्जी को कांग्रेस छोड़ने पर मजबूर किया।

कांग्रेस की ‘आक्रामक नेता’ का उभार

  1. ममता बनर्जी के राजनीतिक सफर की बात करें तो 1970 के दशक कांग्रेस के छात्र संगठन के साथ उनके करियर की शुरुआत हुई। बेहद साधारण परिवार से आने वाली ममता बनर्जी के पास ना तो कोई बड़ा राजनीतिक बैकग्राउंड था और ना ही पैसा। लेकिन लेकिन उनके पास था- अद्भुत जुझारूपन, आक्रामक तेवर और जमीन पर लोगों से जुड़ने की कला।

उनका असली राजनीतिक उभार 1984 के लोकसभा चुनाव में हुआ। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश में सहानुभूति की लहर थी। उस चुनाव में जादवपुर संसदीय क्षेत्र से ममता बनर्जी ने कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) के कद्दावर नेता और तत्कालीन दिग्गज सोमनाथ चटर्जी को हरा दिया। इस ऐतिहासिक जीत ने ममता को रातोंरात राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिला दी। ममता देश की सबसे युवा सांसदों में से एक बन गईं।

लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, दिल्ली की राजनीति और बंगाल की जमीनी हकीकत के बीच एक बड़ी खाई चौड़ी होने लगी।

विद्रोह के मुख्य कारण: ममता ने क्यों छोड़ी कांग्रेस

  1. ममता बनर्जी के कांग्रेस छोड़ने के पीछे कोई एक कारण नहीं था। यह कई सालों से जमा हो रहा गुस्सा था। इनमें से मुख्य कारण आप यहां समझ सकते हैं।

1.माकपा-कांग्रेस की कथित सांठगांठ

यह ममता बनर्जी का सबसे बड़ा और गंभीर आरोप था। पश्चिम बंगाल में 1977 से ज्योति बसु के नेतृत्व में वाममोर्चा (Left Front) की सरकार थी। ममता बनर्जी का मानना था कि बंगाल प्रदेश कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता अंदरखाने सीपीएम (CPI-M) के साथ मिले हुए हैं।

वे कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व को ‘वामपंथियों की बी-टीम’ कहती थीं। ममता का आरोप था कि प्रदेश कांग्रेस के नेता दिल्ली में अपनी मर्जी चलाने और बंगाल में अपनी सीटें सुरक्षित रखने के लिए वामपंथियों के खिलाफ कड़ा संघर्ष नहीं करना चाहते। जब भी ममता माकपा सरकार के खिलाफ कोई बड़ा आंदोलन शुरू करतीं, प्रदेश कांग्रेस के नेता या तो उससे दूरी बना लेते या उसे कमजोर करने की कोशिश करते।

2. वैचारिक और रणनीतिक मतभेद

ममता बनर्जी का मानना था कि वामपंथ को केवल उग्र और आक्रामक जमीनी राजनीति से ही मात दी जा सकती है। इसके विपरीत, पश्चिम बंगाल कांग्रेस के तत्कालीन बड़े नेता (जैसे सोमेन मित्रा, जो उस समय प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे) ज्यादा पारंपरिक और संस्थागत राजनीति पर भरोसा करते थे।

ममता की ‘सड़क की राजनीति’ को कांग्रेस का एक धड़ा नापसंद करता था और उन्हें ‘अनुशासनहीन’ मानता था। वहीं ममता को लगता था कि कांग्रेस के डाइनिंग-टेबल और बंद कमरों की राजनीति से सीपीएम के कैडर-आधारित मजबूत संगठन को कभी नहीं हराया जा सकता।

  1. 3.1997 का संगठनात्मक चुनाव और व्यक्तिगत टकराव

1997 आते-आते ममता बनर्जी और पश्चिम बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष सोमेन मित्रा के बीच का विवाद चरम पर पहुंच गया। उस साल प्रदेश कांग्रेस के संगठनात्मक चुनाव होने थे। ममता बनर्जी ने सोमेन मित्रा के खिलाफ अपने उम्मीदवार उतारे।

जब चुनाव के नतीजे आए तो सोमेन मित्रा का गुट जीत गया। ममता बनर्जी ने इस चुनाव में भारी धांधली और फर्जी वोटिंग का आरोप लगाया। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि पार्टी के भीतर उनके समर्थकों को जानबूझकर दरकिनार किया जा रहा है। इस हार और अपमान ने ममता को यह अहसास करा दिया कि वे कांग्रेस के भीतर रहकर कभी भी बंगाल की कमान नहीं संभाल पाएंगी।

4.केंद्रीय नेतृत्व की बेरुखी

ममता बनर्जी ने कई बार दिल्ली जाकर आलाकमान (उस समय सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष थे) से गुहार लगाई कि बंगाल कांग्रेस में बदलाव किया जाए और वामपंथ के खिलाफ एक मजबूत रणनीति बनाई जाए। लेकिन दिल्ली दरबार ने ममता की आक्रामकता को संभालने के बजाय प्रदेश के पुराने और स्थापित नेताओं पर भरोसा बनाए रखना बेहतर समझा।

सोनिया गांधी उस समय सक्रिय राजनीति में कदम रख ही रही थीं, इसलिए केंद्रीय स्तर पर कोई ऐसा मजबूत नेता नहीं था जो ममता के गुस्से को शांत कर पाता या उन्हें कोई ठोस आश्वासन दे पाता।

1997 का संगठनात्मक चुनाव और व्यक्तिगत टकराव

यूं तो टीएमसी की स्थापना 1998 में हुई लेकिन इसकी वैचारिक नींव 21 जुलाई 1993 को ही पड़ गई थी। उस दिन ममता बनर्जी के नेतृत्व में युवा कांग्रेस ने ‘नो वोटर आई-कार्ड, नो वोट’ (बिना मतदाता पहचान पत्र के मतदान नहीं) के नारे के साथ राइटर्स बिल्डिंग (तत्कालीन सचिवालय) के घेराव का आह्वान किया था। उनका आरोप था कि माकपा फर्जी वोटों के सहारे चुनाव जीतती है।

    इस प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने बेरहमी से लाठीचार्ज किया और गोलियां चलाईं जिसमें 13 युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मौत हो गई। इस घटना ने ममता बनर्जी को बंगाल में वामपंथ विरोधी राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा बना दिया। लेकिन ममता को दुख इस बात का था कि इतनी बड़ी त्रासदी के बाद भी प्रदेश कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने उस तरह का कड़ा रुख नहीं अपनाया जिसकी वे उम्मीद कर रही थीं। इसी घटना के बाद से ममता ने मन बना लिया था कि उनकी राहें अब कांग्रेस से अलग हैं।

    1 जनवरी 1998: ‘तृणमूल’ का जन्म

    1. सौरव मित्रा को कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी और वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी का समर्थन हासिल था। दिसंबर 1997 में ‘पार्टी-विरोधी’ टिप्पणियों के कारण ममता को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया या यूं कहें कि उन्होंने खुद को पार्टी से पूरी तरह अलग कर लिया। इसके बाद उन्होंने एक नई शुरुआत करने का फैसला किया।

    1 जनवरी 1998 को ‘तृणमूल कांग्रेस’ (Trinamool Congress) का गठन हुआ। ‘तृणमूल’ का शाब्दिक अर्थ होता है- ‘घास की जड़’ (Grassroots)। ममता यह मैसेज देना चाहती थीं कि उनकी पार्टी वीआईपी लोगों की नहीं बल्कि जमीन से जुड़े गरीब और आम लोगों की पार्टी है। पार्टी का प्रतीक चिन्ह ‘जोड़ा फूल’ (घास के बीच उगे दो फूल) चुना गया जो इसी जमीनी जुड़ाव को दर्शाता था।

    कांग्रेस से अलगाव का क्या असर हुआ?

    1. 28 साल पहले हुए ममता और कांग्रेस के अलगाव का भारतीय राजनीति और विशेषकर बंगाल पर बड़ा असर हुआ। इसका विश्लेषण इस तरह किया जा सकता है:

    बंगाल में कांग्रेस का सफाया
    ममता के अलग होते ही पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का जनाधार पूरी तरह खिसक गया। कांग्रेस के जितने भी जमीनी और आक्रामक कार्यकर्ता थे, वे सब ममता के साथ चले गए। कांग्रेस सिर्फ मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे कुछ गिने-चुने जिलों तक सिमट कर रह गई जहां बरकत गनी खान चौधरी जैसे नेताओं का व्यक्तिगत प्रभाव था।

    कांग्रेस छोड़ने के बाद ममता बनर्जी के तेवर और आक्रामक हो गए थे। दिलचस्प बात यह रही कि ममता बनर्जी को कांग्रेस ने पार्टी से निकाला था और साल 2001 में टीएमसी के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ा। कांग्रे कुल 26 सीटें ही जीत पाई। साल 2011 में कांग्रेस ने एक बार फिर ममता के साथ साझेदारी की और 42 सीटें जीतीं। लेकिन 2016 में पार्टनरशिप फिर टूटी और कांग्रेस ने लेफ्ट पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और 44 सीटों पर कब्जा कर लिया।

    लेकिन 2021 का चुनाव आया और कांग्रेस का बंगाल से पूरी तरह सफाया हो गया। हाल ही में हुए 2026 विधानसभा चुनाव में कंग्रेस महज़ दो सीटें ही जीत पाई है। आज स्थिति यह है कि बंगाल में कांग्रेस अपनी प्रासंगिकता बचाने के लिए संघर्ष कर रही है।

    विपक्ष की कमी को पूरा करना
    ममता बनर्जी ने भांप लिया था कि बंगाल की जनता वामपंथ से त्रस्त हो रही थी, लेकिन उन्हें कांग्रेस के रूप में एक मजबूत विकल्प नहीं दिख रहा था। तृणमूल कांग्रेस बनाकर ममता ने उस राजनीतिक शून्य (Political Vacuum) को भर दिया। वे राज्य में माकपा के खिलाफ एकमात्र और सबसे बड़ी आवाज बन गईं।

    सिंगूर और नंदीग्राम से सत्ता का शिखर
    शुरुआती सालों में ममता को भी काफी संघर्ष करना पड़ा। 2001 और 2006 के विधानसभा चुनावों में उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा। कई लोगों ने मान लिया था कि ममता का प्रयोग विफल हो गया।

    लेकिन 2007-2008 में सिंगूर और नंदीग्राम के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलनों ने पासा पलट दिया। ममता ने एक बार फिर साबित किया कि सड़क की लड़ाई में उनका कोई सानी नहीं है। आखिरकार 2011 में उन्होंने 34 साल पुरानी वामपंथी सरकार को उखाड़ फेंका।

    कांग्रेस से बगावत कर ममता हुईं सफल

    अगर 28 साल पहले ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होने का जोखिम न लिया होता तो शायद वे दिल्ली की राजनीति में एक केंद्रीय मंत्री या कांग्रेस के भीतर एक तेजतर्रार नेता के रूप में ही सीमित रह जातीं। उनका कांग्रेस से अलग होना भारतीय लोकतंत्र की उस हकीकत को बयां करता है कि जब-जब क्षेत्रीय आकांक्षाओं और जमीनी हकीकत को राष्ट्रीय पार्टियों के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा नजरअंदाज किया गया, तब-तब एक नए और मजबूत क्षेत्रीय दल का उदय हुआ।