Jyotiraditya Scindia Anger: केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में एक सीवरेज परियोजना में कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर गुस्सा जाहिर किया है, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर काफी ज्यादा वायरल हो रहा है। जिला विकास समन्वय एवं निगरानी समिति यानी दिशा की बैठक के वीडियो में सिंधिया ने कहा, “यह बेहद ही दुखद हैं।”
दरअसल, सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में ज्योतिरादित्य सिंधिया यह कहते हुए नजर आए, “यह अत्यंत दुख की बात है। 113 करोड़ रुपये की लागत से मैं जो परियोजना यहां लाया था, वह पूरी तरह से अनियमितताओं और भ्रष्टाचार का शिकार हो गई है। इसकी समीक्षा और जांच की जाएगी।”
113 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट
राष्ट्रीय झील संरक्षण परियोजना के तहत परिकल्पित और 2013 में स्वीकृत, 113 करोड़ रुपये की इस योजना का उद्देश्य शिवपुरी की आपस में जुड़ी झीलों, विशेष रूप से जाधव सागर और सख्या सागर में सीवेज को प्रवेश करने से रोकना था लेकिन परियोजना में देरी और बढ़ते खर्च को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
इस मामले में जुलाई में हुई सुनवाई में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने सवाल उठाया कि क्या शहर की सीवेज समस्याओं का समाधान न करने वाली इस परियोजना पर इतना खर्च करना उचित है। वहीं, जिला प्रशासन ने कहा है कि धन की कमी के कारण परियोजना को लागू नहीं किया जा सकता है।
इस मामले में शिवपुरी के कलेक्टर अर्पित वर्मा कहा, “मैंने बैठक में कहा था कि यह परियोजना संभव नहीं है। दोषी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने के लिए संबंधित विभाग द्वारा एक अलग जांच चल रही है।”
शिवपुरी सीवेज परियोजना और अदालती जांच
शिवपुरी का मलबा ऐतिहासिक रूप से जाधव सागर और फिर आगे के जल निकायों में बहता था। जल प्रदूषण को कम करने के लिए सीवर नेटवर्क, मलबा पंपिंग अवसंरचना और एक सीवेज उपचार संयंत्र विकसित करने के उद्देश्य से शिवपुरी सीवरेज परियोजना की परिकल्पना की गई थी।
इस परियोजना को मूल रूप से 2013 में 69.51 करोड़ रुपये की लागत से मंजूरी दी गई थी। बाद में इसे संशोधित करके 92 करोड़ रुपये कर दिया गया और फिर इसमें तीसरा संशोधन किया गया, जिससे परियोजना की अनुमानित लागत 113.42 करोड़ रुपये हो गई।
कैसे सामने आई कमियां
PHE ने इस वृद्धि का कारण अतिरिक्त खुदाई, सीवर में बदलाव, सड़क की मरम्मत, उच्च अनुमति लागत संबंधित कई खर्ज बताए। लेकिन जैसे-जैसे परियोजना आगे बढ़ी, इसकी कमियां स्पष्ट होने लगीं। मुख्य समस्या यह थी कि सीवर नेटवर्क और उपचार संयंत्र उन घरों से प्रभावी ढंग से जुड़े नहीं थे जिनसे अपशिष्ट पदार्थ उत्पन्न हो रहा था।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के समक्ष कार्यवाही में राज्य ने न्यायालय को बताया कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण 2019 में हुआ था, लेकिन सीवेज न पहुंचने के कारण यह कभी चालू नहीं हो पाया। राज्य ने यह भी कहा कि व्यक्तिगत घरेलू कनेक्शन शिवपुरी नगर परिषद की जिम्मेदारी है और इसे मूल एनएलसीपी परियोजना में शामिल नहीं किया गया था।
जनता के पैसों की बर्बादी
बता दें कि यह चूक उच्च न्यायालय की जांच का मुख्य बिंदु बन गई। 24 जून, 2026 के अपने आदेश में कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब अधिकारियों को पता था कि घरेलू कनेक्शन के बिना सीवर लाइनों से सीवेज का कोई प्रभावी स्रोत नहीं होगा, तो एक पूर्ण सीवरेज परियोजना की योजना क्यों नहीं बनाई गई। पीठ ने कहा कि ऐसी प्रणाली पर 111 करोड़ रुपये खर्च करना “जनता के धन की बर्बादी” हो सकती है, और सवाल उठाया कि पर्यावरण योजना और समन्वय संगठन ने इस खर्च की अनुमति क्यों दी, जबकि यह परियोजना शिवपुरी के नागरिकों को 1% भी लाभ नहीं पहुंचाएगी।
110 करोड़ के खर्च के बाद भी नहीं हुई कार्रवाई
हाईकोर्ट ने कहा, “प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि पीएचई विभाग ने 110 करोड़ रुपये बर्बाद करने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की।” जिससे एसटीपी शहर के निवासियों को बिना किसी लाभ के छोड़ दिया गया। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि सीवर नेटवर्क बिछाने के लिए भुगतान क्यों किया गया, जबकि पहले यह सत्यापित नहीं किया गया था कि लाइनें निर्धारित ढलान सहित विनिर्देशों के अनुसार बनाई गई थीं या नहीं।
इसके बाद अदालत ने परियोजना को खराब योजना और उतनी ही खराब क्रियान्वयन का एक अनुकरणीय मामला बताया, और कहा कि यह अपने क्रियान्वयन की अवधि से कई साल आगे निकल गई थी और अपनी प्रारंभिक परियोजना लागत से कई गुना अधिक खर्च कर चुकी थी फिर भी घरेलू सीवेज को एसटीपी में उपचार के लिए मुख्य लाइनों से जोड़ने में विफल रही। अदालत द्वारा निर्देशित रिकॉर्ड में कहा गया है कि इस समस्या के समाधान के लिए नई योजना और अतिरिक्त संसाधनों की आवश्यकता होगी।
जवाबदेही तय करने का निर्देश
27 जुलाई को हुई सुनवाई में न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने 111 करोड़ रुपये की कथित बर्बादी को लेकर जवाबदेही की अदालत की मांग पर वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों की प्रतिक्रिया पर आपत्ति जताई। वहीं पहले अदालत ने शहरी विकास एवं आवास विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव संजय दुबे को जब्त किए गए दस्तावेजों की व्यक्तिगत रूप से जांच करने और धनराशि की बर्बादी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने का निर्देश दिया था।
अधिकारी ने पेशी से छूट मांगी और तर्क दिया कि लोक स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के प्रधान सचिव जवाबदेही तय करने के लिए सक्षम प्राधिकारी हैं और अतिरिक्त मुख्य सचिव परियोजना के तकनीकी पहलुओं के विशेषज्ञ नहीं हैं। पीठ ने इस रुख की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि दुबे के आवेदन से यह स्पष्ट हो गया है कि वे अपूर्ण सीवेज लाइन और सीवेज उपचार परियोजना की मंजूरी के संबंध में प्रारंभिक जांच में भी शामिल नहीं होना चाहते।
अदालत ने कहा कि परियोजना निर्धारित मानकों के अनुसार निष्पादित नहीं की गई थी, जिसके परिणामस्वरूप शिवपुरी निवासियों को न केवल दूषित पानी की आपूर्ति हुई, बल्कि वन संपदा को भी व्यापक क्षति पहुंची। अदालत ने पर्यावरण योजना एवं समन्वय संगठन (ईपीसीओ) की तत्कालीन कार्यकारी निदेशक अलका उपाध्याय के उस जवाब की भी कड़ी आलोचना की, जिसमें उन्होंने पूछा था कि एक अपूर्ण परियोजना को मंजूरी क्यों दी गई थी।
टालमटोल का रास्ता अपना – हाईकोर्ट
अदालत ने कहा कि उनका जवाब “स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि उन्होंने भी अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए टालमटोल का रास्ता अपनाया है, और उन पर 20,000 रुपये का जुर्माना लगाते हुए वसूली कार्यवाही और अवमानना कार्रवाई की चेतावनी दी। अदालत ने शिवपुरी निवासियों के मौलिक अधिकारों और सार्वजनिक खजाने के हितों का हवाला देते हुए राज्य को सीवेज लाइनों की पूर्ण विफलता के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों की देनदारियों और जवाबदेही” को सूचीबद्ध करते हुए एक अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने का भी आदेश दिया।
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