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Blog: एक साधारण भाषण से क्‍यों हीरो बना कन्‍हैया

देश को ऐसे हीरोइज्‍म या हीरो की जरूरत नहीं है, क्‍योंकि यह क्षणिक है। यह नायकत्‍व व्‍यक्ति की शख्‍सीयत या उसके काम से उपजा नहीं है।

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देशविरोधी नारे लगाने के आरोप में गिरफ्तार किए गए और अब जमानत पर छूटे देशद्रोह के आरोपी जेएनयूएसयू अध्‍यक्ष कन्‍हैया कुमार आज हीरो हैं। पर देश को ऐसे हीरोइज्‍म या हीरो की जरूरत नहीं है, क्‍योंकि यह क्षणिक है। यह नायकत्‍व व्‍यक्ति की शख्‍सीयत या उसके काम से उपजा नहीं है। यह नेताओं की ओछी राजनीति, मीडिया और हम-आप जैसे लोगों द्वारा थोपा गया नायकत्‍व है। कन्‍हैया को भी इसका अहसास है कि इस नायकत्‍व के दिन चार ही हैं। शायद तभी उन्‍होंने अपने भाषण में कहा भी कि भारत में लोग बातें जल्‍दी भूल जाते हैं।

पॉलिटिक्‍स: कन्‍हैया ने जेल से लौटने के बाद जेएनयू कैंपस में दिए गए अपने भाषण में ऐसा कुछ नहीं कहा जो क्रांतिकारी या नया हो। पर अरविंद केजरीवाल ने इसे जबरदस्‍त बताने में तनिक भी देर नहीं की। उधर, नीतीश कुमार भी पीछे नहीं रहे। उन्‍होंने भी कन्‍हैया को शुभकामनाएं दे डालीं। जाहिर है, कन्‍हैया की तारीफ या उनसे हमदर्दी के पीछे इन नेताओं का असल निशाना नरेंद्र मोदी ही हैं। असल में नेताओं ने (सत्‍ता पक्ष और विपक्ष दोनों के) कन्‍हैया का मामला कानून तोड़ने का सामान्‍य मामला भर रहने ही नहीं दिया। इसे लेफ्ट बनाम राइट बना दिया गया। नेताओं की खेमेबंदी इसी रूप में हो गई और जो सीधे-सीधे लेफ्ट या राइट नहीं हैं, उन्‍होंने भी मुद्दे को छोड़ने के बजाय किसी एक खेमे की पूंछ पकड़ ली।

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मीडिया: कन्‍हैया के मामले में एक तरह से मीडिया में भी साफ खेमेबंदी दिखी। पूरे एपिसोड को कवरेज भी जोरदार मिला। कन्‍हैया के करीब 50 मिनट के भाषण को टीवी चैनलों ने लाइव दिखाया। शायद पहली बार किसी जेएनयूएसयू अध्‍यक्ष का भाषण (और वह भी इतना लंबा) तमाम चैनलों पर एक साथ लाइव चला। लगभग तमाम अखबारों ने भी उसे ही पहली सुर्खी बनाया। और, सोशल मीडिया के बारे में तो कहना ही क्‍या! मीडिया (खास कर टीवी) और सोशल साइट्स के लिए आज कन्‍हैया का दिन था। उन्‍हें हीरो बनाने का। कुछेक दिन पहले यही उन्‍हें ‘देशद्रोही’ का तमगा देते नहीं थक रहे थे।

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जनमानस: कन्हैया का भाषण अच्‍छा जरूर था, पर उसमें कुछ भी नया नहीं था। उन्‍होंने जो कहा वह वामपंथ की राजनीति का आधार रहा है। पर सोशल मीडिया पर तारीफों की बाढ़ आ गई। न केवल भाषण की, बल्कि कन्‍हैया की। कोई कहने लगा- ‘हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की’, तो किसी ने लिखा- आज चुनाव लड़ें तो नरेंद्र मोदी भी कन्‍हैया से हार जाएंगे। यह हमारी आदत है कि हम किसी को जितनी जल्‍दी कन्‍हैया बनाते हैं, उतनी ही जल्‍दी कंस भी बना देते हैं। उदाहरणों की भरमार है। अन्‍ना हजारे और अरविंद केजरीवाल इस कड़ी में ताजा नाम गिनाए जा सकते हैं।

भाषण में क्‍या था: कन्‍हैया के भाषण में सबक लेने लायक कोई बात थी तो वह वामपंथियों के लिए ही थी। उन्‍होंने कहा, ‘जेएनयू में हम सभी को सेल्फ क्रिटिसिज्‍म की जरूरत है क्योंकि हम जिस तरह से यहां बात करते हैं वो बात आम जनता को समझ में नहीं आती है। हमें इस पर सोचना चाहिए।’ देश में वामपंथ राजनीति सालों से इस समस्‍या से जूझ रही है। वह जनता के हितों की बात करती है, फिर भी जनता उनकी सुनती नहीं है। कन्हैया ने अपने जेल के अनुभव गिनाते हुए संकेत दिया कि वामपंथियों को दलितों को साथ लेकर चलना होगा। वामपंथी पार्टियां इस पर सोच सकती हैं।

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