Kerala Election News: वायनाड जिले का वडक्कनाड पहले एक समृद्ध और खुशहाल गांव था। लेकिन अब यह पहले जैसा नहीं रहा। गांव के चौक पर टूटी-फूटी इमारतें हैं, कई घर खाली पड़े हैं और खेत भी उजाड़ हो गए हैं। अब यह गांव अपने पुराने अच्छे दिनों की सिर्फ एक झलक भर रह गया है।

वडक्कनाड के 67 साल के किसान नारायणन चेट्टी का कहना है कि उन्होंने अपनी पांच एकड़ जमीन छोड़ दी है। वे कहते हैं, “यहां कोई भी ग्रामीण खेती नहीं करना चाहता क्योंकि फसल उगने या कटाई का समय आने तक हाथी या अन्य जंगली जानवर सब कुछ लूट लेते हैं। हर कोई गांव छोड़ना चाहता है। जिनके पास कहीं और पांच सेंट जमीन (घर बनाने के लिए) खरीदने के संसाधन हैं, वे भी गांव छोड़कर जा रहे हैं। हममें से ज्यादातर लोग सुरक्षित जगहों पर पलायन करने में असमर्थ हैं। हम यहां पर जीवन यापन के लिए संघर्ष कर रहे हैं।”

केरल में 9 अप्रैल को विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में सुल्तान बाथरी विधानसभा क्षेत्र का वडक्कनाड राज्य के कई क्षेत्रों का एक छोटा सा उदाहरण हो सकता है, जहां मानव-पशु संघर्ष चुनावी चर्चा के प्रमुख मुद्दों में से एक बनकर उभरा है।

यह मुद्दा वडक्कनाड के सामाजिक जीवन पर गहरा प्रभाव डाल रहा है। काम के लिए गांव से बाहर जाने वालों को शाम ढलने से पहले वापस लौटना पड़ता है। अगर यात्रा में देरी होती है, तो रात में उन्हें जंगलों से सटे स्थानीय बागानों के जंगली जानवरों के हमलों का खतरा रहता है। गांव के कैथोलिक गिरजाघर में फिलहाल सिर्फ 96 परिवार हैं। गिरजाघर के पादरी जोस मोलोपरम्बिल ने बताया, “हमारे यहां 20 से 40 साल की उम्र के 20 पुरुष अविवाहित हैं। दूसरे समुदायों में भी यही समस्या है। कोई भी अपनी बेटियों की शादी इस इलाके के दूल्हों से करने को तैयार नहीं है। लोगों ने खेती-बाड़ी छोड़ दी है और युवा तरह-तरह के काम की तलाश में पास के शहरों में चले गए हैं। कुछ गृहिणियां विदेश में नौकरानी का काम करने चली गई हैं क्योंकि उनके पति यहां खेती करके अपना गुजारा नहीं कर सकते।”

यह भी पढ़ें: केरल चुनाव: महिला वोटर्स पर कांग्रेस का दांव, मुफ्त बस सफर और बीमा योजनाओं से जीत की उम्मीद

कहा जाता है कि पिछले 15 सालों में लगभग 50 परिवार गांव छोड़कर चले गए हैं। उनमें से कुछ ने अपनी जमीन बेच दी है, जबकि कई लोग किराए पर रह रहे हैं। इस गांव के ऑर्थोडॉक्स चर्च में 23 परिवार रहते हैं। इनमें से ज्यादातर लोग सुल्तान बाथरी कस्बे में चले गए हैं। यहां पर हाथियों के हमले की घटनाएं भी अक्सर होती रहती हैं। वडक्कनाड, वायनाड के वन क्षेत्र में स्थित कई गांवों में से एक है और जिले का लगभग 36% भाग वन क्षेत्र से ढका हुआ है।

किसी को हमारी जान की चिंता नहीं- किसान

वडक्कनाड के एक अन्य किसान ने कहा, “हमारे लोग पूरी तरह से निराश हैं। न तो सरकार को हमारी जान की चिंता है और न ही किसी पार्टी को। वन्यजीवों को ही प्राथमिकता दी जाती है। हमें चुनावों में कोई दिलचस्पी नहीं है। हमारी मदद कौन करेगा, कौन हमारी जान और खेतों को बचाएगा? जंगल में जानवरों के लिए पर्याप्त चारा नहीं है और वे हमारी जमीनों में घुसपैठ कर रहे हैं। जो परिवार यहीं रह रहे हैं, उनके पास बाहर आजीविका का कोई और साधन नहीं है। फसल के नुकसान का मुआवजा बहुत कम है और वन्यजीवों के लगातार हमलों ने सभी किसानों का मनोबल गिरा दिया है।”

लगभग 100 किलोमीटर दूर कोझिकोड के पेरामब्रा निर्वाचन क्षेत्र के पूझितोड गांव के रहने वाले भी वन्यजीवों के हमलों से जूझ रहे हैं और पिछले कुछ सालों में इसके 360 परिवारों में से लगभग 90 परिवारों को पलायन का सहारा लेना पड़ा है। चक्किटपारा पंचायत में गांव का प्रतिनिधित्व करने वाली मोली अयितारामट्टम ने कहा, “गांव में खेती करना नामुमकिन हो गया है, इसलिए हम सभी बाहर जाने के विकल्प तलाश रहे हैं। लोगों के गांव छोड़ने के बाद बस सेवाएं भी कम हो गई हैं। पहले चार बसें चलती थीं, अब सिर्फ एक ही बस गांव जाती है। कारोबार घटने के कारण एक बैंक ने अपनी शाखा दूसरी जगह ट्रांसफर कर दी है। कई किसानों ने अपनी जमीन छोड़ दी है, जो धीरे-धीरे जंगल में बदल जाएगी। इससे स्थिति और भी खराब हो गई है।”

पूझितोड के किसान थॉमस प्लाथोट्टम राजनीतिक दलों की इस बात के लिए आलोचना करते हैं कि उनके पास “किसानों की इस समस्या का कोई स्पष्ट समाधान नहीं है।” वे कहते हैं, “दल एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। एलडीएफ सरकार का कहना है कि बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 में संशोधन को मंजूरी देनी होगी ताकि राज्य को मानव जीवन के लिए खतरा पैदा करने वाले जंगली जानवरों को मारने के लिए ज्यादा अधिकार मिल सकें। बीजेपी का दावा है कि मौजूदा कानून में इस समस्या के समाधान के लिए पर्याप्त प्रावधान हैं और सारा दोष राज्य सरकार पर मढ़ रही है।”

यह भी पढ़ें: केरल की सड़कों पर साइकिल चलाते दिखे राहुल गांधी; राज्य में महिला मुख्यमंत्री को लेकर कही यह बड़ी बात

70 निर्वाचन क्षेत्र जंगली जानवरों के हमलों से जूझ रहे

केरल सरकार के अनुसार, राज्य के 140 निर्वाचन क्षेत्रों में से 70 वन्यजीवों के हमलों से जूझ रहे हैं। वन क्षेत्रों में कमी और खेती के तरीकों में बदलाव के अलावा, कई मानवीय गतिविधियां भी वन्यजीव हमलों के बढ़ने का कारण बन रही हैं। जैसे जानवरों के रहने वाले इलाकों के पास लोगों की संख्या बढ़ना, जंगलों के आसपास कचरा फेंकना और निर्माण कार्य करना। इन वजहों से केरल में वन्यजीव हमलों की घटनाएं बढ़ती मानी जा रही हैं।

पिछले महीने राज्य विधानसभा में सरकार की तरफ से दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, 2020-21 से 2024-25 के बीच राज्य में जंगली जानवरों (जंगली सूअर, हाथी, बाघ) के हमलों में 200 लोगों की मौत हुई। 6,329 लोग घायल हुए, जबकि जंगलों के बाहर सांप के काटने से 233 लोगों की मौत हुई। इस दौरान फसलों के नुकसान की 62,199 घटनाएं दर्ज की गईं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, राज्य की 941 पंचायतों में से 273 पंचायतें वन्यजीवों के हमलों से प्रभावित हुई हैं। त्रिशूर के चेलक्कारा निर्वाचन क्षेत्र में, वन विभाग ने पिछले पांच सालों में जंगली हाथियों द्वारा फसलों को नष्ट करने की 191 घटनाओं की रिपोर्ट की है।

एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप

सत्ताधारी सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाले एलडीएफ, प्रमुख विपक्षी कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी वन्यजीव हमलों की बढ़ती घटनाओं को लेकर एक-दूसरे को दोषी ठहरा रहे हैं, वहीं मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने इसे एक गंभीर सामाजिक मुद्दा बताया है।

विजयन ने पिछले हफ्ते कहा था, “एलडीएफ सरकार ने बार-बार हस्तक्षेप किया है। विधानसभा ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम में संशोधन के लिए एक विधेयक भी पारित किया (अक्टूबर 2025 में)। लेकिन इसे अभी तक केंद्र की मंजूरी नहीं मिली है। राज्य अकेले कार्रवाई नहीं कर सकता। जंगली सूअर को हानिकारक जीव घोषित करने की राज्य की मांग को केंद्र ने बार-बार खारिज कर दिया है। 1972 का अधिनियम कांग्रेस द्वारा लाया गया था और अब बीजेपी शासित केंद्र इसके संशोधन में बाधा डाल रहा है। इससे मामला और भी ज्यादा मुश्किल हो गया है।”

कांग्रेस ने इस विवाद को लेकर सीपीआई (एम) को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की है। भारतीय जनता पार्टी ने एलडीएफ पर निशाना साधते हुए राज्य उपाध्यक्ष शॉन जॉर्ज पर आरोप लगाया कि विजयन सरकार “इस गंभीर मामले का प्रभावी ढंग से समाधान नहीं कर रही है।” उन्होंने कहा, “1972 के अधिनियम में वन्यजीवों के हमलों को रोकने के लिए पर्याप्त प्रावधान हैं, जो मानव जीवन और फसलों के लिए खतरा पैदा करते हैं। केंद्र ने इस बारे में राज्य सरकार को सूचित कर दिया है, लेकिन फिर भी केंद्र इस संकट के लिए केंद्र को ही दोषी ठहरा रहा है।”