नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) ने शनिवार को लद्दाख ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल (LAHDC) के चीफ एग्जीक्यूटिव काउंसलर (CEC) डॉ. जाफर अली अखून को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से छह साल के लिए निकाल दिया। इस एक्शन की वजह जाफर अखून का बीजेपी के समर्थन से कारगिल जिले का सालाना बजट पास करवाना था। भले ही बीजेपी के जाफर अखून को समर्थन करने से कारगिल में राजनीतिक बदलाव की अटकलें तेज हो गई हैं लेकिन NC ने अब तक सिर्फ अखून के खिलाफ एक्शन लिया है, न कि अपने उन 12 काउंसलर के खिलाफ जिन्होंने बजट के पक्ष में वोट दिया था।
LAHDC, कारगिल इस इलाके की चुनी हुई लोकल गवर्नेंस बॉडी है। इसमें 30 सदस्य हैं, जिसमें 26 चुने हुए और चार नॉमिनेटेड सदस्य होते हैं। पिछले LAHDC कारगिल चुनाव अक्टूबर 2023 में हुए थे, जो 2019 में आर्टिकल 370 हटने और जम्मू-कश्मीर राज्य के बंटवारे के बाद लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद पहले चुनाव थे।
NC-कांग्रेस में है गठबंधन
NC-कांग्रेस गठबंधन ने 26 में से 22 सीटें जीतकर चुनावों में जीत हासिल की। NC को 12 और कांग्रेस को 10 सीटें मिलीं, जबकि BJP को केवल दो सीटें मिलीं और एक सीट निर्दलीय उम्मीदवार के खाते में गई। चार नॉमिनेटेड पार्षदों ने BJP का साथ दिया, जिससे काउंसिल में उसकी संख्या छह हो गई।
चूंकि दोनों गठबंधन सहयोगियों ने लगभग बराबर सीटें जीती थीं, इसलिए NC और कांग्रेस पावर-शेयरिंग अरेंजमेंट पर सहमत हो गए। समझौते के तहत NC पहले ढाई साल तक काउंसिल की प्रमुख होगी, जिसके बाद CEC का पद कांग्रेस को सौंप दिया जाएगा। जाफर अखून को NC के नॉमिनी के तौर पर CEC चुना गया।
दिक्कत कहां से शुरू हुई?
जब NC का ढाई साल का कार्यकाल खत्म हुआ, तो जाफर अखून ने पद छोड़ने से मना कर दिया, जिससे गठबंधन के अंदर राजनीतिक टकराव शुरू हो गया। इस साल मई में कांग्रेस ने उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया, जिसे कुछ NC पार्षदों ने सपोर्ट किया।
जबकि प्रस्ताव पेंडिंग था, सालाना बजट काउंसिल में जाफर अखून की मेजॉरिटी का पहला बड़ा टेस्ट बन गया। बजट आखिरकार सभी 12 NC काउंसलर, छह BJP काउंसलर, एक कांग्रेस काउंसलर और एक निर्दलीय के समर्थन से पास हो गया। 9 कांग्रेस काउंसलर और एक अन्य इंडिपेंडेंट प्रोसिडिंग से दूर रहे।
इस वोट ने न सिर्फ जाफर अखून की स्थिति मजबूत की, बल्कि कारगिल में NC और BJP के कुछ हिस्सों के बीच एक नए गठबंधन की संभावना का भी इशारा दिया। हालांकि जाफर अखून ने BJP के समर्थन को बिना शर्त समर्थन बताया और किसी भी पॉलिटिकल अंडरस्टैंडिंग से इनकार किया।
NC के लिए क्या दांव पर लगा है?
NC के लिए यह डेवलपमेंट पॉलिटिकल रूप से सेंसिटिव समय पर हुआ। पार्टी जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा वापस दिलाने के मुद्दे पर BJP की अगुवाई वाली केंद्र सरकार के खिलाफ अपना पहला बड़ा राजनीतिक कैंपेन चला रही है। ऐसे में अखून का BJP से समर्थन लेना पार्टी नेतृत्व को राजनीतिक रूप से ठीक नहीं लगा, जिसके कारण उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया।
लद्दाख में राजनीतिक समीकरण अक्सर असरदार सामाजिक-धार्मिक संस्थाओं से उतने ही बनते हैं जितने कि राजनीतिक पार्टियां से। कारगिल में, ऐसी दो संस्थाएं (इस्लामिया स्कूल कारगिल और इमाम खुमैनी मेमोरियल ट्रस्ट) चुनावी नतीजों पर असर डालने में अहम भूमिका निभाती हैं। जहां इस्लामिया स्कूल पारंपरिक रूप से क्षेत्रीय पार्टियों का समर्थन करता रहा है, वहीं इमाम खुमैनी मेमोरियल ट्रस्ट आम तौर पर कांग्रेस के ज़्यादा करीब रहा है।
हालांकि दोनों संस्थाओं ने पॉलिटिकल आज़ादी भी दिखाई है। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान, दोनों ने INDIA ब्लॉक के आधिकारिक उम्मीदवार के बजाय निर्दलीय उम्मीदवार हनीफा जान का समर्थन किया। कारगिल में राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जाफर अखून और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच मौजूदा अनबन शायद हमेशा के लिए न हो। एक नेता ने कहा, “कारगिल में राजनीति पार्टी लाइन से ज़्यादा लोकल हितों से चलती है। थोड़ा समय दीजिए और सब कुछ नॉर्मल हो सकता है।”
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डोडा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अब्दुल कयूम ने बताया कि वाहन में भदरवाह निवासी मंजीत सिंह, उनकी पत्नी सोनिया सिंह और बेटी सुखविंदर सवार थे। तीनों का पता लगाने के लिए बचाव अभियान चलाया गया। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें
