गोवा के सांता क्रूज क्षेत्र के निवासी और प्राइवेट में काम करने वाले 41 वर्षीय के परेश सालगांवकर चुनाव आयोग के खिलाफ बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा बेंच की ओर रूख किया है। वह चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिविजन प्रक्रिया से जुड़े कई कानूनी विवाद को लेकर याचिका दाखिल की है।

बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा बेंच ने याचिका को लेकर कहा है कि वह इस बात से “परेशान” है कि “नियमों को कैसे रद्द किया गया और वह सोच रही है कि ऐसे कितने लोग होंगे जो कोर्ट नहीं आए। गुरुवार को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि ECI को यह पक्का करने की कोशिश करनी चाहिए कि योग्य वोटर वोटर लिस्ट से बाहर न रह जाएं।

परिवार के छह सदस्यों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए- परेश सालगांवकर

परेश सालगांवकर ने कहा कि वह बस झूठ नहीं बोलना चाहते थे, जबकि सिस्टम उनसे यही करने के लिए कह रहा था। उनके कोर्ट जाने की वजह यह आशंका थी कि और भी लोग इसी हालात से जूझ रहे होंगे। परेश सालगांवकर के मामले में, गोवा में उनके परिवार के छह सदस्यों के नाम राज्य की फाइनल वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं क्योंकि पते में बदलाव के लिए उनके फॉर्म 8 आवेदन एसआईआर के दौरान खारिज कर दिए गए थे, जबकि परेश सालगांवकर 2003 से पंचायत, राज्य और लोकसभा चुनावों में वोट डाल रहे हैं।

परेश ने कहा, ” चुनाव आयोग मेरे जैसे मामलों में भी ‘फॉर्म 6’ (जो नए वोटर्स के लिए होता है) भरने पर जोर देकर नागरिकों से गलत जानकारी देने को कह रहा है। यह गलत है और मेरे नैतिक मूल्यों के खिलाफ है। सॉफ्टवेयर की कमियां और आयोग की गाइडलाइंस कानून से ऊपर नहीं हो सकतीं। मुझे लगता है कि ऐसे कई लोग होंगे जिनके नाम इस समस्या और सिस्टम की खराबी की वजह से हटा दिए जाएंगे।”

निर्वाचन क्षेत्र में ही दूसरी जगह शिफ्ट हुए थे

परेश और उनका परिवार आठ साल से भी पहले नॉर्थ गोवा निर्वाचन क्षेत्र में ही अपने घर (जो पार्ट नंबर 29 में था) से दूसरे घर (पार्ट नंबर 25 में) शिफ्ट हो गए थे। पिछले साल नवंबर में, जब उन्हें पता चला कि SIR के लिए घर-घर जाकर जानकारी इकट्ठा करने का काम शुरू हो गया है, तो उन्होंने फॉर्म लेने के लिए अपने पुराने वार्ड के बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) से संपर्क किया।

उन्होंने बताया कि BLO ने उनसे कहा कि चूंकि परिवार अब उस पते पर नहीं रह रहा है, इसलिए उन्हें गिनती के चरण के दौरान पता बदलने के लिए आवेदन करना चाहिए।

परेश ने कहा कि इसके बाद, 12 नवंबर 2025 को उन्होंने अपने नए वार्ड के BLO से संपर्क किया, जिन्होंने उन्हें पता बदलने के लिए फॉर्म 8 जमा करने को कहा। उनका कहना है कि उन्होंने और परिवार के अन्य सदस्यों ने फॉर्म भरे और उन्हें BLO को दे दिए। BLO ने उन्हें यह भी बताया कि उन्होंने 8 दिसंबर को ECI पोर्टल पर फॉर्म अपलोड कर दिए थे और उनके आवेदनों पर कार्रवाई करके उन्हें आगे भेज दिया गया।

चुनाव आयोग ने SMS के जरिए पुष्टि भी की

परेश ने आगे बताया कि चुनाव आयोग ने SMS के जरिए उनके आवेदन मिलने की पुष्टि भी की। लेकिन, जब 16 दिसंबर को ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी हुई, तो उसमें उनका और उनके परिवार का नाम नहीं था। उन्होंने दोनों BLO से बात की, तो उन्हें परेशान न होने के लिए कहा गया। साथ ही उन्हें बताया गया कि चूँकि आयोग के ऑनलाइन पोर्टल के ज़रिए उनके फॉर्म 8 आवेदनों की पुष्टि हो चुकी थी, इसलिए यह बदलाव फाइनल वोटर लिस्ट में शामिल किया जाएगा।

लेकिन, 21 जनवरी को दावे और आपत्तियाँ दर्ज करने की समय-सीमा खत्म होने के बाद परेश सलगांवकर को एक ऑटोमेटेड नोटिफिकेशन मिला जिसमें बताया गया था कि इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) ने उनके ‘फॉर्म 8’ आवेदन रिजेक्ट कर दिए हैं। उन्हें यह भी बताया गया कि फॉर्म की प्रोसेसिंग 27 अक्टूबर 2025 को ही रोक दी गई थी।

फिर भी नाम कटा

परेश ने कहा, “उन्होंने कहा कि चूंकि हमने अपना घर बदल लिया था, इसलिए हमारा EPIC डिलीट हो गया था और अब फॉर्म 8 के आवेदनों पर कार्रवाई नहीं हो सकती थी। मुझे बताया गया कि एकमात्र उपाय फॉर्म 6 जमा करना था क्योंकि ERONET (ECI का सॉफ़्टवेयर) में डिलीट किए गए EPIC की समीक्षा करने या उन्हें बहाल करने का कोई विकल्प नहीं था।”

फरवरी 2026 में फाइनल वोटर लिस्ट जारी हुई और उसमें उनका व उनके परिवार का नाम फिर से नदारद था।

वोटर ने आयोग में शिकायत भी की

परेश ने आयोग के नेशनल ग्रीवेंस सर्विस पोर्टल पर शिकायत दर्ज करने और CEO कार्यालय में भी शिकायत करने का फैसला किया, ताकि उनके फॉर्म 8 के अस्वीकार होने के बारे में स्पष्टीकरण मिल सके। उन्होंने कहा कि उन्हें एक जैसा ही जवाब मिला। आगे कहा, “उन्होंने (अधिकारियों) कहा कि सिस्टम EPIC को वापस नहीं ला पा रहा है, क्योंकि हमें अनुपस्थित, स्थानांतरित, डुप्लिकेट, मृत (ASDD) मतदाताओं की सूची में डाल दिया गया था और डिलीट कर दिया गया था।”

मुझे नहीं पता कि मेरी क्या गलती है- परेश

परेश ने कहा, “मुझे नहीं पता कि मेरी क्या गलती है। फॉर्म 6 में एक घोषणा होती है जिसमें कहा गया है कि यह केवल पहली बार मतदान करने वालों के लिए लागू है। मैंने फॉर्म 6 नहीं भरा क्योंकि यह एक झूठी घोषणा होती। यह मेरे नैतिक मूल्यों के खिलाफ है। आप सिस्टम की किसी कमी के कारण किसी नागरिक को सजा नहीं दे सकते। उन्हें बिना किसी नोटिस या सुनवाई के डिलीट करने का अधिकार कौन देता है? यह मनमाना है और न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।”

इसके बाद परेश ने नॉर्थ गोवा के जिला चुनाव अधिकारी और CEO के पास अपील दायर की। अधिकारियों ने इस बार जवाब दिया कि उनके फॉर्म 8 इसलिए रिजेक्ट कर दिए गए क्योंकि गिनती (एन्यूमरेशन) के दौरान पता बदलने की सुविधा बंद कर दी गई थी।

परेश ने कहा कि यह बात जनता को क्यों नहीं बताई गई। आगे कहा, “अगर इसे रोक दिया गया था, तो क्या इसे शुरुआती स्टेज पर ही रिजेक्ट नहीं किया जाना चाहिए था? गिनती के दौरान जगह बदलने वाले लोगों के लिए क्या सिस्टम था? मैं बस इतना कह रहा हूं कि अगर सिस्टम में कोई गलती है, तो आप मुझसे ‘फॉर्म 6’ भरने के लिए न कहें। आप मेरे ‘फॉर्म 8’ पर विचार करें। आप गिनती के दौरान लोगों की आने-जाने की आज़ादी पर भी रोक लगा रहे हैं।”

आखिरकार, मई में उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका दायर की। परेश ने कहा, “वे मुझसे नए वोटर के तौर पर ‘फॉर्म 6’ भरने के लिए कह रहे हैं, जो सही नहीं है। इससे बाद में दिक्कत हो सकती है। अगर सरकार भविष्य में वोटिंग रजिस्ट्रेशन की जानकारी के आधार पर नागरिकता या किसी स्कीम के फायदे से जुड़ा कोई फैसला लेती है, तो मेरा पिछला वोटिंग रिकॉर्ड खत्म हो जाएगा। मुझे इस बात का भी डर है।”

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देशभर में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठ रहे हैं। इस बीच चुनाव आयोग ने उन 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ‘विशेष अभियान’ चलाने का निर्देश दिया है जहां SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। इसका मकसद मतदाता सूची में छूट गए लोगों के नाम जोड़ना है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें