कांग्रेस नेतृत्व ने शनिवार को लोकसभा के सचेतक बी मणिकम टैगोर को तमिलनाडु कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया। उन्होंने सेल्वपेरुंथगई की जगह ली। यह बदलाव सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि विधानसभा चुनाव के बाद तमिलनाडु की बदली हुई राजनीति के बीच कांग्रेस की नई राजनीतिक सोच को दर्शाता है।

मणिकम टैगोर की तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष के लिए नियुक्त ऐसे समय हुई है जब कांग्रेस ने अपनी लंबे समय से चली आ रही टीएमके के साथ गठबंधन समाप्त कर लिया है और सीएम विजय सी जोसेफ विजय की टीवीके के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल हो गई है। करीब 60 सालों में यह पहली बार है जब कांग्रेस तमिलनाडु सरकार का हिस्सा बनी।

अगर सेल्वापेरुन्थगई को डीएमके के साथ पुराने रिश्तों और निरंतरता का प्रतीक माना जाता था। वहीं, मणिकम टैगोर उन नेताओं में शामिल थे जिन्होंने सबसे पहले और सबसे जोरदार तरीके से डीएमके से अलग होने की वकालत की थी।

विधानसभा चुनाव से काफी पहले ही टैगोर ने खुलकर कहा था कि कांग्रेस को केवल जूनियर सहयोगी बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि राज्य की राजनीति में बड़ी भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने कांग्रेस के लिए ज्यादा विधानसभा सीटों की मांग की, सत्ता में हिस्सेदारी का मुद्दा उठाया और सबसे पहले यह सुझाव देने वाले नेताओं में थे कि पार्टी को विजय की टीवीके के साथ गठबंधन की संभावना तलाशनी चाहिए। उस समय उनके ये विचार न केवल डीएमके के लिए असहज थे, बल्कि कांग्रेस के भीतर भी कुछ नेताओं को पसंद नहीं आए थे।

पार्टी नेताओं का कहना है कि नेतृत्व परिवर्तन की उम्मीद कई हफ्तों से की जा रही थी। तमिलनाडु में कांग्रेस नेताओं के एक वर्ग के साथ-साथ नई दिल्ली के वरिष्ठ नेता भी सेल्वपेरुंथगई के नेतृत्व से लगातार असंतुष्ट होते जा रहे थे। जहां टैगोर और कई अन्य लोगों का तर्क था कि कांग्रेस को टीवीके के साथ मिलकर काम करना चाहिए, वहीं सेल्वपेरुंथगई डीएमके गठबंधन को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध थे।

एक राज्य कांग्रेस नेता ने कहा कि वह उन नेताओं में से थे जिन्होंने तमिलनाडु में कांग्रेस को सत्ता में भागीदारी दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी। यही वजह है कि टैगोर को राज्य कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया है।

यह मतभेद धीरे-धीरे पार्टी की भविष्य की दिशा को लेकर एक बड़े विवाद में बदल गया। कांग्रेस के TVK सरकार में शामिल होने के बाद भी, सेल्वापेरुंथगाई अक्सर राजनीतिक रूप से अपनी ही पार्टी की लाइन से अलग चलते दिखे। शुक्रवार को, यानी उन्हें हटाए जाने से एक दिन पहले भी उन्होंने विधानसभा में पूर्व सीएम एम.के. स्टालिन का मज़ाक उड़ाने के लिए विजय की आलोचना की और गठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद सरकार के प्रशासनिक कामकाज पर सवाल उठाए।

इस आलोचना ने इस धारणा को और पुख्ता कर दिया कि उनका कार्यकाल समाप्त हो चुका है। आधिकारिक तौर पर, सेल्वापेरुंथगई ने पहले ही उच्च कमान से उन्हें पदमुक्त करने का अनुरोध कर दिया था। उन्होंने कहा कि विधानसभा चुनाव से पहले ही उन्होंने राज्य अध्यक्ष के रूप में अपना कार्यकाल जारी न रखने का फैसला कर लिया था। लेकिन उनका कार्यकाल लगातार आंतरिक असहमति से भी प्रभावित रहा था।

टैगोर और करूर सांसद एस. ज्योतिमणि सहित वरिष्ठ नेताओं ने विधानसभा चुनाव के दौरान उम्मीदवारों के चयन में पारदर्शिता पर सवाल उठाए। कई पदाधिकारियों ने राज्य नेतृत्व पर डीएमके गठबंधन में कांग्रेस की सौदेबाजी की स्थिति को कमजोर करने का आरोप लगाया।

इस बदलाव के पीछे कांग्रेस नेतृत्व के अंदरूनी समीकरण भी माने जा रहे हैं। पार्टी नेताओं के अनुसार, सेल्वपेरुंथगई को कभी भी राहुल गांधी का पूरा भरोसा हासिल नहीं था, जबकि उनकी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ अच्छी समझ थी। राहुल गांधी ने उनसे काफी दूरी बनाए रखी और लंबे समय तक उन्हें मुलाकात का समय भी नहीं दिया। साथ ही, उन्होंने तमिलनाडु की राजनीति को भी लगातार प्राथमिकता नहीं दी। उन्होंने तमिलनाडु का दौरा केवल 2024 के लोकसभा और 2026 के विधानसभा चुनावों के दौरान संक्षिप्त प्रचार कार्यक्रमों तक ही सीमित रखा।

सेल्वपेरुंथगई ने खुद स्वीकार किया था कि कांग्रेस के टीवीके सरकार में शामिल होने के बाद बदलते राजनीतिक समीकरणों के कारण उनके लिए राज्य इकाई का नेतृत्व जारी रखना मुश्किल हो गया था।

उनका अपना राजनीतिक सफर तमिलनाडु की राजनीति की बहुआयामी प्रकृति को दर्शाता है। वीसीके सहित अन्य पार्टियों में पहले भी अपनी सेवाएं देने के बाद कांग्रेस में प्रवेश करने के बावजूद, फरवरी 2024 में राज्य कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद भी वे संगठन के सभी वर्गों का पूर्ण विश्वास हासिल नहीं कर पाए।

राहुल गांधी के करीबी माने जाते हैं टैगोर

टैगोर के साथ यह अंतर स्पष्ट है। विरुधुनगर से तीन बार सांसद रहे टैगोर को तमिलनाडु में राहुल गांधी के भरोसेमंद सहयोगियों में से एक माना जाता है और वे एआईसीसी महासचिव केसी वेणुगोपाल के भी करीबी माने जाते हैं, जो कांग्रेस नेतृत्व के प्रमुख राजनीतिक प्रबंधकों में से एक हैं।

पार्टी के भीतर टैगोर को लंबे समय से एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता रहा है जिनकी राजनीतिक विचारधारा राज्य इकाई की गणनाओं की तुलना में दिल्ली की बदलती सोच को ज्यादा प्रतिबिंबित करती है। इसलिए उनकी नियुक्ति न केवल संगठनात्मक पुनर्गठन का संकेत है, बल्कि तमिलनाडु में राहुल गांधी-वेणुगोपाल खेमे के सुदृढ़ीकरण का भी प्रतीक है।

टैगोर का राजनीतिक सफर काफी योजनाबद्ध और धीरे-धीरे आगे बढ़ने वाला रहा है। उनका जन्म 1975 में शिवगंगा में हुआ और उन्होंने कानून की पढ़ाई की है। इसके बाद उन्होंने नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया और इंडियन यूथ कांग्रेस में काम करते हुए संगठन में लगातार अपनी जगह मजबूत की। बाद में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर भी कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं, जिनमें युवा कांग्रेस के चुनाव आयुक्त और उसकी केंद्रीय चुनाव प्राधिकरण के अध्यक्ष का पद शामिल है।

हालांकि, तमिलनाडु के कई कांग्रेस नेताओं से अलग, टैगोर हमेशा राजनीतिक विवादों और बहसों में खुलकर अपनी बात रखने के लिए जाने जाते रहे हैं। वह अक्सर कांग्रेस के साथ डीएमके के व्यवहार की आलोचना करते थे, जिससे पूर्व सहयोगी दल डीएमके नाराज रहता था। सीट बंटवारे, गठबंधन की राजनीति और गठबंधन में कांग्रेस की स्थिति जैसे मुद्दों पर डीएमके की आईटी टीम और टैगोर के बीच कई बार सार्वजनिक तौर पर तीखी बयानबाजी भी हुई।

टैगोर लगातार यह कहते रहे कि कांग्रेस को हमेशा छोटे सहयोगी दल की तरह व्यवहार करना बंद करना चाहिए। बाद में यही सोच पार्टी की रणनीति बन गई। पार्टी नेताओं के अनुसार, चुनाव से पहले डीएमके के साथ हुई बातचीत में कांग्रेस के लिए तीन अतिरिक्त विधानसभा सीटें हासिल कराने वालों में टैगोर भी शामिल थे। हालांकि अंततः कांग्रेस ने 28 सीटों पर चुनाव लड़ा और पांच सीटें जीतीं, लेकिन चुनाव परिणामों के बाद राजनीतिक परिस्थितियां बदल गईं और तमिलनाडु में कई दशकों बाद पहली गठबंधन सरकार बनी।

पिछले कई महीनों से टैगोर और नीति रणनीतिकार प्रवीण चक्रवर्ती पार्टी के भीतर यह तर्क दे रहे थे कि जोसेफ विजय का उभार केवल एक नए नेता के राजनीति में आने का मामला नहीं है, बल्कि यह तमिलनाडु की राजनीति में एक बड़ा और स्थायी बदलाव है। उस समय कांग्रेस में बहुत कम नेता उनकी इस राय से सहमत थे, लेकिन अब ऐसा लगता है कि पूरी पार्टी ने इस सोच को अपना लिया है।

समय-समय पर अध्यक्षों के परिवर्तन के बावजूद पार्टी की जमीनी संगठनात्मक शक्ति की तुलना में संसदीय नेतृत्व का प्रभाव कहीं अधिक बना हुआ है। यह आज भी दिल्ली में वाक्पटु सांसद, ऊर्जावान प्रवक्ता और कुशल वार्ताकार तैयार करती है, लेकिन एक स्वतंत्र जमीनी तंत्र का निर्माण करना अभी भी इसकी अनसुलझी चुनौती है।

टैगोर ऐसे समय में कार्यभार संभाल रहे हैं जब कांग्रेस दशकों बाद राज्य सरकार में मंत्रिमंडल में मंत्री पद के साथ प्रवेश कर चुकी है, फिर भी चुनावी प्रासंगिकता के लिए गठबंधनों पर काफी हद तक निर्भर है। उनका तात्कालिक कार्य टीवीके के नेतृत्व वाले गठबंधन के भीतर पार्टी को मजबूत करना और साथ ही उसे स्थानीय निकाय चुनावों और आगामी लोकसभा चुनाव के लिए तैयार करना होगा। नेतृत्व परिवर्तन के बाद संगठनात्मक नवीनीकरण होगा या नहीं, यह अभी अनिश्चित है।

‘जन नायकन’ के प्रोड्यूसर को सीएम विजय ने बनाया दिल्ली में विशेष प्रतिनिधि, विपक्ष बोला- जनता के साथ धोखा

तमिलनाडु सरकार ने शुक्रवार को बेंगलुरु स्थित केवीएन ग्रुप के चेयरमैन और विजय की रिलीज न हुई आखिरी फिल्म जन नायकन के प्रोड्यूसर के. वेंकट नारायण को नई दिल्ली में राज्य का विशेष प्रतिनिधि नियुक्त किया। यह पद कैबिनेट रैंक का होता है और आम तौर पर इस पद पर रहने वाले व्यक्ति को राज्य और केंद्र सरकार के बीच अक्सर जटिल रहने वाले रिश्तों को संभालने की जिम्मेदारी दी जाती है। पढ़ें पूरी खबर।