Assam Elections 2026: असम विधानसभा चुनाव को लेकर गुरुवार को वोटिंग हुई थी और रिकॉर्ड वोटिंग ने सभी का ध्यान खींचा है। सत्ताधारी BJP और विपक्ष में बैठी कांग्रेस दोनों ही दावा कर रहे हैं कि यह उनके पक्ष में बढ़ते समर्थन का संकेत है। दूसरी ओर जानकरों का मानना है कि वोटर लिस्ट का दोबारा तैयार किया जाना, दोनों पार्टियों के बीच कांटे की टक्कर और ध्रुवीकरण अहम हो सकता है।

गुरुवार को असम में अब तक का सबसे ज़्यादा वोटर टर्नआउट दर्ज किया गया। चुनाव आयोग के मुताबिक यह आंकड़ा 85.91% रहा, जो कि EC की आखिरी गिनती में और भी बढ़ सकता है। यह टर्नआउट 2016 के चुनाव में बने पिछले रिकॉर्ड (84.67%) से 1.24 प्रतिशत ज़्यादा है। 2016 में ही BJP ने कांग्रेस की 15 साल की सरकारों के बाद पहली बार सत्ता हासिल की थी।

असम में कहां-कहां हुई सबसे ज्यादा वोटिंग?

गुरुवार को चुनाव आयोग द्वारा जारी किए गए ताज़ा आंकड़ों के अनुसार राज्य की 126 विधानसभा सीटों में से 18 सीटों पर 90% से ज़्यादा वोटिंग हुई। सबसे ज़्यादा वोटिंग लोअर असम की बिरसिंग जरुआ सीट पर हुई, जो कि 96.54% का एक ज़बरदस्त आंकड़ा है। छह अन्य सीटों की बात करें तो चेंगा, दलगांव, गौरीपुर, जलेश्वर, श्रीजांग्राम और मानकाचर में भी 95% से ज़्यादा वोटिंग दर्ज की गई।

खास बात यह है कि ये सभी सातों सीटें ऐसी हैं, जहां बंगाली मूल के मुस्लिम वोटरों की संख्या सबसे ज़्यादा है। इस समुदाय में आम तौर पर वोटिंग काफ़ी ज़्यादा होती है। जानकारों का मानना ​​है कि इसकी वजह वोटरों की नागरिकता की स्थिति को लेकर मन में बैठी चिंताएँ और वोटर लिस्ट से नाम कटने का डर है।

बीजेपी बोली- मजबूत सरकार के लिए वोटिंग

शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए असम BJP के अध्यक्ष दिलीप सैकिया ने कहा कि अन्य सीटों पर हुई ज़्यादा वोटिंग ज़्यादा अहम बात है। उन्होंने कहा, “हमें हमेशा से पता था कि चेंगा और दलगांव जैसे निर्वाचन क्षेत्रों में 96-97% वोटिंग होगी, लेकिन नलबाड़ी (90.46%) या तिहू (87.02%) में वोटिंग लगभग 90% होगी, यह बात बहुत से लोगों ने पहले से नहीं सोची थी। गुवाहाटी में भी 75-77% वोटिंग हुई, जिसका मतलब है कि इस बार शहरी लोग ग्रामीण मतदाताओं से ज़्यादा पीछे नहीं हैं।”

दिलीप सैकिया ने कहा, “हम तो बस यही कहेंगे कि हमारे अपने ‘सिनाकी’ (जाने-पहचाने) लोगों ने इस बार ज़्यादा वोट दिए हैं… हमारे दूसरे लोग, जो पहले किसी न किसी वजह से हिचकिचाते थे, वे भी इस बार एक मज़बूत सरकार के लिए वोट देने आगे आए हैं।” बीजेपी नेता दिलीप सैकिया ने कहा कि पार्टी के आकलन के अनुसार ज़्यादा वोटिंग एक ऐसा कारक होगा जो 25 से ज़्यादा सीटों पर NDA के पक्ष में नतीजों को सकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा, और उन्होंने सत्ताधारी पार्टी के लिए एक ऐतिहासिक जनादेश की भविष्यवाणी की।

क्या कह रही है कांग्रेस?

दूसरी ओर असम कांग्रेस की नेता और दिसपुर से उम्मीदवार मीरा बोरठाकुर गोस्वामी ने इस पारंपरिक समझ की ओर इशारा किया कि ज़्यादा वोटिंग ‘सत्ता-विरोधी लहर’ का संकेत होती है। उन्होंने कहा, “लोग सुबह 8 बजे से शाम 5 बजे तक लाइन में लगे रहे, क्योंकि वे बदलाव चाहते हैं। ‘साइलेंट वोट’ हमारे पक्ष में आएंगे, क्योंकि वे हिमंत बिस्वा सरमा के कुशासन और उनके रवैये को बर्दाश्त नहीं कर सकते; और BJP में किसी और का भी स्थिति पर कोई नियंत्रण नहीं है।”

क्या है राजनीतिक विश्लेषकों का तर्क?

राजनीतिक टिप्पणीकार और कछार कॉलेज के प्रोफेसर जयदीप बिस्वास ने कहा कि उन्हें इस बात पर संदेह है कि यह मानक सिद्धांत असम में हुई वोटिंग की व्याख्या कर पाता है। उन्होंने कहा, “मैं इसे ‘प्रतिस्पर्धी मतदान’ के रूप में देखता हूं, जो ध्रुवीकृत माहौल और चुनाव से प्रेरित है। इसमें भले ही अल्पसंख्यक मतदाताओं की हमेशा से ही बड़ी संख्या में वोट डालने की प्रवृत्ति रही है, लेकिन इस बार उनमें डर कहीं ज़्यादा है। दूसरी ओर अन्य मतदाताओं को बार-बार यह बताया गया है कि उनकी संस्कृति और उनके अस्तित्व को खतरा है। यह मुकाबला दोनों ही तरफ से ज़ोरदार है।”

एक अन्य राजनीतिक टिप्पणीकार और गुवाहाटी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अखिल रंजन दत्ता ने कहा कि ज़्यादा मतदान होने का एक सीधा-सा कारण वह SIR हो सकती है, जो चुनावों से ठीक पहले चलाई गई थी। 10 फरवरी को जारी की गई अंतिम मतदाता सूची में पहले जारी की गई ड्राफ्ट सूची की तुलना में मतदाताओं की संख्या में कुल 2.43 लाख की कमी दर्ज की गई।

उन्होंने कहा कि यह कमी मतदाताओं की मृत्यु, उनके एक जगह से दूसरी जगह चले जाने और एक ही मतदाता का नाम कई निर्वाचन क्षेत्रों की सूची में होने के कारण उसे सूची से हटाए जाने की वजह से हुई थी। उन्होंने भी प्रतिस्पर्धा को एक अहम कारक माना, लेकिन उन्होंने राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों और विभिन्न सामुदायिक समूहों द्वारा किए गए ‘प्रतिस्पर्धी संगठन’ और ‘जन-लामबंदी’ को कहीं ज़्यादा महत्व दिया।

उन्होंने कहा, “अब स्थिति यह है कि मुख्यधारा के सभी राजनीतिक दल एक-दूसरे के साथ ज़ोरदार प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। BJP ने मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक लाने के लिए हर संभव प्रयास किया है। विपक्षी दलों ने भी अपनी तरफ से पूरी कोशिश की, और कांग्रेस को एक स्पष्ट नेतृत्व (चेहरा) मिलने से उसमें एक नई ऊर्जा का संचार हुआ। चुनावों से ठीक पहले कुछ प्रमुख नेताओं के पार्टी छोड़कर चले जाने जैसी घटनाओं के बावजूद, इस बात से पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा कि पार्टी अब भी मज़बूती से खड़ी है।”

विशेष समुदाय ने किया ज्यादा मतदान

प्रोफेसर अखिल रंजन ने कहा, “इसके अलावा, असम में विभिन्न जातीय संगठन भी अब पहले से कहीं ज़्यादा सक्रिय हो गए हैं। इनमें से कई संगठनों को मौजूदा सरकार ने अपने साथ मिला लिया है, लेकिन विपक्षी दलों के लिए भी ये संगठन बेहद महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे इन संगठनों के माध्यम से अपने पक्ष में जन-समर्थन जुटाने का प्रयास कर रहे हैं। साथ ही, चूंकि एक विशेष समुदाय को लगातार निशाना बनाया गया है, इसलिए उस समुदाय के लोग भी अब पहले से कहीं ज़्यादा संख्या में मतदान करने के लिए आगे आ रहे हैं। इन सभी कारकों के मेल से ही असम में प्रतिस्पर्धी मतदान का यह माहौल तैयार हुआ है।”

उन्होंने विशेष रूप से महिलाओं की चुनावी भागीदारी पर भी ज़ोर दिया। इस बार महिलाओं की वोटिंग 86.5% रही, जो 2021 में 82.01% थी। उन्होंने कहा कि महिलाओं को टारगेट करने वाली लाभार्थी योजनाओं की वजह से, राजनीतिक लामबंदी और कैंपेनिंग में महिलाओं की भूमिका में एक अभूतपूर्व लहर देखने को मिली है।

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