हर सरकार के पास के एक ऐसा करीबी समूह या गुट होता है जो व्यवस्था को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसा ही तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसफे विजय के पास भी है। जिसमें राजनीतिक सलाहकार, फिल्म प्रबंधक, फिल्म निर्माण नियंत्रक, चुनाव प्रचार संचालक, पत्रकार, व्यापारिक सहयोगी और पुराने वफादार लोग शामिल हैं। यह ऐसे लोग लोगों के समूह है जो पार्टी, सरकार और मुख्यमंत्री के निजी दायरे के बीच सहजता से तालमेल करते हुए दिखाई देते हैं।
विजय को सिनेमा, मीडिया और अपने निजी पेशेवर दायरे के लोगों पर भरोसा करने का पूरा अधिकार है, और ये लोग शासन-प्रशासन में दक्षता ला सकते हैं, लेकिन टीवीके सरकार के सामने सवाल यह है है कि यदि ये लोग वास्तव में अधिकार और प्रभाव का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो फिर जनता को उनके बारे में जानकारी इंस्टाग्राम पोस्टों और विपक्ष की शिकायतों के जरिए ही क्यों मिल रही है?
अब डीएमके को इस मुद्दे पर सरकार को घेरने का मौका मिल गया है। 30 जून को डीजीपी को दी गई शिकायत में डीएमके के संगठन सचिव आर.एस. भारती ने मुख्यमंत्री की कैबिनेट बैठकों, आधिकारिक समीक्षाओं और अन्य गोपनीय बैठकों में जॉन अरोकीयासामी और विष्णु रेड्डी की कथित भागीदारी के संबंध में एफआईआर दर्ज करने की मांग की।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि दोनों ने मुख्यमंत्री की कैबिनेट बैठकों, सरकारी समीक्षा बैठकों और अन्य गोपनीय बैठकों में हिस्सा लिया। भारती ने कहा कि इससे आधिकारिक गोपनीयता कानून और अन्य नियमों का उल्लंघन हो सकता है, क्योंकि मुख्यमंत्री विजय अपने गोपनीयता की शपथ के अनुसार सरकारी कार्यवाही की गोपनीय जानकारी की रक्षा करने के लिए बाध्य हैं।
विष्णु रेड्डी मुख्यमंत्री विजय के करीबी सहयोगी हैं, जबकि जॉन अरोकीयासामी एक राजनीतिक रणनीतिकार हैं। दोनों ने विजय को राज्य की राजनीति में शीर्ष स्थान तक पहुंचने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
डीएमके सांसद पी. विल्सन ने उच्च स्तरीय सरकारी बैठकों में इन दोनों व्यक्तियों की उपस्थिति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि यदि वे सरकारी कर्मचारी नहीं हैं, तो वे किस हैसियत से उन बैठकों में शामिल हुए, जहां गोपनीय दस्तावेजों पर चर्चा होती है और उन्हें साझा किया जाता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इन दोनों को मुख्यमंत्री कार्यालय के पास कमरे दिए गए थे।
टीवीके के शीर्ष सूत्रों ने कहा कि यह आरोप निराधार है। उनके अनुसार, सरकार के पास ऐसे आवश्यक आदेश हैं जो अरोकियासामी और रेड्डी दोनों को महत्वपूर्ण बैठकों में शामिल होने का अधिकार देते हैं। एक नेता ने कहा कि हो सकता है कि विवरण सार्वजनिक रूप से उजागर न हों, लेकिन अब वे निजी व्यक्ति नहीं हैं।
यह जवाब सरकार के भीतर कानूनी न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है। राजनीतिक रूप से, इससे अगला प्रश्न उठता है। यदि वे आदेश मौजूद हैं, जिनमें से कुछ कैबिनेट रैंक के हैं, तो उन्हें सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? पारदर्शिता से यह विवाद पल भर में समाप्त हो सकता था। इसके बजाय, सरकार ने दो ऐसे व्यक्तियों के इर्द-गिर्द संदेह का माहौल बनने दिया है, जिनके बारे में उसके नेता कहते हैं कि उन्हें आधिकारिक रूप से अधिकार प्राप्त हैं।
अन्य नियुक्तियां
यह सिलसिला सिर्फ इन दोनों तक ही सीमित नहीं है। विजय के लंबे समय से मैनेजर रहे जगदीश पलानीस्वामी, जो कई प्रमुख तमिल अभिनेताओं के भी मैनेजर हैं। उन्होंने 22 जून को विजय को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए इंस्टाग्राम पर अपनी सरकारी नियुक्ति का भी खुलासा किया। उन्होंने लिखा, “मेरे भगवान को जन्मदिन की शुभकामनाएं…”। इसी पोस्ट में यह भी बताया गया कि अब वह “माननीय मुख्यमंत्री के निजी सचिव” हैं।
टीवीके के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि जगदीश की नियुक्ति का फैसला कम से कम चार दिन पहले ही हो चुका था। नेता के अनुसार, उन्होंने मुख्यमंत्री के साथ अपनी नजदीकी का इस्तेमाल करते हुए खुद ही इसकी जानकारी सार्वजनिक कर दी, जबकि विष्णु रेड्डी और जॉन अरोकीयासामी के मामले में ऐसा नहीं हुआ था।
प्रसिद्ध सिनेमैटोग्राफर मनोज परमाहंसा, जिन्होंने विजय की कई फिल्मों की शूटिंग की है। उनको तमिलनाडु सरकार के एमजीआर फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान का प्रमुख नियुक्त किया गया है।
जहां एक ओर टीवीके के विरोधी इन नियुक्तियों की आलोचना कर रहे हैं। वहीं विजय के समर्थक यह तर्क दे रहे हैं कि फिल्म जगत के लोगों के पास अद्वितीय कौशल होते हैं जो राजनीति में सहजता से काम आ सकते हैं। उनका कहना है कि एक फिल्म निर्माण नियंत्रक, जिसने दशकों तक हजारों कलाकारों, तकनीशियनों, बजट, व्यवस्थाओं के समन्वय और संकटों से निपटने का अनुभव किया है, उसके पास ऐसे प्रबंधकीय कौशल हो सकते हैं जो शासन में उतने ही कारगर साबित हो सकते हैं, या शायद उससे भी अधिक जितने कि किसी प्रतिष्ठित राजनेता के बेटे के, जिसे अचानक सार्वजनिक जीवन में लाया गया हो।
पांच प्रमुख व्यक्ति
जोसेफ विजह के करीबी सूत्रों के अनुसार, इस समय पांच ऐसे लोग हैं जो किसी आधिकारिक पद पर नहीं हैं, लेकिन मुख्यमंत्री की सलाहकार व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। वे सरकार और राजनीति से जुड़े मुद्दों पर सलाह, जानकारी और राजनीतिक आकलन उपलब्ध करा रहे हैं।
इनमें से एक व्यक्ति, जो कभी डीएमके के विपक्ष नेता उदयनिधि स्टालिन के करीबी थे, अब विजय के करीबी लोगों में शामिल हैं और विष्णु रेड्डी के रिश्तेदार भी हैं।
इसके अलावा कुछ पत्रकार भी इस समूह में शामिल हैं। इनमें एक तमिल पत्रिका के पूर्व संपादक और एक अन्य प्रमुख व्यक्ति शामिल हैं। इनके पास न तो कोई सरकारी पद है और न ही पार्टी में कोई आधिकारिक जिम्मेदारी, फिर भी वे तबादलों से जुड़े मामलों और प्रशासनिक समन्वय जैसे सरकारी कामों पर सलाह दे रहे हैं।
इस समूह में फिल्म और राजनीति की दुनिया से जुड़े दो अन्य लोग भी शामिल हैं। एक पूर्व प्रोडक्शन कंट्रोलर और जनसंपर्क अधिकारी, जिन पर विजय भरोसा करते हैं, तथा एक वामपंथी सांसद, जो डीएमके गठबंधन के समर्थन से दो बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं।
विजय के समर्थकों का कहना है कि पहली बार मुख्यमंत्री बने व्यक्ति का अपने जान-पहचान के लोगों पर निर्भर रहना कोई असामान्य बात नहीं है, क्योंकि उन्हें ऐसी व्यवस्था विरासत में नहीं मिली है जिस पर उनके पद पर बैठे वंशवादी उत्तराधिकारी निर्भर रहते। लेकिन सरकार के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, मामला भरोसे का नहीं, बल्कि पारदर्शिता की कथित कमी का है।
एक वरिष्ठ सरकारी सचिव ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “अगर अरोकीयासामी और रेड्डी के पास अधिकार है, तो सरकार उनके अधिकारों से जुड़े आदेश करे। अगर जगदीश पलानीस्वामी मुख्यमंत्री के निजी सचिव हैं, तो इसकी जानकारी पहले सरकार की ओर से दी जानी चाहिए, न कि इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए। अगर सलाहकार नीतियों, तबादलों या राजनीतिक बातचीत को प्रभावित कर रहे हैं, तो उनकी भूमिकाएं स्पष्ट रूप से तय की जानी चाहिए। और अगर पत्रकार शासन-प्रशासन में मदद कर रहे हैं, तो उन्हें भी यह तय करना चाहिए कि वे सिर्फ पर्यवेक्षक हैं, सलाहकार हैं या फिर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।”
विजय के आसपास मौजूद लोग सक्षम हो सकते हैं और उनमें से कुछ सरकार के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं, लेकिन शासन व्यवस्था में उन्हें सार्वजनित व्यवस्था से दूर रखना जोखिम भरा हो सकता है। फिल्म जगत ने भले ही राजनीति की एक नई शैली पेश की हो, लेकिन सार्वजनिक जीवन का सबसे पुराना सिद्धांत आज भी लागू होता है: सत्ता भरोसे से शुरू होती है, लेकिन वैधता पारदर्शिता से।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर विकसित भारत गारंंटी योजना के क्रियान्वयन का विरोध किया है। हाल ही में शुरू की गई ‘विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ (VB-GRAMG) योजना में अहम बदलाव करने की मांग की है। पढ़ें पूरी खबर।
