पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार का सामना करने के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में अफरा-तफरी मची है। टीएमसी के कई पुराने नेता ममता बनर्जी से किनारा कर चुके हैं। ऐसे पार्टी को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हों। पार्टी के नाम, नेतृत्व, फंड और टीएमसी के चुनाव चिह्न पर दावेदारी को लेकर विवाद हो रहा है।

सवाल यह है कि यह सब कुछ ममता बनर्जी के पास रहेगा या फिर 80 विधायकों में से उन 60 विधायकों के पास चला जाएगा, जो खुद को असली टीएमसी गुट का दावा कर रहे हैं।

तृणमूल कांग्रेस की स्थापना 1998 में ममता बनर्जी ने की थी। साल 2011 में पश्चिम बंगाल की 34 साल पुरानी वाम गठबंधन सरकार को सत्ता से बाहर कर के ममता बनर्जी राज्य की मुख्यमंत्री बनीं थीं। लगातार तीन विधान सभा चुनाव जीतने के बाद इस साल हुए राज्य चुनाव में ममता बनर्जी को भाजपा के हाथों हार का सामना करना पड़ा।

भाजपा ने चुनाव में दो-तिहाई बहुमत प्राप्त किया। मुख्यमंत्री बने शुभेंदु अधिकारी, जो कभी टीएमसी में थे और ममता बनर्जी के काफी करीबी माने जाते थे। राज्य में हार के बाद ममता की पार्टी में बगावत शुरू हुई।

ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में बगावत

3 जून, 2026 को टीएमसी के 58 विधायकों ने अलग गुट बनाते हुए ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुनने की घोषणा की। ऋतब्रत बनर्जी का दावा है कि उनके पास 60 से ज्यादा विधायकों का समर्थन है। वहीं, ममता बनर्जी के पास 80 में से 14 विधायकों का समर्थन है। जबकि एक विधायक जेल में हैं।

पश्चिम बंगाल विधान सभा के सभापति ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता विपक्ष का दर्जा भी दे दिया। बगावत के समय ऋतब्रत गुट ने ममता बनर्जी को पार्टी का मार्गदर्शक नेता बताया मगर बाद में उन्होंने ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाकर नया अध्यक्ष चुनने की घोषणा की। ममता बनर्जी गुट के कुणाल घोष ने कहा कि ममता बनर्जी ही असल तृणमूल कांग्रेस हैं, बाकी सब नौटंकी है।

वहीं, लोकसभा में पार्टी के 28 सांसदों में से 20 सांसदों ने ममता बनर्जी से अलग होने का फैसला लिया और एक अलग गुट बनाया। इन 20 सांसदों का नेतृत्व काकोली घोष कर रही थीं। जिन्होंने अपने गुट का विलय नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में कर लिया और एनडीए (NDA) को समर्थन देने की घोषणा की।

पश्चिम बंगाल में जो विभाजन चल रहा है कि उसकी तुलना कई लोग महाराष्ट्र शिवसेना टेंशन 2022 से कर रहे हैं। क्योंकि पार्टी के लिए चुनाव चिह्न बहुत मायने होता है और वही, उसकी असली पहचान होती है।

क्या कहता है कानून?

सिंबल ऑर्डर 1968 की धारा 15 के तहत चुनाव आयोग को यह अधिकार है कि चुनाव चिह्न पर वैध दावा करने वाले गुट को तय करे। यानी कौन उस पर कानूनी दावा कर सकता है। किसी राजनीतिक दल में विभाजन होने पर चुनाव आयोग दोनों पक्षों की दलील सुनता है। उसके बाद तय करता है कि मूल पार्टी का असली उत्तराधिकारी कौन है?

सादिक अली बनाम चुनाव आयोग

इस संबंध में 1971 के सादिक अली बनाम चुनाव आयोग के फैसले को आधार माना जाता है। जिसमें यह दिखाई देता है कि सांसदों-विधायकों और पार्टी संगठन के अधिकतर नेता किस गुट के साथ हैं।

देश के पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के मुताबिक, चुनाव आयोग तभी हस्तक्षेप करता है, जब पार्टी का कोई गुट औपचारिक विवाद का दावा लेकर चुनाव आयोग के पास पहुंचता है।

बहुमत के अलावा चुनाव आयोग कुछ और पहलुओं पर भी विचार करता है जैसे- कौन सा गुट पार्टी के संविधान के प्रति ज्यादा वफादार है। पार्टी की मूल विचारधारा क्या है। उसके विजन और उसकी कार्यप्रणाली कौन फॉलो कर रहा है। इन सब बातों को देखते हुए अगर कोई एक गुट साफतौर पर दावेदार साबित नहीं होता तो चुनाव आयोग सलाह देता है कि दोनों गुट अलग-अलग पार्टियां बनाएं और इन्हें अलग-अलग सिंबल आवंटित कर दिए जाएंगे।

हालांकि, चुनाव आयोग का यह फैसला फाइनल नहीं होता है, इसको सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया जा सकता है, लेकिन शीर्ष अदालत इस मामले में सुनवाई तभी करती है, जब कोई गुट शीर्ष अदालत का रुख करता है।

शिवसेना के मामले में चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे के पक्ष में फैसला दिया था। इसका आधार यह था कि चुनाव आयोग ने पार्टी की ताकत नहीं, बल्कि विधायकों की संख्या देखी थी। हालांकि इस मामले को उद्धव ठाकरे ने सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया है। फिलहाल यह मामला अदालत में पेंडिंग है।

तृणमूल कांग्रेस में जो बगावत हुई है वह बाकी पार्टियों से अलग है। क्योंकि ऋतब्रत बनर्जी वाला जो गुट है, वह वैचारिक रूप से खुद को बीजेपी विरोधी अलग-अलग मौकों पर बताया आया है। हालांकि, ऋतब्रत बनर्जी की तरफ से यह भी कहा गया है कि अगर केंद्र या राज्य सरकार सकारात्मक कदम उठाती है तो वह उसकी सराहना करेगी।

अगर ऋतब्रत बनर्जी और काकोली घोष के गुट को अलग-अलग माना जाए तो तृणमूल कांग्रेस तीन हिस्सों में बंटी है, जो भारतीय इतिहास में इस तरह के विभाजन का कोई बड़ा उदाहरण देखने को नहीं मिलता।

टीएमसी का फंड

चुनाव आयोग की वेबसाइट पर टीएमसी की ऑडिट रिपोर्ट (2024-25) के मुताबिक, तृणमूल कांग्रेस की कुल संपत्ति 1 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा है। इसकी करीब 7 करोड़ रुपये की फिक्स्ड एसेट्स, 250 करोड़ से ज्यादा का निवेश और 680 करोड़ रुपये बैंक डिपॉजिट के रूप में है।

थिंकटैक एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की मानें और संपत्ति के हिसाब से देखें तो तृणमूल कांग्रेस देश की सबसे संपन्न पार्टियों में से एक है। जिसके कुल वैल्यू 1592 करोड़ से ज्यादा है।

2022- शिवसेना की टूट

जून, 2022 में शिवसेना में हुआ विभाजन हुआ। जो महाराष्ट्र के राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी बगावत थी। वरिष्ठ नेता एकनाथ शिंदे ने पार्टी के 39 विधायकों के साथ विद्रोह कर दिया, जिससे उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाविकास अघाड़ी (MVA) सरकार गिर गई।

जुलाई 2022 में शिवसेना के एकनाथ शिंदे गुट ने चुनाव आयोग का रुख किया था। उन्होंने अपने गुट को असली शिव सेना के रूप में मान्यता देने और पार्टी के आधिकारिक धनुष-बाण चुनाव चिह्न की मांग की थी।

चुनाव आयोग ने शिंदे गुट के पक्ष में फैसला दिया। इसके बाद उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट को अपनी पार्टी का नाम बदलकर शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) या शिवसेना (यूबीटी) रखना पड़ा और नया चुनाव चिह्न मशाल मिला।

2023 में ठाकरे गुट ने चुनाव आयोग के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। इस मामले की सुनवाई अभी पूरी नहीं हुई है और जुलाई में फिर शुरू होने की उम्मीद है। इस बीच ठाकरे गुट को 2024 लोकसभा चुनाव और उसके छह महीने बाद विधानसभा चुनाव नए नाम और नए चिह्न के साथ लड़ना पड़ा।

2023- NCP विभाजन

इसी तरह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) प्रमुख शरद पवार भी अपनी ही पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न अपने भतीजे अजित पवार के नेतृत्व वाले गुट से हार गए। इस मामले की सुनवाई भी शिव सेना विवाद के साथ होने की संभावना है। शरद पवार को भी 2024 के दोनों बड़े चुनाव नए चिह्न के साथ लड़ने पड़े।

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एक सवाल के जवाब में महुआ मोइत्रा ने कहा कि मैं अब भी बहुत इमोशनल पॉलिटीशियन हूं। मैं पार्टी को परिवार मानती हूं, आज भी मानती हूं। जैसे आज भी शुभेंदु के साथ मेरे पर्सनल संबंध अच्छे हैं। शुभेंदु मेरे बहुत अच्छे दोस्त थे और हम जब एक साथ पार्टी में थे, उन्होंने मुझे बहुत सपोर्ट किया। पढ़ें पूरी खबर।