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कश्मीर में कौन बनेगा मुफ्ती का मददगार?

श्रीनगर से लौटकर उर्मिलेश जम्मू कश्मीर चुनाव पर ‘एक्जिट पोल’ के लगभग सारे नतीजे सरहदी सूबे में गठबंधन सरकार की संभावना जता रहे हैं। घाटी में मुफ्ती मोहम्मद सईद की पार्टी पीडीपी के सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के आसार हैं, जबकि जम्मू संभाग में भाजपा बड़ी कामयाबी की तरफ बढ़ रही है। […]

Author December 22, 2014 10:21 AM
मतदान बाद के ‘एक्जिट पोल’ में कहा गया है कि पूरे सूबे में पीडीपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी जबकि भाजपा दूसरे नंबर पर रह सकती है। (फोटो: भाषा)

श्रीनगर से लौटकर उर्मिलेश

जम्मू कश्मीर चुनाव पर ‘एक्जिट पोल’ के लगभग सारे नतीजे सरहदी सूबे में गठबंधन सरकार की संभावना जता रहे हैं। घाटी में मुफ्ती मोहम्मद सईद की पार्टी पीडीपी के सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के आसार हैं, जबकि जम्मू संभाग में भाजपा बड़ी कामयाबी की तरफ बढ़ रही है। मतदान बाद के ‘एक्जिट पोल’ में कहा गया है कि पूरे सूबे में पीडीपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी जबकि भाजपा दूसरे नंबर पर रह सकती है। सवाल है, चुनावी नतीजे ऐसे ही आए तो सरकार किसकी और कैसे बनेगी? दूसरा सवाल है, घाटी में मुफ्ती मोहम्मद सईद की पीडीपी और जम्मू में भाजपा के लिए इतनी अनुकूल जमीन कैसे तैयार हुई?

सरहदी सूबे में इस बार के चुनाव में सामाजिक-सामुदायिक स्तर पर जबर्दस्त ध्रुवीकरण देखा गया। अपेक्षाकृत बेहतर मतदान फीसद का सबसे बड़ा राज यही है। कई अन्य कारणों के साथ इस तरह का ध्रुवीकरण भी मतदान फीसद बढ़ाता है। ऐसे माहौल में लोग वोट डालने घर से बाहर निकलते हैं। जम्मू कश्मीर में इस बार सूबे के दोनों क्षेत्रों में ध्रुवीकरण का अलग रूप-रंग था।

जम्मू में ऐसा पहली बार नहीं हुआ। 2008 के चुनाव में भी अमरनाथ भूमि अधिग्रहण विवाद के चलते भारी ध्रुवीकरण हुआ था जिसका फायदा भाजपा ने उठाया। विधानसभा में सिर्फ एक सीट वाली पार्टी 11 सीटों पर कामयाब हो गई। 2002 के विधानसभा चुनाव में उसे सिर्फ एक सीट मिली थी। 2008 में कांग्रेस की हालत पतली हो गई। भाजपा ने उसे सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया। सत्ता में होने का कांग्रेस को फायदा नहीं मिला, जबकि पीडीपी-कांग्रेस गठबंधन सरकार के दूसरे चरण में मुख्यमंत्री बने गुलाम नबी आजाद तब दावा कर रहे थे कि सरकार के अच्छे कामों के बल पर कांग्रेस को सूबे के दोनों क्षेत्रों में बड़ी कामयाबी मिलेगी।

पीडीपी-कांग्रेस गठबंधन की शर्तों के मुताबिक पहले तीन साल पीडीपी ने सरकार का नेतृत्व किया और बाद के तीन साल कांग्रेस ने सरकार चलाई। यह फार्मूला भी कांग्रेस के खिलाफ गया। एंटी-इनकंबेंसी (सत्ता विरोधी) का ज्यादा असर कांग्रेस को झेलना पड़ा। अमरनाथ भूमि विवाद और फिर एक कुख्यात सेक्स-स्कैंडल में सत्ताधारी दल के कुछ विधायकों की कथित संलिप्तता जैसे मामलों ने भी कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया। लेकिन 2008 के चुनाव में भाजपा ने अमरनाथ भूमि विवाद को जम्मू में बड़ा मुद्दा बनाया और समुदाय-विशेष का जमकर भावनात्मक ध्रुवीकरण किया। 2014 के चुनाव में भाजपा ने सामुदायिक ध्रुवीकरण की उसी सियासी जमीन को और फैलाया है।

कुछ ही महीने पहले लोकसभा के चुनाव में भी इसे देखा गया, जब भाजपा को जम्मू-लद्दाख की तीनों सीटों पर कामयाबी मिली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक आकर्षण का इसमें जुड़ना और भी असरदार साबित हुआ। सामुदायिक-सांप्रदायिक स्तर पर गोलबंद लोगों के अलावा एक हिस्सा उन लोगों का भी था, जो प्रधानमंत्री के ‘विकास के एजंडे’ से प्रभावित होकर भाजपा की तरफ मुखातिब हुए। दूसरी तरफ, संघ-भाजपा के नेता सन 52-54 के दौरान चले ‘प्रजा परिषद अभियान’ की भावना को फैलाने में जुटे थे। केंद्र में नए-नए राज्यमंत्री बने जितेंद्र सिंह और अन्य नेता लगातार कह रहे थे कि उनकी पार्टी जल्दी ही अनुच्छेद-370 पर बहस कराकर उसका खात्मा करेगी।

कुछेक भाजपा नेताओं ने तो यहां तक कहा कि अब मौका आ गया है, जब जम्मू कश्मीर की सरकार का मुखिया एक ‘हिंदू’ होगा। इस माहौल में कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के पांव उखड़ने लगे। बीते कुछ बरसों में जम्मू में कांग्रेस का पारंपरिक आधार बुरी तरह सिमटा है। चुनाव से ऐन पहले उसके कई प्रमुख नेता, पूर्व सांसद और पूर्व मंत्री तक भाजपा में शामिल हुए। कश्मीर घाटी का माहौल इससे बिल्कुल अलग दिखा। चुनाव में लोगों की हिस्सेदारी और मतदान फीसद में भारी इजाफा देखा गया। दिल्ली में बैठे बहुत सारे व्याख्याकारों और सियासतदानों ने अच्छे मतदान-फीसद का यह भी नतीजा निकाला कि इस चुनाव से घाटी में जम्हूरियत पटरी पर आ गई, जम्मू और लद्दाख की तरह घाटी अब राष्ट्रीय मुख्यधारा के साथ हो गई और लोगों ने यहां अलगाववाद से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया है।

फिर सन 1987 के विधानसभा चुनाव की कैसे व्याख्या की जाएगी, जिसमें इससे भी ज्यादा लगभग 78 फीसद मतदान हुआ था। इतने बंपर मतदान के बाद क्या हुआ? कुछ ही समय के अंदर घाटी में आतंकवाद का दबदबा बढ़ गया।

बहरहाल, यह चुनाव कई मायनों में पहले के कई चुनावों से अलग है। सन 87 का चुनाव घाटी में अब तक का सबसे धांधली-भरा चुनाव माना जाता है। 2014 के चुनाव को अभी तक किसी ने फर्जी या धांधली वाला चुनाव नहीं कहा है। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जम्मू की तरह घाटी में भी चुनाव के दौरान एक खास तरह का ध्रुवीकरण देखा गया। यह ध्रुवीकरण या गोलबंदी, इस बात को लेकर देखी गई कि घाटी में अलगाववादियों के चुनाव-बहिष्कार का फायदा भाजपा या उसके परोक्ष-प्रत्यक्ष समर्थकों को न मिल सके। इसीलिए, ट्राल, सोपोर या बारामूला जैसे इलाकों में भी इस बार मतदान पहले के मुकाबले कुछ बेहतर रहा।

कश्मीरी समाज के बड़े हिस्से ने अलगाववादियों के चुनाव बहिष्कार का समर्थक होते हुए भी इस बार अपेक्षाकृत ज्यादा मतदान किया। समाज के बड़े हिस्से ने अगर सड़क-बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं के विस्तार के लिए अपेक्षाकृत अच्छे नुमाईंदों और जवाबदेह सरकार की जरूरत के मद्देनजर ऐसा किया तो कुछेक क्षेत्रों में लोगों ने इसलिए भी मतदान किया कि उन्हें डर था कि कहीं उनके मतदान न करने से भाजपा या उसके समर्थक समूहों के उम्मीदवार मामूली वोटों के अंतर से चुनाव जीत न जाएं। इस तरह के कुछेक चुनाव क्षेत्रों में भाजपा और उसके समर्थित समूहों ने घाटी से पलायन कर चुके कश्मीरी पंडितों के वोटों का सहारा लेने की बात जमकर प्रचारित की थी। इसकी प्रतिक्रिया में अमीराकदल, हब्बाकदल, बारामूला, संगरामा, लंगेट, हंदवारा, कुलगाम और ट्राल सहित कई अन्य क्षेत्रों में अलगाववादी हुर्रियत जैसे संगठनों के कुछ कट्टर समर्थकों को भी मतदान करते देखा गया।

बारामूला में नौ दिसंबर को ऐसे कई मतदाताओं से मेरी मतदान केंद्र के बाहर मुलाकात हुई। ज्यादातर ने कहा कि वे सिर्फ इसलिए मतदान कर रहे हैं कि उनके मतदान न करने से चुनाव का ‘कोई गलत नतीजा’ न आ जाए। घाटी के चुनाव मैदान में उतरे कुछेक निर्दलीय उम्मीदवारों या अपेक्षाकृत हल्की-फुल्की या नई तंजीमों को लोगों ने भाजपा के छद्म समर्थक या सहयोगी के तौर पर देखा। इस बात का जोरदार प्रचार हुआ कि श्रीनगर के शेरे-कश्मीर स्टेडियम में प्रधानमंत्री मोदी की चुनाव रैली के लिए इस तरह के उम्मीदवारों और तंजीमों ने हंदवारा और लोलाब जैसे इलाके से लोगों को बसों में बैठाकर भेजा था।

इन्हें अलग से खास सुरक्षा भी मुहैया कराई गई थी। इस बारे में पीपुल्स कांफ्रेंस के विवादास्पद नेता सज्जाद लोन का नाम प्रमुखता से लिया गया। इस बारे में मैंने उनसे जब पूछा तो उन्होंने फोन पर कहा कि चुनाव के दौरान लगाए जा रहे ऐसे आरोपों को कोई गंभीरतापूर्वक नहीं लेता। इस पर मुझे ज्यादा कुछ नहीं कहना है। सज्जाद को छोड़कर इस तरह के ज्यादातर उम्मीदवार मुख्य मुकाबले से बाहर दिख रहे थे। सज्जाद अपने दिवंगत पिता अब्दुल गनी लोन के राजनीतिक असर के चलते हंदवारा सीट पर मुख्य मुकाबले में जरूर दिख रहे थे। उनके पिता अलगाववादी आंदोलन में कूदने से पहले कुपवाड़ा जिले की इस सीट से तीन बार विधायक रहे। सज्जाद ने पिता की हत्या के कुछ बरस बाद अलगाववादी तंजीमों से अपने को अलग कर लिया। अपनी सुरक्षा की परवाह किए बगैर उन्होंने 2009 में बारामूला से संसदीय चुनाव लड़ा। संसदीय चुनाव में उतरने वाले वे पहले प्रमुख अलगाववादी नेता थे। लेकिन वे बुरी तरह हार गए।

इस बार, चुनाव बाद अगर किसी एक दल को अपने बल पर सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं मिला, जैसा ज्यादातर चुनावी-सर्वे अभी से ऐलान कर रहे हैं, तो एक जवाबदेह और स्थायी सरकार के गठन का सवाल बेहद पेंचीदा हो जाएगा। क्या मुफ्ती सन 2002 के ‘राजनीतिक प्रयोग’, जिसके तहत पीडीपी-कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनी थी, को दोबारा आजमाएंगे या नए माहौल में नया समीकरण तलाशेंगे? क्या कांग्रेस को इतनी सीटें मिलेंगी, जिससे वह मुफ्ती की पीडीपी का सहयोगी बनने का मौका पा सके या मुफ्ती को सिर्फ भाजपा का सहारा होगा? कश्मीर में किसी भी सरकार के लिए केंद्र का भरपूर सहयोग और संरक्षण जरूरी है।

इस लिहाज से भी मुफ्ती को अपना सहयोगी चुनने में कुछ वक्त लगाना होगा। एक तरफ, भाजपा से हाथ मिलाना उनके लिए घाटी में सियासी-मुश्किलें पैदा करेगा तो दूसरी तरफ केंद्र की सत्ता में बैठी भाजपा सरकार के साथ दूरी रखना भी आसान नहीं होगा। संभवत: इसी तरह के राजनीतिक माहौल के बीच तैयार होगा कश्मीर में नई सरकार के गठन का रास्ता।

 

 

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