पिछले कुछ सालों में आदिवासी समुदाय के संगठनों की ओर से डीलिस्टिंग की मांग तेज हुई है। आदिवासी समुदाय के मामले में डीलिस्टिंग का मतलब है किसी आदिवासी समुदाय (Scheduled Tribe/ST) को अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर करना।

या फिर ऐसे समझें कि डीलिस्टिंग का मतलब है कि आदिवासी या जनजातीय समाज में ऐसे लोग जिन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया है, उन्हें आरक्षण और एसटी दर्जे के तहत मिलने वाले सरकारी लाभ नहीं दिए जाने चाहिए।

क्या आप जानते हैं कि देश में सबसे पहले डीलिस्टिंग की मांग करने वाले करने वाले आदिवासी नेता कौन थे? ऐसे आदिवासी नेता का नाम कार्तिक उरांव था। कार्तिक उरांव ने ही पहली बार देश की संसद में डीलिस्टिंग के मुद्दे को उठाया था।

दिल्ली में रविवार को जब आरएसएस से जुड़े जनजातीय सुरक्षा मंच (जेएसएम) और वनवासी कल्याण आश्रम ने जनजातीय सुरक्षा समागम का आयोजन किया तो मंच पर भगवान बिरसा मुंडा के साथ ही कार्तिक उरांव की तस्वीर भी लगी हुई थी।

झारखंड के आदिवासी इलाके से उठकर कार्तिक ओरांव संसद में भारत के आदिवासियों की आवाज बने और उन्होंने राजनेता के रूप में आदिवासी समाज के उत्थान के लिए काम किया।

तीन बार लोकसभा चुनाव जीते उरांव

1924 में झारखंड के वर्तमान गुमला जिले के एक छोटे से गांव में कार्तिक उरांव का जन्म हुआ था। साधारण परिवार से आने के बावजूद उरांव ने दृढ़ संकल्प के साथ उच्च शिक्षा प्राप्त की और ब्रिटेन से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। उरांव आदिवासी कल्याण के प्रबल समर्थक के रूप में उभरे और बिहार (अब झारखंड) के लोहरदगा से चुनाव लड़े। उन्होंने लोकसभा चुनाव में- 1967, 1971 और 1980 में जीत हासिल की और नागरिक उड्डयन एवं संचार मंत्री के रूप में भी काम किया।

प्राइवेट मेंबर बिल किया था पेश

कार्तिक उरांव ने 1967 में संसद में एक प्राइवेट मेंबर बिल – The Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Orders) Amendment Bill, 1967 पेश किया। इस विधेयक का उद्देश्य अन्य धर्मों में परिवर्तित हो चुके व्यक्तियों द्वारा अनुसूचित जनजातियों को मिलने वाले संवैधानिक फायदे के दुरुपयोग को रोकना था। विधेयक का सीधा मतलब यह था कि अपने पारंपरिक आदिवासी धर्म को त्यागकर जिन लोगों ने ईसाई धर्म या इस्लाम धर्म अपना लिया है, उन्हें अनुसूचित जनजातियों को मिलने वाले आरक्षित लाभों का हकदार नहीं होना चाहिए।

उरांव का कहना था कि यह कदम संवैधानिक रूप से सही और सामाजिक रूप से जरूरी था। ईसाई मिशनरी संगठनों ने उरांव के इस कदम का विरोध किया था।

1970 में लोकसभा में उरांव के विधेयक पर बहस शुरू हुई। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बाद में इस पर चर्चा करने का वादा किया लेकिन 27 दिसंबर 1970 को संसद भंग हो गई। उरांव ने अपने अनुभवों को ‘बीस वर्ष की काली रात’ नाम की किताब में दर्ज किया। इसमें उन्होंने भारत के आदिवासी इलाकों की जनसांख्यिकीय और सांस्कृतिक पहचान को बदलने के लिए मिशनरी संगठनों द्वारा की गई कथित कोशिशों के बारे में लिखा।

उरांव आदिवासी गौरव और हिंदू पहचान के समर्थक थे। उनका मानना ​​था कि आदिवासी धर्म और हिंदू धर्म आपस में जुड़े हुए हैं। वे आदिवासी समुदाय के लोगों को याद दिलाते थे कि प्रकृति, पूर्वजों और स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा करने की जनजातीय परंपरा उसी सभ्यता का हिस्सा है जिसमें भगवान राम, कृष्ण और जगन्नाथ की पूजा की जाती है।

8 दिसंबर, 1981 को हार्ट अटैक के कारण उनका अचानक निधन हो गया।

‘ईसाई बनने से… कैंसर ठीक हो सकता है’

मध्य प्रदेश के गुना जिले में पुलिस ने दो पादरियों और उनके साथियों के खिलाफ धर्म परिवर्तन का मामला दर्ज किया है। उनपर आरोप है कि ये सभी ‘प्रार्थना से इलाज’ के नाम पर लोगों को बहलाकर उनका धर्म बदलवा रहे थे। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर।