केंद्रीय गृह मंत्री ने शुक्रवार को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पद के लिए सुवेंदु अधिकारी के नाम की घोषणा कर दी है। सुवेंदु 9 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। सुवेंदु ने हाल के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी को बुरी तरह हराया है। इससे पहले भी वह साल 2021 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम सीट पर ममता बनर्जी को हरा चुके हैं। इस विधानसभा में भी सुवेंदु ने इतिहास को दोहराया और भवानीपुर में ममता को हराया।
सुवेंदु कभी तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी के पोस्टर ब्वॉय थे। साथ ही नंदीग्राम में ममता बनर्जी के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के प्रमुख चेहरे थे। 2026 के विधानसभा चुनाव में सुवेंदु ने न केवल नंदीग्राम में ममता के खिलाफ फिर से जीत हासिल की, बल्कि 2021 के मुकाबले कहीं बड़े अंतर से इसी सीट पर करारी शिकस्त दी।
कितने वोटों से जीते सुवेंदु अधिकारी?
2021 में ममता के खिलाफ सुवेंदु ने 1,956 वोटों से जीत हासिल की थी, वहीं इस बार भवानीपुर सीट पर 15,105 वोट के भारी अंतर से ममता को हराया है। इतना ही नहीं सुवेंदु ने नंदीग्राम सीट पर भी जीत हासिल की है, लेकिन यह टीएमसी प्रत्याशी पबित्रा कर के खिलाफ जीत है, यहां से सुवेंदु 9,665 वोटों से जीते हैं।
मुख्यमंत्री पद के लिए प्रबल दावेदार
भाजपा ने चुनाव के दौरान घोषणा की थी कि उसका सीएम उम्मीदवार वह व्यक्ति होगा, जो बंगाल में जन्मा और पला-बढ़ा हो और जिसने बांग्ला माध्यम में शिक्षा हासिल की हो। दिलचस्प बात यह है कि सुवेंदु उन सभी कसौटी पर खरे उतरे हैं, जिनका जिक्र केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव प्रचार के दौरान किया था, भाजपा ने अब उन्हें पश्चिम बंगाल की कमान सौंप कर फल दे दिया है।
सुवेंदु एक समय में ममता के सबसे करीबी सहयोगियों में थे, लेकिन समय ने दोनों को एक-दूसरे के खिलाफ लाकर खड़ा कर दिया। बंगाल की राजनीति में सुवेंदु का उभरने में कानून-व्यवस्था, घुसपैठ और टीएमसी शासन में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों ने खासा मदद की।
कब रखा राजनीति में कदम?
सुवेंदु ने अपने शुरुआती राजनीतिक जीवन का अधिकांश समय मुख्य रूप से कृषि प्रधान पूर्व मेदिनीपुर जिले के तटीय और औद्योगिक क्षेत्रों में दबदबा कायम करने में बिताया। हालांकि, 2020 में वह तृणमूल कांग्रेस से अलग हो गए। सुवेंदु का भाजपा में शामिल होना बंगाल की राजनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हुआ और वह जल्द ही राज्य में पार्टी के सबसे प्रमुख नेताओं में से एक बन गए।
अपने शुरुआती सालों के दौरान आरएसएस की शाखाओं में प्रशिक्षित सुवेंदु ने 1980 के दशक के अंत में कांग्रेस के छात्र संगठन छात्र परिषद के सदस्य के रूप में राजनीति में कदम रखा। 1995 में पहली बार सुवेंदु ने राजनीति में किस्मत अजमाई और कांथी नगरपालिका के पार्षद चुने गए। सुवेंदु के पिता शिशिर अधिकारी भी 1967 से 2009 तक यहीं के पार्षद थे।
2006 में मिली सफलता
सुवेंदु 1999 में अपने पिता के साथ टीएमसी में शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने दो बार चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों बार यानी 2001 के विधानसभा चुनाव और 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्हें हार मिले। अंततः सुवेंदु ने साल 2006 में कोंटाई विधानसभा सीट जीती।
टीएमसी से कैसे अलग हुए सुवेंदु?
साल 2007 में नंदीग्राम में हुए कृषि भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन ने बंगाल के राजनीति का ढांचा ही बदल दिया और इसी आंदोलन ने सुवेंदु को टीएमसी में खास बन गए। सुवेंदु जल्द ही टीएमसी के ‘कोर ग्रुप’ के सदस्य बन गए और उन्हें पार्टी की युवा कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया। साल 2009 और 2014 में वह तामलुक से लोकसभा चुनाव जीते।
2011 में ममता के मुख्यमंत्री बनने के बाद अधिकतर लोगों ने सुवेंदु को उनके उत्तराधिकारी के रूप में देखा। हालांकि 21 जुलाई को टीएमसी की पहली वार्षिक शहीद दिवस रैली में ममता बनर्जी से अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को राजनीति में एंट्री कराई और 24 वर्षीय अभिषेक बनर्जी को टीएमसी की युवा ईकाई का अध्यक्ष बना दिया गया, जो टीएमसी कांग्रेस के बराबर का संगठन था। इस फैसले से सुवेंदु नाराज हो गए क्योंकि पार्टी के संविधान में दो युवा संगठनों के लिए कोई जगह नहीं थी।
साल 2014 में सुवेंदु को टीएमसी के अध्यक्ष पद से हटा दिया गया और कुछ माह बाद इस संगठन का युवा कांग्रेस में विलय कर दिया गया।
(इनपुट- भाषा)
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी प्रचंड जीत की हुई है। बीजेपी 207 सीट जीती है तो वहीं टीएमसी महज 89 सीटों पर सिमट गई है। बंगाल में बहुमत का आंकड़ा 148 है। बीजेपी की बंगाल जीत के साथ ही मुख्यमंत्री पद को लेकर चर्चा तेज हो गई है। चुनाव प्रचार के दौरान जब-जब गृह मंत्री अमित शाह से पूछा गया कि बंगाल का मुख्यमंत्री कौन होगा तो उन्होंने जवाब दिया कोई बंगाली हिंदू ही बीजेपी की ओर से सीएम बनेगा। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
