चंडीगढ़ में एंबुलेंस ड्राइवर की लापरवाही से एक मरीज की हालत और बिगड़ने का मामला सामने आया है। पैर में फ्रैक्चर से पीड़ित 83 वर्षीय एक मरीज सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल, सेक्टर 32 (GMCH-32) ले जाते समय एंबुलेंस ड्राइवर की लापरवाही के कारण स्ट्रेचर से गिर गया। पर, चंडीगढ़ प्रशासन ने इस घटना से खुद को अलग करते हुए कहा कि ड्राइवर एक प्राइवेट एंबुलेंस सर्विस का था।

सीसीटीवी में कैद हुई 28 मार्च की घटना ने निजी आपातकालीन परिवहन के मामले में जवाबदेही की कमी को उजागर किया है, जिसमें कोई भी प्राधिकरण कार्रवाई की जिम्मेदारी नहीं ले रहा है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब कोई निजी एंबुलेंस चालक किसी मरीज का सही तरीके से ध्यान नहीं रखता है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार होता है?

Chandigarh: क्या है एंबुलेंस ड्राइवर की लापरवाही का मामला?

मामला चंडीगढ़ का है जहां मरीज की हालत बिगड़ने पर उसे मोहाली से लाया जा रहा था। परिवार की शिकायत के अनुसार, ड्राइवर ने स्ट्रेचर को एक हाथ से पकड़ रखा था जिससे वह पलट गया। इसके चलते बुजुर्ग व्यक्ति बेहोश हो गए। परिवार द्वारा मदद के लिए जीएमसीएच-32 से संपर्क करने के बाद एम्बुलेंस की व्यवस्था किए जाने के बावजूद, स्वास्थ्य विभाग ने दावा किया कि चालक पर उसका कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है।

चंडीगढ़ प्रशासन ने मामले से झाड़ा पल्ला

चंडीगढ़ प्रशासन के निदेशक (स्वास्थ्य सेवा) सुमन सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत के दौरान कहा, “मैंने शिकायत देखी है। दरअसल, मुझे बताया गया है कि ड्राइवर एक प्राइवेट एंबुलेंस चालक है। वह हमारा सरकारी ड्राइवर नहीं है। ” उन्होंने बताया कि चंडीगढ़ में 16 एम्बुलेंस हैं जिनमें एक चालक, एक आपातकालीन कर्मी और एक सहायक मौजूद होते हैं। प्रशिक्षण के बारे में उन्होंने कहा कि चालकों को हर तीन महीने में प्राथमिक चिकित्सा, सीपीआर और रोगी को संभालने का प्रशिक्षण दिया जाता है। हालांकि, सीसीटीवी फुटेज में दिख रहे ड्राइवर के खिलाफ कार्रवाई के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने दोहराया कि वह सरकारी बेड़े का हिस्सा नहीं था।

शिकायत के अनुसार, ड्राइवर मरीज को बिस्तर से स्ट्रेचर पर ट्रांसफर करने में असमर्थ था। स्ट्रेचर को घर से बाहर ले जाते समय ड्राइवर ने कथित तौर पर उसे इतनी लापरवाही से संभाला कि वह पलट गया। मरीज की बेटी ने आगे आरोप लगाया कि मरीज को दोबारा उठाते समय ड्राइवर ने उसे टूटी हुई जगह से पकड़ा जो बुनियादी प्रशिक्षण की कमी को दर्शाता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि ड्राइवर ने यात्रा के दौरान अपशब्दों का प्रयोग किया।

शिकायत में कहा गया है, “यह स्पष्ट है कि यह व्यक्ति न तो मरीजों को संभालने या एंबुलेंस चलाने के लिए उचित रूप से प्रशिक्षित है और न ही योग्य है। ऐसा व्यवहार लोगों के जीवन को गंभीर खतरे में डालता है।”

क्या कहते हैं नियम?

मौजूदा नियमों के तहत, एंबुलेंस चालकों के पास कमर्शियल ड्राइविंग लाइसेंस होना चाहिए, उन्हें चिकित्सा योग्यता मानकों को पूरा करना चाहिए और उनसे प्राथमिक चिकित्सा, सीपीआर और रोगी को संभालने का बुनियादी प्रशिक्षण भी होना चाहिए। उन्हें रोगियों को ट्रांसफर करने में सहायता करने और अस्पताल के कर्मचारियों के साथ समन्वय स्थापित करने की भी जरूरत होती है। लेकिन, निजी ऑपरेटरों के मामले में यह सब जानकारी न के बराबर होती है।

ऐसे में अगर आरोप सिद्ध हो जाता है तो परिवहन विभाग एंबुलेंस चालक का लाइसेंस निलंबित या रद्द कर सकता है। हालांकि, ऐसी कार्रवाई जिला अधिकारियों द्वारा की गई जांच पर निर्भर करती है। वहीं, जब परिवहन के दौरान किसी मरीज को चोट लग जाती है और एंबुलेंस सर्विस किसी सरकारी अस्पताल की होती है तो सवाल यह उठता है कि इसके लिए कौन जवाबदेह है? फिलहाल, इसका जवाब यही लगता है कि कोई नहीं।

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