आईआईटी से इंजीनियरिंग करने के बाद ज्यादातर युवाओं का सपना किसी बड़ी कंपनी में नौकरी और लाखों रुपये के पैकेज का होता है, लेकिन पवन कुमार चांदना (Pawan Kumar Chandana) ने अलग रास्ता चुना। उन्होंने करीब 40 हजार रुपये महीने की सरकारी नौकरी से अपने करियर की शुरुआत की, क्योंकि उनका लक्ष्य सिर्फ सुरक्षित भविष्य बनाना नहीं, बल्कि अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में कुछ नया करना था। उस समय यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन यही जोखिम आगे चलकर भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र की बड़ी उपलब्धि की नींव बना।

पवन कुमार चांदना का जन्म 1991 में हैदराबाद में हुआ था। उनकी शुरुआती स्कूली शिक्षा भी यहीं हुई। स्कूल के दिनों में एक समय गणित में उन्हें अपेक्षा से कम अंक मिले थे, लेकिन उन्होंने मेहनत के दम पर IIT-JEE की तैयारी की और बाद में IIT खड़गपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की।

इसके बाद उन्होंने विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC) में इसरो के वैज्ञानिक के रूप में करीब छह साल तक काम किया, जहां वे GSLV Mk-III (अब LVM3), GSLV Mk-II और SSLV जैसे महत्वपूर्ण रॉकेट कार्यक्रमों से जुड़े रहे। 2018 में उन्होंने इसरो की नौकरी छोड़कर स्काईरूट एयरोस्पेस की सह-स्थापना की।

पवन कुमार चांदना आज Skyroot Aerospace के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) हैं। उनकी कंपनी ने 18 जुलाई को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से अपने स्वदेशी रॉकेट विक्रम-1 का पहला ऑर्बिटल मिशन ‘आगमन’ सफलतापूर्वक लॉन्च किया। यह उपलब्धि भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर मानी जा रही है, क्योंकि इससे निजी भारतीय कंपनियों की ऑर्बिटल लॉन्च क्षमता को नई पहचान मिली।

जब पैकेज से ज्यादा जरूरी लगा सपना

एक इंटरव्यू में पवन चांदना ने बताया कि आईआईटी से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने करीब 40 हजार रुपये महीने की सरकारी नौकरी की थी। उन्होंने कहा था कि आईआईटी से इंजीनियरिंग करने के बाद इतनी कम सैलरी वाली नौकरी चुनना आम फैसला नहीं था, लेकिन उन्होंने यह कदम अपने जुनून को पूरा करने के लिए उठाया।

उनके लिए अंतरिक्ष तकनीक में काम करने का सपना आर्थिक सुरक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण था। यही सोच उन्हें आगे ले गई और साल 2018 में उन्होंने नागा भरत डाका (Naga Bharath Daka) के साथ मिलकर स्काईरूट एयरोस्पेस की शुरुआत की।

बंद दरवाजों से खुले अंतरिक्ष बाजार तक

जब स्काईरूट की शुरुआत हुई थी, तब भारत में निजी कंपनियों के लिए रॉकेट लॉन्च करने का रास्ता पूरी तरह खुला नहीं था। अंतरिक्ष क्षेत्र में सरकारी संस्थानों का दबदबा था और निजी कंपनियों के लिए बड़े स्तर पर काम करना चुनौतीपूर्ण था।

हालांकि, साल 2020 में भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी को बढ़ावा देने की दिशा में कदम उठाए। इसके बाद स्टार्टअप्स को लॉन्च व्हीकल और सैटेलाइट तकनीक विकसित करने के नए अवसर मिले। स्काईरूट ने इसी माहौल में तेजी से अपनी तकनीक विकसित की और अब विक्रम-1 मिशन के जरिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव हासिल किया है।

विक्रम-1 की खासियत

डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में नामित विक्रम-1 एक छोटा सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल है, जिसे लो अर्थ ऑर्बिट में छोटे उपग्रह पहुंचाने के लिए तैयार किया गया है।

करीब सात मंजिला ऊंचाई वाले इस रॉकेट में कई स्वदेशी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। इसकी संरचना हल्के और मजबूत कार्बन कंपोजिट से बनी है। इसमें 3डी प्रिंटेड लिक्विड इंजन जैसी आधुनिक तकनीक भी शामिल है। इस मिशन का उद्देश्य सिर्फ रॉकेट को अंतरिक्ष तक पहुंचाना नहीं, बल्कि भविष्य के व्यावसायिक लॉन्च मिशनों के लिए जरूरी तकनीकी डेटा हासिल करना भी था।

युवा टीम की बड़ी उपलब्धि

स्काईरूट की इस उपलब्धि ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित किया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर यूजर @caleb_friesen ने भारत के निजी स्पेस सेक्टर के बदलाव को याद करते हुए लिखा कि जब उन्होंने पहली बार भारत का दौरा किया था, तब निजी कंपनियों के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र में काम करना काफी सीमित था। उनके अनुसार, 2018 में स्काईरूट की शुरुआत के समय पवन चांदना और भरत डाका ने उस समय निवेश किया, जब यह क्षेत्र अभी शुरुआती दौर में था।

उन्होंने स्काईरूट की युवा टीम की भी सराहना की। कंपनी की टीम की औसत उम्र करीब 28 वर्ष बताई गई है, जिसने लंबे समय की मेहनत और तकनीकी क्षमता के दम पर यह उपलब्धि हासिल की।

नई उड़ान की शुरुआत

सफल लॉन्च के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पवन कुमार चांदना और उनकी टीम से बातचीत कर उन्हें बधाई दी। प्रधानमंत्री ने इस मिशन को भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम और युवाओं की क्षमता के लिए महत्वपूर्ण बताया।

पवन चांदना की कहानी सिर्फ एक रॉकेट लॉन्च की कहानी नहीं है। यह उस सोच की कहानी है जिसमें कोई युवा सुरक्षित रास्ते के बजाय अपने सपने को चुनता है। आईआईटी की डिग्री के बाद 40 हजार रुपये की नौकरी से शुरुआत करने वाला यह सफर दिखाता है कि बड़े बदलाव अक्सर उन फैसलों से शुरू होते हैं, जिन्हें उस समय जोखिम माना जाता है।

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