जयपुर की महारानी गायत्री देवी के संग्रह से प्राप्त 17वीं शताब्दी में पीतल से बने एक दुर्लभ खगोलीय सुपरकंप्यूटर (एस्ट्रोलैब) को अगले सप्ताह लंदन में सोथबी नीलामीघर में नीलाम किया जाएगा। बुधवार को होने वाली नीलामी में यह सुपरकंप्यूटर इस्लामिक जगत एवं भारत की कला का मुख्य आकर्षण है। इसे इस सप्ताहांत प्रदर्शित किया गया था और इसकी अनुमानित कीमत 15 से 25 लाख पौंड के बीच है।

वर्ष 1612 का यह सुपरकंप्यूटर अपनी तरह का सबसे बड़ा कंप्यूटर माना जाता था और इसे लाहौर के एक मुगल रईस के लिए दो भाइयों ने बनाया था। यह जटिल उपकरण महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय के शाही संग्रह का हिस्सा था और बाद में उनकी पत्नी गायत्री देव के पास रहा और फिर निजी संग्रह में चला गया। गायत्री देवी जयपुर की राजमाता थीं। नीलामी के विवरण में बताया गया, ‘इसे आगा अफजल ने बनवाया था, जो मुगल साम्राज्य के एक बेहद शक्तिशाली सरदार थे और उस समय सम्राट जहांगीर के अधीन लाहौर का प्रशासन संभाल रहे थे। यह वस्तु स्पष्ट रूप से उनकी प्रतिष्ठा के अनुरूप ही बनाई गई थी।’

विवरण के मुताबिक, ‘इसकी कारीगरी वाकई अद्भुत है। इसमें 94 शहरों का देशांतर और अक्षांश सहित विवरण अंकित है, फूलों की नक्काशी से जुड़े 38 तारा चिह्न हैं, पांच प्लेटें हैं और डिग्री का विभाजन बेहद बारीक है।’ इस ‘एस्ट्रोलैब’ पर तारों के फारसी नाम और देवनागरी लिपि में संस्कृत नाम अंकित हैं, साथ ही मक्का, बीजापुर, अजमेर, कश्मीर और लाहौर के स्थानों को दर्शाने वाली पट्टियां भी हैं। संदर्भित आधिकारिक साहित्य के अनुसार, 17वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में लाहौर मुगल साम्राज्य में एस्ट्रोलैब निर्माण का प्रमुख केंद्र था। लाहौर स्कूल के नाम से प्रसिद्ध यह शिल्प एक ही परिवार के भीतर चार पीढ़ियों तक पिता से पुत्र के बीच ही आगे बढ़ता रहा।

इस विशेष उपकरण को बनाने वाले दो भाई कइम मोहम्मद और मोहम्मद मुकिम इस स्कूल के सबसे प्रसिद्ध निर्माताओं में से थे। उन्होंने मिलकर कई एस्ट्रोलैब बनाए जो आज भी मौजूद हैं। उन्होंने केवल दो पर ही एक साथ काम किया था और लंदन में प्रदर्शित एस्ट्रोलैब उन्हीं में से एक है। उनके द्वारा संयुक्त रूप से निर्मित एकमात्र अन्य एस्ट्रोलैब अब इराक के राष्ट्रीय संग्रहालय में है।

वर्ष1612 का यह सुपर कंप्यूटर अपनी तरह का सबसे बड़ा कंप्यूटर माना जाता था और इसे लाहौर के एक मुगल रईस के लिए दो भाइयों ने बनाया था। यह जटिल उपकरण महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय के शाही संग्रह का हिस्सा था और बाद में उनकी पत्नी गायत्री देव के पास रहा और फिर निजी संग्रह में चला गया।