Madan Mitra Left TMC: पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने अपने एक करीबी वफादार सिपाही मदन मित्रा के बारे में बात करते हुए एक बार कहा था, “एक कलरफुल लड़का, जो कि कभी-कभी कुछ ज्यादा ही रंगीन हो जाता है।” वहीं मदन मित्रा बुधवार को ममता बनर्जी को एक बड़ा राजनीतिक झटका दे गए और उन्होंने नेता विपक्ष ऋतब्रत बनर्जी वाला टीएमसी का बागी गुट जॉइन कर लिया।
मदन मित्रा के इस फैसले का चर्चा इसलिए भी हो रही है क्योंकि उनके इस कदम से ठीक एक दिन पहले कथित नगरपालिका भर्ती घोटाले के संबंध में केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय ने उनके परिवार के सदस्यों को पूछताछ कते लिए समन भेजा था, लेकिन आखिर मदन मित्रा का राजनीतिक सफर कैसा रहा है, इसे भी समझना चाहिए।
मदन मित्रा की पृष्ठभूमि
मदन मित्रा की बात करें तो वे दक्षिणी कोलकाता के एक समृद्ध कारोबारी परिवार में से आते हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से इतिहास की पढ़ाई की और 1976 में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। 1970 के दशक की उथल-पुथल के बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी के सहयोगी के तौर पर मदन मित्रा ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी। मदन मित्रा और ममता बनर्जी दोनों ही कांग्रेस में तो थे लेकिन प्रतिद्वंदी गुट के थे।
साल 1990 के दशक तक मदन मित्रा दक्षिण कोलकाता में एक शक्तिशाली कांग्रेसी नेता बन गए थे, जिनकी संगठन पर काफी अच्छी पकड़ थी। वे लेफ्ट सरकार के लिए लगातार चुनौती भी बन रहे थे। उन्होंने टैक्सी चालकों और एसएसकेएम सरकारी अस्पताल के प्रभावशाली कर्मचारी संघ पर नियंत्रण करने के साथ ही आस-पड़ोस के युवा क्लबों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए और जमीनी राजनीति में अपनी पैठ बनाई। उन्होंने राजनीतिक संबद्धता की परवाह किए बिना निवासियों के लिए सुलभ होने की प्रतिष्ठा भी हासिल की।
TMC के संस्थापक सदस्य
ममता बनर्जी और मदन मित्रा के बीच राजनीतिक संबंधों को इससे भी समझा जा सकता है, कि जब ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (एआईटीसी) की स्थापना की, तो मदन मित्रा पार्टी के संस्थापक सदस्यों की लिस्ट में शामिल हो गए थे। उन्हें ममता ने साल 2000 में पार्टी का महासचिव नियुक्त किया गया और 2004 में वे तृणमूल युवा कांग्रेस के अध्यक्ष बने। पार्टी के भीतर उन्होंने सबसे प्रभावी आयोजकों और संगठन के मजबूत शख्स बन गए थे।
चुनावी सफर और कानूनी मुश्किलें
मदन मित्रा ने साल 2011 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में उत्तर 24 परगना के कमरहटी से जीत हासिल कर विधानसभा में अपनी जगह बनाई थी। नतीजा ये कि दीदी ने उन्हें अपनी कैबिनेट में भी जगह दी थी। ममता दीदी की कैबिनेट में उन्होंने खेल और युवा मामलों और परिवहन सहित महत्वपूर्ण विभागों का कार्यभार संभाला था।
मदन मित्रा को पहला बड़ा झटका तब लगा जब 13 दिसंबर 2014 को सीबीआई ने उन्हें सारदा चिट फंड घोटाले के सिलसिले में गिरफ्तार कर लिया। वे करीब 27 महीने तक हिरासत में रहे थे। नवंबर 2015 को स्वास्थ्य समस्याओं के चलते उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया और सितंबर 2016 में उन्हें अदालत से जमानत मिल गई।
मदन मित्रा जेल में थे और चुनाव प्रचार नहीं कर पाए थे। इसके चलते 2016 के विधानसभा चुनाव में वे अपनी सीट से चुनाव हार गए थे। उन्होंने 2021 में कमरहटी सीट से फिर चुनाव जीतकर विधानसभा में वापसी की, और 2026 के इस बार के चुनाव में 43 प्रतिशत से ज्यादा का वोट हासिल कर फिर विधानसभा में अपनी सीट पक्की की।
परंपरागत राजनीति से अलग मदन मित्रा
मदन मित्रा परंपरागत राजनेताओं से हमेशा ही कुछ अलग नजर आए हैं। आम तौर पर राजनेता सफेद और खादी के लिबास में नजर आते हैं, जबकि मदन मित्रा अपने चटख रंग के कपड़ों, डिज़ाइनर चश्मों और विशिष्ट जूतों के लिए पहचाने जाते हैं। वे सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय हैं और फेसबुक पर उनके लगभग 740,000 फॉलोअर्स हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि वे अक्सर फेसबुक लाइव सेशन करते हैं, और वे बंगाली फिल्म ‘ओह! लवली’ में भी काम कर चुके हैं।
नेताओं ने कैसी प्रतिक्रिया दी
अब टीएमसी से अपने इस्तीफे की घोषणा करते हुए मदन मित्रा ने कहा है कि उन्होंने पार्टी की विचारधारा या चिन्ह नहीं छोड़ा है। उन्होंने ममता बनर्जी पर अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को संगठन पर हावी होने देने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “मैं दुखी नहीं हूं क्योंकि मैंने पार्टी या उसके चिन्ह को नहीं छोड़ा है। ममता की सबसे बड़ी गलती अभिषेक बनर्जी को प्राथमिकता देना रही है। मैं ऐसी पार्टी में काम नहीं कर सकता था, जो इस तरह चलाई जा रही हो। उनके सभी कार्यकर्ता पार्टी छोड़ रहे हैं, क्योंकि वह अब खुद पार्टी नहीं चलाना चाहतीं, बल्कि सिर्फ अभिषेक का समर्थन करती हैं। आज भी टीएमसी में ब्रिगेड परेड ग्राउंड को भरने की ताकत है। ईडी से भी ज्यादा मुझे एबी (अभिषेक बनर्जी) से डर लगता था।”
विद्रोही खेमे में उनका स्वागत करते हुए ऋतब्रता बनर्जी ने कहा, “वे एक अनुभवी नेता, मंझे हुए राजनीतिज्ञ और विधायक हैं। यह एक सामूहिक आंदोलन है, और उनके हमारे साथ जुड़ने से यह और मजबूत होगा।” इस मुद्दे पर बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने कहा, “वाह! बहुत बढ़िया। उनका व्यक्तित्व बहुत ही आकर्षक है। मदन मित्रा टीएमसी की स्थापना से ही इसके साथ हैं। हम सभी जानते हैं कि वे टीएमसी कार्यकर्ताओं के लिए इसके सभी कार्यक्रमों में पैकेट की व्यवस्था करते थे।”
मदन मित्रा के अलावा अनुब्रत मंडल भी टीएमसी छोड़ चुके हैं। एक दिन में दो बड़े झटके टीएमसी के ममता गुट के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माने जा रहे हैं।
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पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए बुधवार का दिन दो बड़े झटकों वाला रहा। दीदी के दो पुराने करीबी नेताओं ने टीएमसी छोड़ने का ऐलान कर दिया। इसमें एक नाम मदन मित्रा का है तो दूसरा अनुब्रत मंडल का। ये दोनों ही टीएमसी के शासनकाल के दौरान ममता बनर्जी की एक बड़ी ताकत माने जाते थे। इन नेताओं के पार्टी छोड़ने पर पूर्व सीएम पहली प्रतिक्रिया आई है। पढ़िए पूरी खबर…
