देश की राजधानी नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने लोक कलाकार गुरु संगयुसांग पोंगेनर को पद्म श्री से सम्मानित किया। नागालैंड के 83 वर्षीय लोक कलाकार और सांस्कृतिक संरक्षक गुरु संगयुसांग पोंगेनर को जब सम्मान देने के लिए बुलाया गया तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। संगयुसांग पोंगेन पारंपरिक नागा पोशाक पहने अवार्ड लेने पहुंचे। यह सम्मान उन्हें आओ नागा लोक कलाओं में उनके असाधारण योगदान के लिए दिया गया।

गुरु संगयुसांग पोंगेनर का जन्म सन् 1945 में हुआ था। वे आठ भाई-बहनों में सबसे बड़े हैं। इनकी एक बहन और 6 भाई हैं। पोंगेनर का पालन-पोषण उंगमा गांव में हुआ और वर्तमान में वे आओंग मेपु (उंगमा) में रहते हैं। पोंगेनर के पांच बच्चे हैं, जिसमे एक बेटा और चार बेटियां शामिल हैं।

पोंगेनर ने आओ नागा समुदाय की विरासत को सहेजा

मोकोकचुंग जिले के उंगमा गांव में जन्मे पोंगेनर ने छह दशकों से अधिक समय आओ नागा समुदाय की समृद्ध विरासत को सहेजने में बिताया है। कम उम्र से ही उन्होंने गांव के बुजुर्गों से गीत, नृत्य और कहानी सुनाने की कला सीखी। यही ज्ञान बाद में स्वदेशी संस्कृति की रक्षा के उनके आजीवन मिशन की नींव बना।

सांस्कृतिक संरक्षकों में से एक हैं पोंगेनर

पोंगेनर को नागालैंड के सबसे प्रभावशाली सांस्कृतिक संरक्षकों में से एक माना जाता है। वर्षों से उन्होंने न केवल पारंपरिक आओ लोक संगीत प्रस्तुत किया है, बल्कि लुप्त हो रही कला शैलियों के दस्तावेज़ीकरण, शिक्षण और पुनरुद्धार के लिए भी अथक प्रयास किए हैं। उन्होंने 1982 में नागा वादिर क्लब की सह-स्थापना की, जो नागा विरासत की रक्षा और युवा कलाकारों के प्रशिक्षण के लिए समर्पित एक संगठन है। इस मंच के माध्यम से उन्होंने अनगिनत छात्रों का मार्गदर्शन किया है, यह सुनिश्चित करते हुए कि आओ लोक परंपराएं भावी पीढ़ियों तक पहुंचती रहें।

संगीत के अलावा पोंगेनर ने लोक रंगमंच और सांस्कृतिक शिक्षा में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने दर्जनों पारंपरिक गीत रचे हैं और मंच प्रस्तुतियों में भाग लिया है जो आओ इतिहास और पहचान को जीवंत बनाती हैं। सांस्कृतिक पहलों के तहत अपने मार्गदर्शक के रूप में भी वे जाने जाते हैं, जहां उन्होंने युवा कलाकारों को पारंपरिक संगीत और नृत्य शैलियों में प्रशिक्षित किया है। उनके काम ने सांस्कृतिक परिवर्तन के इस युग में सामुदायिक शिक्षा को जीवित रखने में मदद की है।

सांस्कृतिक जड़ों के महत्व पर जोर देते हैं पोंगेनर

दशकों के कार्य के बाद भी पोंगेनर सांस्कृतिक जड़ों के महत्व पर जोर देते रहते हैं। उन्होंने अक्सर इस बात पर चर्चा की है कि परंपराएं, गीत और सामुदायिक ज्ञान पहचान के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं, खासकर युवा पीढ़ी के लिए जो तेजी से बदलती दुनिया में अपना जीवन यापन कर रही है। 2 हजार से अधिक युवाओं को पोंगेनर ने प्रशिक्षित किया है।

कम उम्र में ही कर ली बुजुर्गों से दोस्ती

पोंगेनर ने नागालैंड ट्रिब्यून से बात करते हुए कहा था कि आओ लोक कलाओं में उनकी रुचि लगभग 14 से 15 वर्ष की आयु में शुरू हुई, जब उन्होंने अपनी भाषा में गाना शुरू किया। उन्होंने कहा कि लोककथाओं के बारे में अधिक जानने के लिए उन्होंने अपनी कम उम्र में ही बुजुर्गों से दोस्ती कर ली और अपनी इस रुचि को पूरी लगन से आगे बढ़ाया।

जब उनसे उनकी प्रेरणा के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने उंगमा गांव के दिवंगत डॉ. आई सतेमरेन लोंगकुमेर को अपना आदर्श और गुरु बताया। उन्होंने कहा कि उंगमा गांव ने पांच गुरु दिए हैं, जिनमें से चार अभी जीवित हैं। पोंगेनर की सबसे बड़ी चिंता युवा पीढ़ियों को ज्ञान देना है।

किन उपलब्धियों से सम्मानित हो चुके हैं पोंगेनर

  • 2002 में संगीत नाटक अकादमी राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित
  • 2014 में IGNOU की मदद से NEZCC द्वारा गुरु की उपाधि से सम्मानित
  • 2017 में नागालैंड सरकार द्वारा कला और संगीत के क्षेत्र में राज्यपाल पुरस्कार
  • 2018: एम. टेबल से अचीवमेंट सर्टिफिकेट
  • जून 2024 से भारत सरकार के कला-दीक्षा कार्यक्रम के तहत मार्गदर्शक के रूप में इच्छुक युवाओं को आओ लोकगीतों और नृत्यों का प्रशिक्षण प्रदान कर रहे
  • 23 जून 2026 को आओ नागा लोक कलाओं में उत्कृष्ट योगदान के लिए पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित