Tamil Nadu News: टीवीके प्रमुख विजय के तमिलनाडु के अगले मुख्यमंत्री बनने के रास्ते में अप्रत्याशित रूप से विराम लग गया है। ऐसा इस वजह से क्योंकि राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने सरकार बनाने के लिए किसी भी निमंत्रण से पहले पार्टी से बहुमत समर्थन का दस्तावेज लाने पर जोर दिया है।
गोवा की राजधानी पणजी के मूल निवासी और भारतीय जनता पार्टी के एक अनुभवी नेता आर्लेकर एक ऐसे परिवार से आते हैं जिसका आरएसएस से गहरा संबंध रहा है। उनके पिता विश्वनाथ आर्लेकर जनसंघ के गोवा अध्यक्ष थे और आर्लेकर खुद राज्य के बीजेपी अध्यक्ष रह चुके हैं। आपातकाल के दौरान पिता और पुत्र दोनों को जेल में समय बिताना पड़ा था। हालांकि, पिछले पांच सालों से वह अलग-अलग राज्यों के राज्यपाल के रूप में काम कर चुके हैं और चुनावों से ठीक दो महीने पहले ही तमिलनाडु के राज्यपाल बने हैं।
आर्लेकर हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल भी रहे थे
जुलाई 2021 में हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव से एक साल पहले आर्लेकर को राज्य का राज्यपाल नियुक्त किया गया। फरवरी 2023 में, उनका ट्रांसफर बिहार कर दिया गया। दो साल बाद उनका फिर से ट्रांसफर हुआ और इस बार उन्हें केरल राजभवन में नियुक्त किया गया। मार्च 2026 में आरएन रवि को चुनाव वाले राज्य पश्चिम बंगाल में ट्रांसफर किए जाने के बाद, उन्हें तमिलनाडु का अतिरिक्त प्रभार दिया गया।
इस साल जनवरी में केरल विधानसभा के बजट सत्र के पहले दिन आर्लेकर ने अपने पारंपरिक भाषण के कुछ हिस्सों को छोड़कर विवाद खड़ा कर दिया था। यह भाषण सरकार के प्रदर्शन का लेखा-जोखा होता है। छोड़े गए हिस्सों में केंद्र में बीजेपी सरकार को निशाना बनाने वाले अंश शामिल थे। एक वाक्य था, “इन सामाजिक और संस्थागत उपलब्धियों के बावजूद, केरल को केंद्र सरकार की कई प्रतिकूल कार्रवाइयों के कारण गंभीर वित्तीय संकट का सामना करना पड़ रहा है, जो राजकोषीय संघवाद के संवैधानिक सिद्धांतों को कमजोर करती हैं।” तत्कालीन मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने बाद में उन हिस्सों को पढ़कर सुनाया, जिन्हें आर्लेकर ने छोड़ दिया था।
जून 2025 में आधिकारिक समारोहों में ‘भारत माता’ के पोर्ट्रेट के इस्तेमाल को लेकर आर्लेकर एक और विवाद में फंस गए। तत्कालीन कृषि मंत्री पी. प्रसाद राजभवन के केंद्रीय हॉल में ऐसे पोर्ट्रेट की उपस्थिति के विरोध में एक समारोह से अनुपस्थित रहे। इसके दो हफ्ते बाद, तत्कालीन केरल शिक्षा मंत्री वी. शिवनकुट्टी राजभवन में एक आधिकारिक समारोह से बाहर चले गए, जहां राज्यपाल मुख्य अतिथि थे। उन्होंने समारोह स्थल पर भगवा झंडे के साथ ‘भारत माता’ के चित्र के इस्तेमाल के विरोध में यह कदम उठाया। शिवनकुट्टी ने कहा कि राजभवन राज्यपाल के परिवार की संपत्ति नहीं है और इसे आरएसएस केंद्र में नहीं बदला जा सकता है।
आर्लेकर ने सक्रिय राजनीति में कब रखा कदम?
वास्को द गामा के सेंट जोसेफ इंस्टीट्यूट और एमईएस कॉलेज के पूर्व छात्र और कॉमर्स ग्रेजुएट आर्लेकर ने 1989 में बीजेपी में शामिल होकर सक्रिय राजनीति में कदम रखा। 1990 के दशक की शुरुआत में जब गोवा की राजनीति पर कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व था, आर्लेकर – मनोहर पर्रिकर, श्रीपद ‘भाऊ’ नाइक और लक्ष्मीकांत पारसेकर जैसे नेताओं के साथ राज्य में बीजेपी के विकास में अहम भूमिका निभाई।
1999 में आर्लेकर ने वास्को द गामा से अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन यूनाइटेड गोअन्स डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार से हार गए। 2002 में, उन्होंने वास्को सीट से जीत हासिल की, लेकिन 2007 में फिर से हार गए। 2012 में, वे पेरनेम निर्वाचन क्षेत्र से विधायक चुने गए और 2015 तक गोवा विधानसभा के अध्यक्ष रहे।
उनके कार्यकाल के दौरान, गोवा देश की पहली विधानसभा बन गई जिसने विधायकों और कर्मचारियों के लिए अपनी कार्यवाही के लिए पेपरलैस सिस्टम को अपनाया। 2015 में आर्लेकर लक्ष्मीकांत पारसेकर के नेतृत्व वाली कैबिनेट में मंत्री बने और उन्हें वन, पर्यावरण और पंचायती राज मंत्रालयों का प्रभार सौंपा गया।
मुख्यमंत्री के दावेदारों में था आर्लेकर का नाम
जब 2014 के आखिर में केंद्र में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद मनोहर पर्रिकर को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया और उन्हें रक्षा मंत्री बनाया गया, तो गोवा में पर्रिकर की जगह पर पर मुख्यमंत्री बनने के लिए शीर्ष दावेदारों में आर्लेकर का नाम भी शामिल था।
टीवीके को अबतक कांग्रेस ने गठबंधन बनाने पर सहमति दी है, लेकिन उसके पास केवल पांच सीटें हैं। इस कारण उसे अन्य दलों के सहारे की जरूरत है। एक अन्य विधायक ने कहा, “हर कोई जानना चाहता है कि अंदर क्या हो रहा है। लेकिन हम बस बैठे-बैठे शपथ ग्रहण समारोह की सूचना का इंतजार कर रहे हैं।” पढ़ें पूरी खबर…
