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समाजवादी पार्टी के घमासान में किसे मिलेगी ‘साइकिल’, चुनाव आयोग इन तरीकों से कर सकता है फैसला

रविवार को सपा का एक राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ था, जिसमें मुलायम सिंह यादव को हटाकर अखिलेश यादव को समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित किया गया था।

समाजवादी पार्टी के अंदर चुनावी निशान ‘साइकिल’ को लेकर चल रहा घमासान किसी से छिपा नहीं है। एक तरफ जहां मुलायम सिंह यादव इस पर अपना दावा ठोंक रहे है तो वहीं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी साइकिल की ही सवारी करना चाहते हैं। रविवार को सपा का एक राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ था, जिसमें मुलायम सिंह यादव को हटाकर अखिलेश को समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित किया गया था। इसके अलावा अधिवेशन में तीन और अहम फैसले लिए गए। पहला था-शिवपाल यादव को यूपी प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटाना और दूसरा अमर सिंह को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाना। मुलायम को मार्गदर्शन बनाया गया था। इसके बाद मुलायम सिंह ने इस अधिवेशन को असंवैधानिक घोषित कर दिया और चुनावी निशान पर अपना दावा ठोंक दिया। इसी को लेकर वह सोमवार को चुनाव आयोग के दफ्तर भी गए थे। आपको बताते हैं कि जब एक ही पार्टी में दो खेमे बंट जाते हैं, तब चुनाव आयोग क्या कदम उठा सकता है।

चुनावी निशान के आदेश 1968 के पैरा 15 के मुताबिक, अगर चुनाव आयोग को विश्वास हो जाता है कि किसी पार्टी में दो खेमे बंट चुके हैं तो वह दोनों की बातें सुनकर अपना फैसला सुनाता है जो दोनों को मानना होता है। पंजीकृत लेकिन गैर मान्यता प्राप्त दलों में विभाजन के वक्त चुनाव आयोग उन्हें अपने आंतरिक मसले खुद सुलझाने या अदालत जाने की हिदायत देता है। समाजवादी पार्टी के मामले में चुनाव आयोग कम से कम 6 महीने का वक्त ले सकता है क्योंकि उनकी सुनवाई काफी लंबी चलती हैं। पैनल अंतरिम आदेश में पार्टी का चुनावी निशान फ्रीज कर दोनों खेमो को पार्टी के मूल नाम के जैसा ही कोई नाम दे सकता है। दोनों खेमो को अलग अलग चुनावी निशानों भी दिए जा सकते हैं।

1968 में चुनावी निशान के आदेश के पहले चुनावी पैनल चुनाव नियमों की आचार संहिता, 1961 के तहत एक नोटिफिकेशन जारी करता था। 1968 से पहले पार्टी टूटने का सबसे हाई प्रोफाइल मामला कम्युनिस्ट पार्टी का था, जो साल 1964 में हुआ था। अब तक चुनाव आयोग ने पार्टी टूटने के जितने मामले सुलझाए हैं, उनमें पार्टी के प्रतिनिधि, कार्यालय प्रभारी, सांसद और विधायकों ने किसी एक खेमे का समर्थन किया है। जब भी चुनाव आयोग विरोधी खेमे की मजबूती जानने में नाकाम रहा तो उसने बहुमत के परीक्षण को ही अपना लिया।

समाजवादी पार्टी विवाद: किसे मिलेगा ‘साइकिल’ का चिन्ह? जानिए चुनाव आयोग इन तरीकों से कर सकता है फैसला

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