पश्चिम बंगाल चुनाव में बीजेपी से करारी हार के एक महीने के अंदर ही तृणमूल कांग्रेस (TMC) में बगावत हो गई है। टीएमसी में हुई टूट ने ना केवल संगठनात्मक नेतृत्व को हिला दिया है बल्कि पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी के साथ अब कुछ ही नेता बचे हैं। इनमें से अधिकतर टीएमसी मुखिया के पुराने वफादार माने जाते हैं।

ममता बनर्जी के सत्ता गंवाने के बाद मंगलवार को पहली बार सड़क पर उतरने के दौरान उनके साथ केवल आठ विधायक मौजूद थे: नैना बंदोपाध्याय, फिरहाद हकीम, कुणाल घोष, बिमान बनर्जी, सोवनदेब चट्टोपाध्याय, मदन मित्रा, अशोक डे और असिमा पात्रा। इसके अलावा कुछ सांसद- डेरेक ओ’ब्रायन, कल्याण बनर्जी, डोला सेन, समीरुल इस्लाम, मेनका गुरुस्वामी और नदीमुल हक भी साथ दिखे। इन सभी सांसदों में कल्याण बनर्जी को छोड़कर बाकी सभी राज्यसभा सांसद हैं।

ममता के वफादार

ममता खेमे के कई नेता जैसे मदन मित्रा, हकीम, सोवनदेब और अशोक डे की बात करें तो ये 1998 में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना के समय से ही ममता के साथ जुड़े हुए हैं।

कमारहाटी से विधायक मदन मित्रा ने तृणमूल सरकारों में महत्वपूर्ण मंत्री पद संभाले हैं और पार्टी में साइडलाइन किए जाने के बावजूद वह पार्टी के साथ बने रहे हैं।

फिरहाद हकीम ने बुधवार को ममता बनर्जी की अनुमति से कोलकाता के मेयर पद से इस्तीफा देने का फैसला लिया, उन्हें कोलकाता पोर्ट सीट से फिर से विधानसभा के लिए चुना गया है। उन्होंने इससे पहले पश्चिम बंगाल कैबिनेट में शहरी विकास, नगर मामलों, आवास और परिवहन जैसे विभागों को संभाला है। हकीम को विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस (TMC) का चीफ व्हिप भी नियुक्त किया गया था लेकिन विद्रोही विधायकों ने इस फैसले का विरोध किया था।

वहीं सोवनदेब चट्टोपाध्याय TMC के एक वरिष्ठ नेता हैं और बंगाल में लगातार 10 विधानसभा चुनाव जीतने वाले एकमात्र विधायक होने का रिकॉर्ड रखते हैं। वे 1998 में पार्टी की स्थापना के समय से ही ममता बनर्जी के साथ जुड़े हुए हैं और 1998 के उपचुनाव में TMC के टिकट पर चुने जाने वाले पहले उम्मीदवार थे। उन्होंने कई सरकारों में कृषि, संसदीय कार्य, और ऊर्जा व गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोत जैसे विभागों को संभाला है।

दूसरी ओर अशोक कुमार देब सात बार के विधायक हैं और 1996 से बज बज सीट पर लगातार काबिज हैं।

टीएमसी में बगावत और टूट

टीएमसी (तृणमूल कांग्रेस) में विभाजन बुधवार को सार्वजनिक रूप से सामने आ गया। पार्टी के 80 में से 60 विधायकों ने विधानसभा में पार्टी नेतृत्व टीम के लिए ममता बनर्जी की पसंद का विरोध किया। इनमें विपक्ष के नेता (LoP) के रूप में सोवनदेव चट्टोपाध्याय की नियुक्ति भी शामिल थी। इन विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष रथीन्द्र बोस को एक प्रस्ताव सौंपते हुए कहा कि ‘निष्कासित’ विधायक रितब्रत बनर्जी उनकी पसंद के विपक्ष के नेता हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ममता बनर्जी अब भी उनकी नेता हैं।

विद्रोही विधायकों में से एक सिउली साहा ने कहा, “ममता को समझना चाहिए कि हम उनके साथ हैं। हम ही टीएमसी हैं लेकिन जिस तरीके से पहला प्रस्ताव (सोवनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता नामित करने वाला) बिना उचित चर्चा के स्पीकर को भेज दिया गया, वह गलत था। कोई भी पार्टी एक व्यक्ति की मनमर्जी से नहीं चल सकती। आप जानते हैं कि मैं किसके बारे में बात कर रही हूं।”

इस विभाजन पर ममता खेमे की ओर से भी प्रतिक्रिया आई। कुणाल घोष ने कहा कि बागी विधायकों को अपनी आपत्तियां पार्टी के भीतर उठानी चाहिए थीं। उन्होंने कहा, “उनमें से कई विधायक (जिन्होंने नया प्रस्ताव सौंपा) उसी समय हस्ताक्षर कर चुके थे, जब पार्टी ने सोवनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता चुना था।”

अभिषेक बनर्जी के प्रति असंतोष

ममता बनर्जी के करीबी माने जाने वाले लोकसभा के एक वरिष्ठ सांसद ने कहा कि विद्रोही विधायकों की यह कार्रवाई ना केवल टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के प्रति असंतोष को दिखाती है बल्कि यह ममता बनर्जी के खिलाफ भी खुली अवज्ञा का संकेत है।

उन्होंने कहा,”इन घटनाक्रमों से साबित होता है कि अधिकतर विधायक अब उनके नियंत्रण में नहीं हैं।”

टीएमसी सूत्रों के अनुसार, आने वाले दिनों में विद्रोही खेमे में विधायकों की संख्या और बढ़ सकती है। इसके साथ ही, पार्टी की संसदीय इकाई (पार्लियामेंटरी पार्टी) में भी इसी तरह के विभाजन की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता।

एक सूत्र ने कहा, “बारासात की सांसद काकोली घोष दस्तिदार पहले ही पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे चुकी हैं। उन्होंने टीएमसी नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं।”

इस तरह विधानसभा में शुरू हुआ असंतोष अब पार्टी के संसदीय स्तर तक फैलने की संभावना दिखा रहा है जिससे तृणमूल कांग्रेस के भीतर आंतरिक संकट और गहरा सकता है।

टीएमसी में टूट से बीजेपी को फायदा?

टीएमसी में टूट पर वरिष्ठ बीजेपी नेता ने कहा, “पश्चिम बंगाल में बीजेपी को समर्थन की जरूरत नहीं है। हमारी प्राथमिकता सांसद पाना है। एक बार जब टीएमसी टूट जाएगी, तो उसके सांसद एक अलग ग्रुप बना सकते हैं और बीजेपी को हमारे बड़े कानून के लिए जरूरी संख्या बल के लिए उनके समर्थन से फ़ायदा हो सकता है।”