भारतीय न्यायपालिका और राजनीति के इतिहास में 12 जून 1975 की तारीख एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज है जिसने देश की दिशा और दशा को हमेशा के लिए बदल दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट का ‘कोर्ट रूम नंबर 24’ उस ऐतिहासिक घटना का गवाह बना जहां एक सिटिंग प्रधानमंत्री के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया गया। यह फैसला देने वाले व्यक्ति थे जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा। इलाहाबाद हाईकोर्ट का ‘कोर्ट रूम नंबर 24’ भारतीय न्यायिक इतिहास में सिर्फ एक कमरा नहीं है बल्कि यह वह जगह है जहा भारत के लोकतंत्र, सत्ता और संविधान के बीच टकराव ने एक नया अध्याय लिखा।

इस फैसले के बाद उपजे राजनीतिक संकट के कारण देश में 25 जून 1975 को आपातकाल (Emergency) की घोषणा की गई। आज जनसत्ता की स्पेशल ‘कोर्टरूम फाइल्स’ सीरीज में हम कोर्ट रूम नंबर 24 के उस ऐतिहासिक मुकदमे, उसके कानूनी पहलुओं, सरकारी एजेंसियों के दबाव और जस्टिस सिन्हा के कड़े संघर्ष के किस्से के बारे में बात करेंगे।

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‘स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश बनाम राज नारायण’ मामला

याचिकाकर्ता थे समाजवादी नेता राज नारायण जिन्होंने 1971 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली सीट से इंदिरा गांधी के खिलाफ हार के बाद अदालत का रुख किया था। 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी ने उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट से भारी बहुमत से जीत हासिल की थी। उनके खिलाफ संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राज नारायण चुनाव लड़ रहे थे जिन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा। राज नारायण ने इस हार को चुपचाप स्वीकार नहीं किया। उन्होंने प्रसिद्ध वकील शांति भूषण के जरिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक चुनाव याचिका (Election Petition) दायर की।

याचिका में लगाए गए मुख्य आरोप

राज नारायण की याचिका में इंदिरा गांधी पर जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951) के तहत ‘भ्रष्ट चुनावी आचरण’ (Corrupt Electoral Practices) के कई आरोप लगाए गए थे:

  • – चुनाव प्रचार में सरकारी मशीनरी और सरकारी अधिकारियों का दुरुपयोग।

-तय सीमा से ज्यादा पैसा खर्च करना।

-मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए सरकारी वाहनों और सुरक्षा बलों का इस्तेमाल।

अपने तत्कालीन चुनावी एजेंट यशपाल कपूर (जो कि एक सरकारी गजटेड अधिकारी थे) की सेवाओं का उनके इस्तीफे के आधिकारिक रूप से स्वीकृत होने से पहले ही चुनाव प्रचार में उपयोग करना।

कोर्ट रूम नंबर 24 का माहौल और ऐतिहासिक जिरह

12 जून 1975 की सुबह, कोर्ट रूम नंबर 24 खचाखच भरा हुआ था। भीड़ में वकील, पत्रकार, राजनीतिक कार्यकर्ता और आम लोग शामिल थे। सामने थी एक ऐतिहासिक सुनवाई जिसमें देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को चुनौती दी गई थी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का कोर्ट रूम नंबर 24 इस ऐतिहासिक मुकदमे का केंद्र था। इस मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत के इतिहास में यह पहली बार था जब किसी सिटिंग प्रधानमंत्री को खुद अदालत में आकर गवाही देनी पड़ी थी। यह दृश्य भारतीय लोकतंत्र के लिए अभूतपूर्व था।

इस केस की सुनवाई कर रहे थे न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा। उनके सामने सवाल बेहद गंभीर था- क्या भारत के प्रधानमंत्री का चुनाव कानून के दायरे में अवैध घोषित किया जा सकता है? सुनवाई महीनों चली। गवाह पेश हुए। दस्तावेज़ों की जांच हुई।

कोर्टरूम नंबर 24 का दिन: 12 जून 1975

जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी 18 मार्च 1975 को कोर्ट रूम नंबर 24 में गवाही देने पहुंचीं तो जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने पहले ही वकीलों और दर्शकों को सख्त हिदायत दे दी थी कि प्रधानमंत्री के प्रवेश पर कोई भी सम्मान में खड़ा नहीं होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि अदालत में केवल ‘कानून’ सर्वोच्च है, कोई पद नहीं। इंदिरा गांधी से कोर्ट में लगभग पांच घंटे तक जिरह की गई।

सुबह लगभग 10 बजे कोर्ट की कार्यवाही शुरू हुई। भीड़ शांत थी। वातावरण तनावपूर्ण था और फिर आया वह ऐतिहासिक क्षण जब फैसला पढ़ा गया।

जस्टिस सिन्हा ने कहा कि इंदिरा गांधी के चुनाव में दो प्रमुख भ्रष्ट आचरण सिद्ध हुए:

सरकारी अधिकारी का दुरुपयोग (Section 123(7)): कोर्ट ने माना कि इंदिरा गांधी के अतिरिक्त सचिव और गजटेड अधिकारी यशपाल कपूर ने आधिकारिक रूप से इस्तीफा मंजूर होने से पहले ही रायबरेली में इंदिरा गांधी के लिए चुनावी काम शुरू कर दिया था।

उत्तर प्रदेश सरकार की मदद: चुनाव प्रचार के दौरान मंच (Dais) बनाने, लाउडस्पीकर लगाने और बिजली की व्यवस्था के लिए उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों और जिला मजिस्ट्रेट की मदद ली गई थी जो कानूनन भ्रष्ट आचरण के दायरे में आता था।

प्रधानमंत्री दोषी और 6 साल का प्रतिबंध

इन दोनों आधारों पर जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने अपना 258 पन्नों का ऐतिहासिक फैसला सुनाया। उन्होंने राज नारायण द्वारा लगाए गए कई गंभीर आरोपों (जैसे कि वोटरों को रिश्वत देना या भारी खर्च करना) को खारिज कर दिया लेकिन दो तकनीकी मगर बेहद महत्वपूर्ण बिंदुओं पर इंदिरा गांधी को दोषी पाया:

-इंदिरा गांधी का 1971 का रायबरेली से चुनाव अवैध (Null and Void) घोषित किया गया।

-उन्हें जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत अगले 6 वर्षों तक किसी भी निर्वाचित पद पर रहने या चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया गया।

-हालांकि अपील दायर करने के लिए फैसले पर 20 दिनों का अंतरिम स्टे (Stay) दिया गया।

खुफिया एजेंसियों का जाल और जस्टिस सिन्हा का एकांतवास

इस फैसले को रोकने और जस्टिस सिन्हा पर दबाव बनाने के लिए तत्कालीन सरकारी तंत्र और खुफिया एजेंसियों ने हर संभव कोशिश की थी। समकालीन इतिहासकारों और खुद शांति भूषण की किताबों के अनुसार, फैसले से कुछ हफ्ते पहले जस्टिस सिन्हा की जासूसी शुरू हो गई थी।

एजेंसियों से छिपने की रणनीति:
फोन टैपिंग और निगरानी: जस्टिस सिन्हा को आभास हो गया था कि उनके फोन टैप किए जा रहे हैं और सीआईडी (CID) व अन्य खुफिया एजेंसियां उनके घर के चक्कर काट रही हैं।

गोपनीयता बनाए रखना: फैसले को लीक होने से बचाने के लिए जस्टिस सिन्हा ने अपने स्टेनोग्राफर को बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट जाने को कहा था। उन्होंने फैसले का ऑपरेटिव हिस्सा खुद अपने हाथों से लिखा ताकि टाइपिस्ट या किसी क्लर्क के जरिए यह सरकार तक न पहुंचे।

अंतिम दिनों में गायब होना: फैसला सुनाने से ठीक पहले के दिनों में जस्टिस सिन्हा पूरी तरह से ‘अंडरग्राउंड’ हो गए थे। वे सरकारी एजेंसियों की नजरों से बचने के लिए अपने करीबियों के यहां छिपे रहे और सीधे 12 जून की सुबह कोर्ट रूम नंबर 24 में अवतरित हुए।

39वां संविधान संशोधन: कानून बदलने की कोशिश

फैसले के तुरंत बाद केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया। 39वे संविधान संशोधन (1975) के जरिए कानून बदलने की कोशिश हुई। इसका उद्देश्य था- प्रधानमंत्री के चुनाव को न्यायिक समीक्षा से बाहर करना, अदालतों की शक्ति को सीमित करना और विशेष कानून बनाकर इंदिरा गांधी के चुनाव को वैध घोषित करना। लेकिन यह कदम आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती का विषय बना।

फैसले से आपातकाल तक का सफर: क्रोनोलॉजी

इस फैसले ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया। भारत के इतिहास में पहली बार था जब किसी मौजूदा प्रधानमंत्री का चुनाव रद्द किया गया, प्रधानमंत्री को अदालत ने अयोग्य घोषित किया। सत्ता सीधे न्यायपालिका के निर्णय से प्रभावित हुई। यह फैसला सिर्फ कानूनी नहीं था बल्कि यह राजनीतिक विस्फोट था।

आप इस टाइमलाइन से समझ सकते हैं कि कैसे कोर्ट रूम नंबर 24 का यह फैसला देश में आपातकाल लगाने का तात्कालिक कारण बना।

हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
12 जून 1975
जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द किया और 6 साल का प्रतिबंध लगाया। इसी दिन शाम को गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार की खबर भी आई।

सुप्रीम कोर्ट में अपील
23 जून 1975
इंदिरा गांधी की तरफ से विख्यात वकील नानी पालकीवाला ने सुप्रीम कोर्ट में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ पूर्ण स्थगन (Absolute Stay) की मांग की।

सुप्रीम कोर्ट का सशर्त स्थगन (Conditional Stay)
24 जून 1975
सुप्रीम कोर्ट के वेकेशन जज जस्टिस वी. आर. कृष्ण अय्यर ने पूर्ण स्टे देने से इनकार कर दिया। उन्होंने सशर्त स्टे दिया जिसके तहत इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री पद पर बनी रह सकती थीं लेकिन वे संसद की कार्यवाही में भाग तो ले सकती थीं पर वोट नहीं दे सकती थीं और न ही एक सांसद के रूप में वेतन पा सकती थीं।

विपक्ष का देशव्यापी आंदोलन
25 जून 1975
जयप्रकाश नारायण (JP) ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक विशाल रैली की और इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग करते हुए राष्ट्रव्यापी सविनय अवज्ञा आंदोलन का आह्वान किया। उन्होंने सेना और पुलिस से भी असंवैधानिक आदेशों को न मानने की अपील की।

आपातकाल (Emergency) की घोषणा
25-26 जून 1975 (मध्यरात्रि)
सशर्त स्टे और विपक्ष के बढ़ते दबाव के कारण खुद को घिरता देख, इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आंतरिक अशांति के आधार पर अनुच्छेद 352 के तहत देश में आपातकाल लगाने की सिफारिश की। रातों-रात विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया और प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी गई।

फैसले के कानूनी और राजनीतिक निहितार्थ
कानूनी दृष्टिकोण से देखा जाए तो जस्टिस सिन्हा का फैसला तकनीकी रूप से बिल्कुल सही था लेकिन राजनीतिक रूप से इसके परिणाम अत्यंत गंभीर और अप्रत्याशित रहे।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता का शिखर
यह फैसला इस बात का प्रमाण था कि भारतीय न्यायपालिका बिना किसी डर या पक्षपात के सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठे व्यक्ति को भी कानून के कटघरे में खड़ा कर सकती है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमना ने भी अपने एक व्याख्यान में जस्टिस सिन्हा के इस फैसले को ‘असाधारण साहस का प्रतीक’ बताया था।

संविधान में संशोधन
आपातकाल लागू होने के बाद इंदिरा गांधी सरकार ने इस फैसले के प्रभाव को खत्म करने के लिए 39वां संविधान संशोधन (39th Constitutional Amendment) पारित किया। इसके तहत यह प्रावधान जोड़ा गया कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।

‘बेसिक स्ट्रक्चर’ का उल्लंघन

बाद में जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा (इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण, 1975) तो सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को तो वैध मान लिया (क्योंकि चुनाव कानूनों को पूर्वव्यापी प्रभाव/Retrospective effect से बदल दिया गया था) लेकिन 39वें संविधान संशोधन की उस धारा को असंवैधानिक घोषित कर दिया जो न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) को रोकती थी। कोर्ट ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव तथा न्यायिक समीक्षा संविधान के ‘मूल ढांचे’ (Basic Structure) का हिस्सा हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के कोर्ट रूम नंबर 24 से निकला वह फैसला केवल एक चुनावी विवाद का अंत नहीं था बल्कि उसने भारतीय लोकतंत्र की सबसे अग्निपरीक्षा यानी ‘इमरजेंसी’ के द्वार खोल दिए। जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने सरकारी एजेंसियों के दबाव, जासूसी और ट्रांसफर के खतरों के बावजूद जिस निर्भीकता से कानून की सर्वोच्चता को स्थापित किया, वह आज भी भारतीय न्यायिक इतिहास में एक मार्गदर्शक की तरह चमक रहा है। यह घटना याद दिलाती है कि लोकतंत्र में कोई भी पद, चाहे वह देश के प्रधानमंत्री का ही क्यों ना हो लेकि देश के संविधान और कानून से बड़ा नहीं हो सकता।