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कब कब Congress की आंखों की किरकिरी बने प्रणब मुखर्जी?

साल 2017 में राष्ट्रपति के पद से हटने के बाद एक बार फिर वे कांग्रेसियों की आलोचना का शिकार हुए थे। वे साल 2018 में आरएसएस के एक कार्यक्रम में शरीक होने के लिए पहुँच गये थे। आरएसएस और कांग्रेस का पुराना वैचारिक मतभेद रहा है।

Pranab Mukherjee, Congress, INC, प्रणब मुखर्जीपूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी। (फाइल फोटो)

पूर्व राष्ट्रपति और भारतरत्न प्रणब मुखर्जी का सोमवार को निधन हो गया। उनके देहांत पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत कई राजनेताओं ने शोक व्यक्त किया। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने शोक सन्देश में एक पुरानी फोटो भी साझा की है, जिसमें वे पूर्व राष्ट्रपति के पैर छूकर आशीर्वाद भी लेते हुए दिखाई दे रहे थे। प्रणब दा 2012 से 17 तक भारत के राष्ट्रपति रहे। इसके पहले वे कांग्रेस इस सरकार में वरिष्ठ मंत्री थे। पार्टी के लिए उनके योगदान को देखते हुए पार्टी ने उन्हें इस पद की उम्मीदवारी के लिए चुना था। लेकिन प्रणब दा के जीवन में राष्ट्रपति बनने के पहले और बाद में कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं. जिन्हें तबके कांग्रेसियों ने खासा पसंद नहीं किया था।

बात 1984 की है जब राजीव गांधी प्रणब मुखर्जी के साथ पश्चिम बंगाल के कांथी में एक बड़ी जनसभा को संबोधित कर रहे थे तभी अचानक उन्हें इंदिरा गांधी की हत्या की खबर मिली। वह आनन-फानन में हवाई जहाज पर बैठ कर के दिल्ली वापस आने लगे। यहां भी उनके साथ में प्रणब मुखर्जी मौजूद थे। उन्होंने प्रणव दा से ऐसी स्तिथि में देश में अगले प्रधानमंत्री की नियुक्ति में परंपरा संबंधी सवाल पूछा। उन्होंने गुलजारी लाल नंदा को ध्यान में रखते उन्हें यही राय दी कि ऐसी स्थिति आने पर किसी वरिष्ठ मंत्री को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला देनी चाहिए। प्रणब दा के मन में कहीं न कहीं प्रधानमंत्री बनने की दबी-छिपी इच्छा थी। हालांकि राजीव गांधी के विश्वास पात्रों के वजह से तब यह इच्छा मुकम्मल नहीं हो पाई। जिनमे उनके रिश्ते में भाई लगने वाले अरुण नेहरू प्रमुख थे।

यहाँ के बाद से राजीव गाँधी ने प्रणब मुखर्जी पर वक्र दृष्टि डाल दी जो उनके जीते जी तक रही। नयी सरकार में प्रणब दा कोई कोई मंत्री पद नहीं मिला। जबकि वे पूर्ववर्ती इंदिरा सरकार में वित्त मंत्री थे। उन्होंने अपने काम से दुनिया भर में लोहा मनवाया था। न्यूयॉर्क से प्रकाशित एक पत्रिका, यूरोमनी के एक सर्वेक्षण के अनुसार, वर्ष 1984 में दुनिया के पाँच सर्वोत्तम वित्त मन्त्रियों में से एक प्रणव मुखर्जी भी थे। इसके बाद राजीव ने उन्हें एक के बाद एक झटके देना चालू कर दिए। उन्हें साल भर के बाद तक भी कोई मंत्री पद नहीं दिया। कुछ समय के लिए उन्हें पश्चिम बंगाल कांग्रेस का अध्यक्ष भी बनाया। लेकिन यहाँ भी उन्हें जल्द ही हटा कर के उनके धुर विरोधी प्रिय रंजन दास मुंशी को अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। इसके बाद उन्हें कांग्रेस कार्यसमिति और संसदीय बोर्ड से भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

इन हालातों के बाद भी प्रणब दा ने अब तक कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया था। लेकिन एक दिन इलसट्रेटिव वीकली के लिए वरिष्ठ पत्रकार प्रीतिश नंदी को दे रहे साक्षात्कार में उन्होंने राजीव गाँधी की खुल के मुखालफत कर दी। नंदी ने उनसे पूछ दिया कि इंदिरा और राजीव में तुलनात्मक रूप से बेहतर कौन है? इस सवाल के जवाब में उन्होंने इंदिरा गाँधी को बेहतर बताया। इसके बाद राजीव के सब्र का बाँध टूट गया। परिणामस्वरूप प्रणब मुखर्जी को अचानक पार्टी से निष्कासित कर दिया गया।

इसके बाद प्रणब दा ने अपनी खुद की राजनीतिक जमीन बनानी शुरू कर दी। उन्होंने राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस नाम की एक नयी पार्टी बनाई। इसमें कांग्रेस के बहुत सारे असंतुष्ट नेता अलग अलग प्रदेशों से जुड़े। लेकिन मार्च 1987 में बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी ने बहुत खराब प्रदर्शन किया। वे एक भी सीट नहीं जीत सके।

1991 में राजीव गाँधी की हत्या के बाद जब नरसिम्हा राव जब देश के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने कुछ दिन बाद प्रणब दा का निष्कासन वापस ले लिया और उन्हें योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया। इसके बाद से उन्होंने 2012 तक गाँधी परिवार की नज़रों में एक अच्छे विश्वासपात्र के रूप में जगह बनाये राखी जिसका नतीजा 2012 में संप्रग के राष्ट्रपति के उम्मीदवार के रूप में उनका नाम था।

साल 2017 में राष्ट्रपति के पद से हटने के बाद एक बार फिर वे कांग्रेसियों की आलोचना का शिकार हुए थे। वे साल 2018 में आरएसएस के एक कार्यक्रम में शरीक होने के लिए पहुँच गये थे। आरएसएस और कांग्रेस का पुराना वैचारिक मतभेद रहा है। इस घटना पर उनकी बेटी और कांग्रेस नेत्री शर्मिष्ठा मुखर्जी ने तीखी आलोचना करते हुए लिखा था कि आपका भाषण भुला दिया जाएगा, सिर्फ तस्वीरें बची रहेंगी। उस समय प्रणब दा ने अपने निर्णय का बचाव करते हुए कहा था कि मेरा वैचारिक छुआछूत में विश्वास नहीं है।

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