भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक देश है। देश हर साल लगभग 10.7 करोड़ टन गेहूं पैदा करता है और वैश्विक उत्पादन (Global Production) में उसकी हिस्सेदारी करीब 14 प्रतिशत है। लेकिन जलवायु परिवर्तन (Climate Change) अब इस फसल के लिए धीरे-धीरे एक बड़े संकट का रूप लेता जा रहा है।
जलवायु परिवर्तन से जुड़ी स्टडी करने वाले संगठन Climate Trends की नई रिसर्च बताती है कि भारत के प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों- पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात में मौसम का पारंपरिक चक्र तेजी से बदल रहा है। सर्दियां छोटी हो रही हैं, रातें गर्म हो रही हैं, फरवरी और मार्च में तापमान तेजी से बढ़ रहा है और कटाई के समय बेमौसम बारिश किसानों की मेहनत पर पानी फेर रही है। इसके कारण फसल की वृद्धि, दाने बनने की प्रक्रिया और कुल उत्पादन पर नकारात्मक असर पड़ रहा है जिससे पैदावार में गिरावट देखी जा रही है। यह सिर्फ खेती का संकट नहीं बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा से जुड़ा सवाल बनता जा रहा है।
गेहूं की ग्रोथ क्यों धीमी पड़ रही है?
भारत के प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि उत्पादन वृद्धि की रफ्तार पहले जैसी नहीं रही।
सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा हरियाणा का है। 1986-95 के दौरान राज्य में गेहूं उत्पादन की दशकवार वृद्धि दर 30 प्रतिशत थी। लेकिन 2015-25 के दौरान यह घटकर -2.6 प्रतिशत तक पहुंच गई। पंजाब में भी इसी तरह का रुझान देखने को मिला।
यह सिर्फ कृषि उत्पादन का आंकड़ा नहीं है। यह संकेत है कि जिस इलाके ने हरित क्रांति को जन्म दिया और अब वहीं जलवायु परिवर्तन की मार सबसे अधिक महसूस की जा रही है।
सबसे बड़ा खतरा: रात की बढ़ती गर्मी
जब भी ग्लोबल वार्मिंग की बात होती है तो आमतौर पर लोगों का ध्यान दिन के तापमान पर जाता है। लेकिन ‘Wheat Under Stress: Climate Change, Rising Heat, and Adaptation Pathways in India’s Major Wheat-Growing States’ रिपोर्ट बताती है कि गेहूं के लिए असली खतरा रात के बढ़ते तापमान से पैदा हो रहा है।
इस स्टडी में पाया गया कि देश के सभी प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में न्यूनतम तापमान (रात का तापमान) अधिकतम तापमान की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। गुजरात में तो रात का तापमान दिन के मुकाबले लगभग तीन गुना तेज गति से बढ़ रहा है। उत्तर प्रदेश और हरियाणा में भी न्यूनतम तापमान में सबसे तेज वृद्धि दर्ज की गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार गर्म रातों में पौधों की श्वसन प्रक्रिया (Respiration) बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप पौधे अपने कार्बोहाइड्रेट भंडार को दानों के विकास में लगाने के बजाय ऊर्जा खर्च करने में लगा देते हैं। लेकिन जब रातें गर्म हो जाती हैं तो पौधा अधिक श्वसन करता है और अपनी ऊर्जा खर्च कर देता है। नतीजा यह होता है कि दाने पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते, उनका वजन घट जाता है और गुणवत्ता प्रभावित होती है।
तापमान में कैसे-कैसे आया बदलाव
| अवधि | प्रमुख बदलाव |
| 1990s | सामान्य सर्दियां, स्थिर गेहूं उत्पादन |
| 2000s | सर्दियां छोटी होने लगीं |
| 2010-2025 | फरवरी सबसे तेजी से गर्म होने वाला महीना (+0.69°C प्रति दशक) |
| 2010-2025 | मार्च (+0.58°C) और अप्रैल (+0.66°C) में भी तेज गर्मी |
| वर्तमान | गर्म रातें, बेमौसम बारिश, सिकुड़ते दाने, घटती गुणवत्ता |
पंजाब-हरियाणा में संकट सबसे ज्यादा
हरित क्रांति के केंद्र रहे पंजाब और हरियाणा आज सबसे तेज गर्म हो रहे राज्यों में शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार 1986-95 के दौरान हरियाणा में गेहूं उत्पादन की दशकवार वृद्धि दर करीब 30 प्रतिशत थी। लेकिन 2015-25 के बीच यह गिरकर माइनस 2.6 प्रतिशत तक पहुंच गई। पंजाब में भी इसी तरह की गिरावट दर्ज की गई है।
यह आंकड़ा बताता है कि केवल तकनीक और सिंचाई के सहारे उत्पादन बढ़ाने का मॉडल अब जलवायु दबाव के सामने कमजोर पड़ रहा है। सर्दियां छोटी हो रही हैं जिससे गेहूं का प्राकृतिक चक्र टूट रहा है।
गेहूं एक ऐसी फसल है जिसे ठंडी सर्दियों की जरूरत होती है। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि अब सर्दियों की अवधि लगातार घट रही है। अध्ययन के मुताबिक फरवरी सबसे तेजी से गर्म होने वाला महीना बन गया है जहां तापमान में प्रति दशक 0.69 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई। मार्च और अप्रैल भी तेजी से गर्म हो रहे हैं। इसका असर सीधे फसल के महत्वपूर्ण चरणों पर पड़ता है।
यही वह समय होता है जब गेहूं में फूल आते हैं और दाने भरने की प्रक्रिया चलती है। तापमान बढ़ने से यह अवधि छोटी हो जाती है और पौधा समय से पहले पक जाता है। किसानों की भाषा में कहें तो फसल ‘जल’ जाती है। नतीजा यह होता है कि उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होते हैं।
-बीजों का अंकुरण प्रभावित होता है
-टिलरिंग (शाखाओं का विकास) कम होता है
-पौधा जल्दी परिपक्व हो जाता है
-दाने भरने का समय घट जाता है
नतीजा यह होता है कि उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होते हैं।
रिपोर्ट में उपलब्ध डेटा के आधार पर 1986-95 से 2015-25 तक गेहूं उत्पादन की गिरती रफ्तार:
गेहूं उत्पादन की बदलती तस्वीर: 1986-95 से 2015-25
| अवधि | हरियाणा में गेहूं उत्पादन की दशकवार वृद्धि दर |
| 1986-95 | 30% |
| 1995-2005 | गिरावट की शुरुआत |
| 2005-2015 | वृद्धि दर और धीमी हुई |
| 2015-2025 | -2.6% |
1986-95: हरित क्रांति का असर, सिंचाई और उन्नत बीजों से उत्पादन तेजी से बढ़ा।
1995-2005: उत्पादन बढ़ा, लेकिन रफ्तार कम होने लगी।
2005-2015: तापमान वृद्धि, भूजल संकट और मिट्टी की सेहत पर असर दिखना शुरू हुआ।
2015-2025: पहली बार वृद्धि दर नकारात्मक (-2.6%) हो गई, यानी उत्पादन बढ़ने के बजाय ठहराव या गिरावट की स्थिति बनने लगी।
फरवरी की गर्मी और मार्च की बारिश: गेहूं पर डबल अटैक
जलवायु परिवर्तन का असर सिर्फ तापमान तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट बताती है कि पश्चिमी विक्षोभ अब पहले की तुलना में देर से आ रहे हैं और मार्च-अप्रैल में अधिक बारिश ला रहे हैं। यही समय फसल की परिपक्वता और कटाई का होता है।
इससे कई समस्याएं पैदा होती हैं, जिनमें मुख्य है:
-खड़ी फसल गिर जाती है
-दानों का रंग बदल जाता है
-फंगल संक्रमण बढ़ता है
-नमी बढ़ने से गुणवत्ता घटती है
-भंडारण के दौरान नुकसान बढ़ता है
विशेषज्ञों का कहना है कि अब तापमान वृद्धि और बेमौसम बारिश मिलकर गेहूं पर संयुक्त हमला कर रहे हैं।

खेत से गोदाम तक बढ़ रहा नुकसान
जलवायु संकट सिर्फ खेत तक सीमित नहीं है। गुजरात के किसानों ने बताया कि पहले गेहूं को दो से तीन साल तक सुरक्षित रखा जा सकता था। लेकिन अब बढ़ती नमी और कीट हमलों के कारण छह महीने के भीतर ही खराब होने का खतरा बढ़ गया है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तापमान और आर्द्रता में बदलाव ने कीट और बीमारियों के चक्र को बदल दिया है जिससे भंडारण लागत और जोखिम दोनों बढ़ गए हैं।
छोटे किसानों पर सबसे ज्यादा मार
जलवायु परिवर्तन का असर सभी किसानों पर समान नहीं है। छोटे और सीमांत किसान सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं क्योंकि उनके पास:
-निजी सिंचाई की सुविधा नहीं है
-सीमित पूंजी है
-किराये की जमीन पर खेती करते हैं
-मौसम के झटकों को झेलने की क्षमता कम है
गुजरात में कई इलाकों में भूजल 100 फीट की जगह 800-1000 फीट गहराई पर पहुंच गया है जिससे सिंचाई की लागत तेजी से बढ़ी है। किराये के बोरवेल और पानी पर निर्भर किसानों की लागत लगातार बढ़ रही है। अगर फसल खराब होती है तो बड़े किसान नुकसान झेल सकते हैं लेकिन छोटे किसान कर्ज और आर्थिक संकट में फंस जाते हैं।
रिपोर्ट में शामिल किसानों ने बताया कि कई परिवार खेती छोड़ने तक का विचार कर रहे हैं क्योंकि मौसम की अनिश्चितता लगातार बढ़ रही है।
क्या भारत की खाद्य सुरक्षा खतरे में है?
भारत की खाद्य सुरक्षा काफी हद तक गेहूं और चावल पर आधारित है। 2022 में भीषण गर्मी के कारण गेहूं उत्पादन प्रभावित हुआ था और सरकार को गेहूं निर्यात पर रोक लगानी पड़ी थी।
अगर मौजूदा रुझान जारी रहे तो आने वाले सालों में उत्पादन वृद्धि धीमी होने के साथ ही गुणवत्ता में गिरावट आ सकती है। इसके अलावा, सरकारी खरीद प्रभावित होने से खाद्य महंगाई बढ़ सकती है और किसानों की आय पर दबाव बढ़ सकता है।

समाधान क्या हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल उत्पादन बढ़ाने की रणनीति अब पर्याप्त नहीं होगी। कई समाधान सुझाए गए हैं:
-हीट टॉलरेंट किस्मों का उपयोग
-बुवाई की तारीख में बदलाव
-जल प्रबंधन में सुधार
-मौसम आधारित सलाह
-पैरामीट्रिक इंश्योरेंस
-मल्चिंग और प्राकृतिक खेती
-मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाना
-फसल विविधीकरण
क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला के अनुसार, ”जलवायु परिवर्तन अब भारतीय कृषि के लिए भविष्य का खतरा नहीं रह गया है बल्कि यह पहले से ही हमारी खाद्य प्रणाली और ग्रामीण आजीविका को प्रभावित कर रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों में किसान गेहूं और अन्य फसलों की गुणवत्ता में गिरावट, बार-बार फसल खराब होने और खेती की लागत बढ़ने जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। ऐसे में केवल छोटे-मोटे या अस्थायी उपाय अब पर्याप्त नहीं हैं।”
उन्होंने कहा कि जलवायु-स्मार्ट कृषि (Climate-Smart Agriculture), समय रहते चेतावनी देने वाली प्रणालियां (Early Warning Systems) और पैरामीट्रिक बीमा (Parametric Insurance) जैसी व्यवस्थाएं खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका की रक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो गई हैं। सरकारों, वैज्ञानिक संस्थानों, नागरिक समाज संगठनों और स्थानीय समुदायों को साथ लेकर किए जाने वाले समग्र प्रयास किसानों की जलवायु अनुकूलन क्षमता को मजबूत कर सकते हैं। इससे वित्तीय सुरक्षा बढ़ेगी और किसानों को जरूरी जानकारी, तकनीक तथा संसाधनों तक बेहतर पहुंच मिल सकेगी।
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर (डॉ.) सुरेंद्र कुमार ढाका के अनुसार, “पिछले कुछ दशकों में जलवायु के पैटर्न में स्पष्ट बदलाव देखने को मिल रहा है जिसका सीधा असर गेहूं की उत्पादकता पर पड़ रहा है। सर्दियां पहले की तुलना में अधिक गर्म और छोटी होती जा रही हैं जिससे फसल का प्राकृतिक विकास चक्र प्रभावित हो रहा है।”
उन्होंने कहा, “इसके साथ ही कटाई के दौरान बेमौसम बारिश की घटनाएं भी बढ़ रही हैं जो अक्सर पश्चिमी विक्षोभ के देर से आने और अधिक तीव्र होने से जुड़ी होती हैं। इस असमय बारिश से हवा में नमी बढ़ जाती है, खड़ी फसल को नुकसान पहुंचता है और दानों की गुणवत्ता पर असर पड़ता है। इससे दानों का रंग बदल जाता है और फंगल संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। वर्तमान में हम एक संयुक्त प्रभाव (Compounding Effect) देख रहे हैं। एक तरफ गर्म होती सर्दियां फसल की वृद्धि प्रक्रिया को तेज कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर बेमौसम बारिश गलत समय पर अतिरिक्त नमी पैदा कर रही है। बढ़ी हुई आर्द्रता (Humidity) खेतों के साथ-साथ भंडारण के दौरान भी नुकसान को बढ़ा रही है। इन सभी कारकों का संयुक्त असर गेहूं की गुणवत्ता और किसानों की आय पर पड़ रहा है। यह स्थिति बताती है कि अब बेहतर फसल-उपरांत प्रबंधन (Post-Harvest Management) और जलवायु-अनुकूल कृषि रणनीतियों (Climate-Resilient Strategies) को अपनाना बेहद जरूरी हो गया है।”
भारत में गेहूं संकट: खाद्य सुरक्षा की सबसे बड़ी परीक्षा
विशेषज्ञों का मानना है कि अब केवल उत्पादन बढ़ाने पर केंद्रित कृषि मॉडल पर्याप्त नहीं होगा। बदलती जलवायु की चुनौतियों को देखते हुए भारत को ऐसी कृषि व्यवस्था की ओर बढ़ना होगा जो मौसम के झटकों को सहन कर सके और किसानों को लंबे समय तक सुरक्षित रख सके। इसके लिए जलवायु-लचीली (Climate Resilient) खेती, हीट-टॉलरेंट बीज, बेहतर जल प्रबंधन, मौसम आधारित सलाह और प्रभावी बीमा व्यवस्था को कृषि नीति का अहम हिस्सा बनाना होगा।
भारत में गेहूं पर मंडरा रहा संकट सिर्फ बढ़ते तापमान की कहानी नहीं है। यह गर्म होती रातों, छोटी पड़ती सर्दियों, बेमौसम बारिश, बढ़ती आर्द्रता, घटते भूजल और मौसम की बढ़ती अनिश्चितता का मिला-जुला असर है। यही कारण है कि गेहूं की फसल अब खेत से लेकर भंडारण तक कई स्तरों पर दबाव झेल रही है।
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक देश है और करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा इस फसल पर निर्भर करती है। ऐसे में यदि जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो इसका प्रभाव केवल किसानों की आय तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले वर्षों में यह देश की खाद्य सुरक्षा, अनाज की कीमतों और आम लोगों की थाली तक महसूस किया जा सकता है। गेहूं की हर बालियां आज सिर्फ एक फसल नहीं बल्कि बदलती जलवायु के खिलाफ भारत की खाद्य सुरक्षा की सबसे बड़ी परीक्षा बनती जा रही हैं।
