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दूसरी शादी की अफवाहों पर मिले टेलिग्राम पर नेहरू ने क्‍या भेजा था जवाब, पढ़ें

देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की 27 मई को पुण्‍यतिथि है।

मेरे दादा एक क्रांतिकारी थे, जिन्‍होंने भगत सिंह के साथ आजादी की लड़ाई लड़ी। 1935 का साल था। मेरे दादा को हर कोई वीरेंद्र या वीर जी के नाम से जानता था। उस वक्‍त वे लाहौर में हमारे परिवार के अखबार प्रताप में काम कर रहे थे, जब वे जवाहर लाल नेहरू के संपर्क में आए। नेहरू उस वक्‍त जर्मन शहर बैडनवाइलर में थे। वे अपनी बीमार पत्‍नी कमला नेहरू का इलाज करा रहे थे।

पत्‍नी की मौत के बाद अगले बरस नेहरू भारत वापस लौटे। इसके बाद मेरे दादा ने उनसे इलाहाबाद स्‍थ‍ित आनंद भवन में मुलाकात की और पंजाब में चुनावी अभियान के लिए मनाया। नेहरू ने तुंरत प्रतिक्रिया दी, ‘नामुमकिन। अगर मैं वहां पूरा महीना भी बिताऊं तो भी कांग्रेस को बहुमत नहीं मिलेगा।’ आखिरकार वे मान गए। नेहरू ने कहा, ‘मैं तुम्‍हें दो दिन दे सकता हूं। लेकिन क्‍या तुम हवाई जहाज का इंतजाम कर सकते हो?’ यह 1936 का वक्‍त था। एक प्‍लेन किराए पर लिया गया। भारत में पहली बार चुनावी कैंपेन में प्‍लेन का इस्‍तेमाल हुआ।

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पिताजी के इलाहाबाद छोड़ते ही उन्‍होंने नेहरू के दोबारा से शादी करने की अफवाहें सुनीं। कोई भी पत्रकार ऐसी खबर को हाथ से जाने नहीं देना चाहता था। इस वजह से मेरे दादा ने हिम्‍मत करते हुए एक टेलिग्राम भेजा, ‘हमारा इलाहाबाद प्रतिनिधि ने हमें जानकारी दी है कि आप जल्‍द ही दोबारा से शादी करने वाले हैं। कृपया पुष्‍ट‍ि करें।’ नेहरू की ओर से जवाब आया, ‘Fantastic nonsense (कमाल की बकवास)।’ पिताजी ने नेहरू के साथ प्रचार किया। पिताजी याद करते थे कि कैसे सियालकोट एयरपोर्ट पर ब्रिटिश लोग ‘उस खादी पहने शख्‍स को देखने के लिए उत्‍सुक थे, जो उनकी सरकार के लिए गंभीर समस्याएं पैदा कर रहा था।’ भारतीयों को उन दिनों एयरपोर्ट में घुसने की इजाजत नहीं थी।

पिताजी जब अगली बार उनसे मिले तो नेहरू को गिरफ्तार किया गया था और उन्‍हें कश्‍मीर की सीमा से महाराजा की सरकार ने वापस भेजा था। नेहरू ने शक्‍त‍ि प्रदर्शन के लिए लाहौर में एक खुली कार में घूमने का फैसला किया। पिताजी उन मुट्ठी भर लोगों में शुमार थे, जिनके पास ऐसी कार थी। वह भी जर्मन कार एडलर, जो वक्‍त बाजार में उपलब्‍ध नहीं थी। पिताजी खुद ड्राइव करके नेहरू को ले गए। पिताजी ने बताया, ‘मेरी कार फूलों से लद गई थी। मैं बहुत नर्वस था क्‍योंकि मैंने गाड़ी चलाना नया-नया ही सीखा था और उत्‍साहित भीड़ को देखकर मैं परेशान था। लेकिन पंडित जी रोमांचित थे। भीड़ उनकी शख्‍सि‍यत को कुछ ऐसे बदलता था, जैसी कि कोई और चीज नहीं।’

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रास्‍ते में शादी की तैयारियों से रोशन एक घर दिखा। नेहरू ने पिताजी से पूछा, ‘वो क्‍या है?’मेरा दादा ने जवाब दिया कि शायद किसी की शादी हो रही है। नेहरू ने कहा, ‘मेरी शादी भी वसंत के महीने में हुई थी।’ इसके बाद, वे पूरी यात्रा के दौरान खामोश रहे। इसके बाद, दोनों कई बार मिले। हर बार मुलाकात का मकसद कोई काम ही नहीं था। एक बार अच्‍छे मौसम में नेहरू ने शिकायत की कि किस तरह से ‘उन लोगों ने मुझे यहां कैद करके रखा है’। नेहरू ने मेरे दादा से कहा कि वे उन्‍हें ताजी हवा खिलाने के लिए ड्राइव पर ले जाएं। अंधेरा था। नेहरू खामोश थे और वे दोनों एक नहर के किनारे घंटों बैठे रहे। जब वे घर लौटे तो नेहरू ने उन्‍हें धन्‍यवाद दिया और कहा, ‘इतने शांतिपूर्ण माहौल में मुझे रिलैक्‍स करने का मौका काफी वक्‍त बाद मिला। नहीं तो लोग मुझे कभी भी अकेले नहीं छोड़ते।’

दुर्भाग्‍य से उनकी बेटी इंदिरा, जिनसे भी मेरे दादा परिचित थे, ने बाद के सालों में प्रेस पर सेंसरशिप लागू की। नेहरू ने हमारे अखबार प्रताप पर सेंसरशिप के खिलाफ ब्रिटिश सरकार से जंग लड़ी। उन्‍होंने मजाक में मेरे दादा से कहा था, ‘वीरेंद्र, तुम बेहद चालाक निकले। तुमने अपनी समस्‍याएं मेरे ऊपर लाद दी हैं।’ इतिहास हर बार वो नहीं होता, जो आप किताबों में पढ़ते हैं। पिताजी की तरह ऐसे बहुत सारे भूले-बिसरे हीरो हैं, जिनके पास अपनी कहानी सुनाने के लिए कोई नहीं है।

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(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

ऑरिजनल सोर्स

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