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आखिर CAA, NRC से क्या है बिहार CM नीतीश कुमार को तकलीफ? समझिए

सवाल यह है कि आखिर सीएए और एनआरसी से नीतीश कुमार को क्या तकलीफ है। आखिर किन वजहों से वह इनके विरोध में आवाज उठा रहे हैं।

Author Edited By मोहित पटना | Updated: January 15, 2020 7:30 PM
बिहार के सीएम नीतीश कुमार (फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस)

बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू अध्यक्ष नीतीश कुमार संशोधित नागिरकता कानून (सीएए) और नेशनल रजिस्ट्रर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) के खिलाफ बगावती सुर अपनाए हुए हैं। नीतीश ने 13 जनवरी को कहा है कि एनआरसी अन्यायपूर्ण है। उन्होंने कहा है कि बिहार में एनआरसी लागू नहीं होने दिया जाएगा। सीएम के इस बयान के साथ जेडीयू एनआरसी का विरोध करने वाली एनडीए के पहली सहयोगी बन गई है। इसके अलावा जेडीयू सीएए के खिलाफ भी मुखर है। नीतीश का कहना है कि सीएए पर संसद में चर्चा होनी चाहिए। सीएए पर उनका बयान ऐसे समय पर आया है जब गृह मंत्री अमित शाह 16 जनवरी को बिहार के वैशाली में सीएए के बारे में लोगों को जागरुक करने के लिए एक जनसभा करने वाले हैं।

अब सवाल यह है कि आखिर सीएए और एनआरसी से नीतीश कुमार को क्या तकलीफ है। आखिर किन वजहों से वह इनके विरोध में आवाज उठा रहे हैं। नीतीश ने सोमवार को विधानसभा को संबोधित करते हुए कहा है कि 2010 में जो नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर यानी एनपीआर हुआ था उस पर राज्य सरकार ने पहले ही सहमति दे दी। लेकिन एनपीआर अपडेशन के लिए कुछ अन्य जानकारियां भी मांगी जा रही है जिसपर सदन में चर्चा होनी चाहिए। हम इस चर्चा में हिस्सा लेने के लिए तैयार हैं।

बता दें कि विपक्ष का कहना है कि एनपीआर पूरे देश में एनआरसी लागू करने की तरफ पहला बड़ा कदम है। नीतीश के सीएए और एनआरसी विरोध की पहली वजह उनका वोट बैंक माना जा सकता है। नीतीश को इस बात का एहसास हो चुका है कि सीएए और एनआरसी उनके उस वोट बैंक को प्रभावित कर सकते हैं जो उनके पाले में रहते हैं। इनमें अति पिछड़ी जाति, महादलित, अल्पसंख्यक समूहों के साथ-साथ मुसलमानों भी शामिल है। इस वजह से कुमार की समावेशी राजनीति उन्हें एनआरसी के खिलाफ खड़ा करती दिखाई देती है।

इस साल बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में जेडीयू किसी भी हाल में अपनी सेक्युलर छवि को कोई नुकसान नहीं पहुंचाना चाहती। नीतीश कुमार के करीबी नेता का कहना है कि हमारे नेता ने हमेशा से एनआरसी के खिलाफ अपना रुख साफ रखा था जो उनकी सेक्यूलर छवि को दर्शाता है। उन्होंने बीते महीने ही यह साफ कर दिया था कि अल्पसंख्यकों को डरने की जरूरत नहीं है।

बिहार में मुस्लिम वोट करीब 17 फीसदी है नीतीश कुमार को इस बात का एहसास है कि अगर बीजेपी के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा जाएगा तो उनके पाले से कुछ हद तक छिटक चुका मुस्लिम वोट बड़े स्तर पर जेडीयू को नहीं मिलेगा। हालांकि यह बात देखने वाली होगी कि नीतीश कब तक सीएए और एनआरसी के खिलाफ अपना विरोधी रवैया जारी रखते हैं।

नीतीश कुमार ने 2005 में सत्ता हासिल करने के बाद 1989 में हुए भागलपुर दंगों की जांच के लिए आयोग के गठन को मंजूरी दी थी। उनसे पहले पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव सत्ता में रहे लेकिन उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया। नीतीश के इस कदम के बाद वह मुस्लिमों के बीच पॉपुलर हुए और उनकी सेक्युलर छवि बनी। हालांकि बीजेपी के साथ गठनबंधन में रहने के चलते वह मुस्लिमों को नाराज करने के मूड में नहीं है इसलिए वह अपनी छवि और जेडीयू के वोट बैंक का ख्याल रखते हुए सीएए और एनआरसी के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।

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