महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर से सियासत तेज हो गई है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के दोनों गुटों के सीनियर नेताओं ने मंगलवार को मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस के साथ देर रात बैठकें की। इन बैठकों ने 85 वर्षीय शरद पवार के अगले कदम को लेकर अटकलों को फिर से हवा दे दी है। क्योंकि दोनों गुट एक साथ अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर जूझ रहे हैं।

इंडियन एक्सप्रेस को पता चला है कि एनसीपी (एसपी) के प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटिल ने पहले दक्षिण मुंबई स्थित शरद पवार के आवास सिल्वर ओक में उनसे मुलाकात की, और फिर शाम को फड़नवीस से मुलाकात की। इसके अलावा, सत्ताधारी एनसीपी के नेता सुनील तटकरे और प्रफुल पटेल ने भी मुख्यमंत्री से मुलाकात की।

बैठकों में शामिल हुए नेताओं और मुख्यमंत्री कार्यालय दोनों ने ही चर्चा के विषय पर कोई टिप्पणी नहीं की। सत्ताधारी एनसीपी और एनसीपी (एसपी) दोनों के सूत्रों ने कहा कि उन्हें एजेंडा की जानकारी नहीं थी।

ये बैठकें ऐसे समय में हो रही हैं जब शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी (शरद पवार) जुलाई 2023 में अजित पवार द्वारा अविभाजित एनसीपी को विभाजित करके भाजपा के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन में शामिल होने के बाद से अपने सबसे बड़े रणनीतिक संकट का सामना कर रही है।

सूत्रों ने इससे पहले इंडियन एक्सप्रेस को बताया था कि एनसीपी (एसपी) के 10 विधायकों में से कम से कम आधे भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में शामिल होने के पक्षधर हैं। उनका तर्क है कि विपक्ष में रहने से उनके निर्वाचन क्षेत्रों के लिए विकास निधि और प्रशासनिक मंजूरी प्राप्त करना लगातार कठिन होता जा रहा है।

जयंत पाटिल ने हाल ही में पार्टी विधायकों को यही बात बताई थी और कहा था कि विधायकों का एक बड़ा वर्ग एनडीए की ओर झुकाव रखता है। हालांकि, शरद पवार अभी तक इस मामले पर चुप हैं और उन्होंने सार्वजनिक रूप से पार्टी की अगली रणनीति के बारे में कोई संकेत नहीं दिया है।

महाराष्ट्र की छह प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में सबसे छोटी पार्टी एनसीपी (एसपी) भले ही विधानसभा में 10 विधायकों और लोकसभा में आठ सांसदों के साथ सबसे छोटी हो, लेकिन इसकी संसदीय शक्ति ऐसे समय में महत्वपूर्ण हो गई है, जब भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए प्रस्तावित परिसीमन विधेयक सहित महत्वपूर्ण विधेयकों से पहले अपनी संख्या बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। पार्टी नेताओं का मानना ​​है कि एनडीए एनसीपी (एसपी) जैसी छोटी पार्टियों से भी समर्थन लेने के लिए तैयार रहेगा।

लेकिन अब यह सियासी हलचल अब सिर्फ शरद पवार गुट तक सीमित नहीं है। दोनों एनसीपी धड़ों के नेताओं का कहना है कि एनसीपी (शरद पवार) ने कांग्रेस में विलय से लेकर एनडीए के साथ जाने तक के विकल्पों पर खुलकर चर्चा की, लेकिन अजित पवार की एनसीपी से सुलह की कोशिश नहीं की। इसके बाद अब सत्तारूढ़ एनसीपी के भीतर भी पार्टी की आगे की रणनीति और सुनेत्रा पवार की नेतृत्व भूमिका को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

मंगलवार रात की बैठकें पूर्व एनसीपी राष्ट्रीय सचिव सच्चिदानंद सिंह द्वारा एक दिन पहले जारी किए गए कानूनी नोटिस के बाद हुईं, जिसमें उन्होंने पार्टी अध्यक्ष के रूप में सुनेत्रा पवार के चुनाव को चुनौती दी थी और संगठनात्मक चुनाव प्रक्रिया में अनियमितताओं का आरोप लगाया था। सोमवार को महाराष्ट्र एनसीपी अध्यक्ष सुनील तटकरे ने नोटिस को “बेबुनियाद” बताते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने जोर देकर कहा कि पार्टी सुनेत्रा पवार के नेतृत्व में एकजुट है और कहा कि एक कोर कमेटी कानूनी प्रतिक्रिया तय करेगी।

लेकिन इस नोटिस ने सत्तारूढ़ एनसीपी के एक वर्ग के भीतर की बेचैनी को भी उजागर कर दिया है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि इसका कारण राज्यसभा सांसद पार्थ पवार के संगठनात्मक मामलों में कथित प्रभाव को लेकर बढ़ती असंतोष है।

जुलाई 2023 में हुए विभाजन के बाद से राजनीतिक परिदृश्य में आए उतार-चढ़ाव को देखते हुए, इन अटकलों ने एक नया मोड़ ले लिया है। इस साल जनवरी में बीएमसी चुनाव परिणामों से पहले और तुरंत बाद, ऐसी व्यापक अटकलें थीं कि एनसीपी के दोनों गुट फिर से एकजुट हो सकते हैं। लेकिन जनवरी के आखिर में अजित पवार के निधन के बाद यह चर्चा थम गई।

पिछले दो हफ्तों में सियासी अटकलों ने फिर जोर पकड़ा। पहले चर्चा चली कि शरद पवार की एनसीपी (एसपी) कांग्रेस में विलय कर सकती है, लेकिन सूत्रों के मुताबिक, राज्य कांग्रेस के भीतर इसका विरोध हुआ। इसके बाद अब चर्चा इस बात की है कि पार्टी का एक धड़ा एनडीए का दामन थाम सकता है।

क्या एनडीए के साथ चले जाएंगे शरद पवार? चुप्पी ने बढ़ाई पार्टी नेताओं में बेचैनी

महाराष्ट्र की राजनीति में इस सवाल की बड़ी चर्चा है कि क्या शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी (एसपी) महा विकास आघाड़ी (एमवीए) के साथ रहेगी या फिर एनडीए के साथ चली जाएगी? इस सवाल को लेकर एनसीपी (एसपी) के भीतर भी बेचैनी है क्योंकि कम से कम आधे विधायकों ने पार्टी नेतृत्व से कहा है कि वे विपक्ष में रहने के बजाय सत्ताधारी गठबंधन के साथ जाना पसंद करेंगे। पढ़ें पूरी खबर।