बीजेपी ने हाल ही में पंजाब में केवल सिंह ढिल्लों को पार्टी का नया अध्यक्ष बनाया। बीजेपी के इस कदम को सिख समुदाय और विशेषकर जाट सिखों को लुभाने की कोशिश माना गया। अपनी नियुक्ति के बाद केवल सिंह ढिल्लों ने सरकार-ए-खालसा का जिक्र किया।

पंजाब बीजेपी ने अपने चंडीगढ़ के दफ्तर में महाराजा रणजीत सिंह की एक बड़ी तस्वीर भी लगाई।

ढिल्लों ने कहा कि बीजेपी महाराजा रणजीत सिंह के सरकार-ए-खालसा और उनके सभी समुदायों के साथ समान व्यवहार करने के मॉडल पर काम करेगी। इससे पता चलता है कि सरकार-ए-खालसा का शब्द आज भी पंजाब की राजनीति में प्रासंगिक है।

सरकार-ए-खालसा क्या है?

इतिहासकार इंदु बंगा बताती हैं कि महाराजा रणजीत सिंह से पहले भी सिख शासक ‘सरकार-ए-खालसा’ शब्द का प्रयोग करते थे। वे कहती हैं, “खालसा संप्रभु शासक होता था, जिसे अक्सर खालसा जी कहा जाता था, जबकि सरकार प्रशासन को दर्शाती थी। इसीलिए इसे ‘सरकार-ए-खालसा’ कहा जाता है।”

इसलिए सरकार-ए-खालसा का मतलब हुआ खालसा की सरकार। इंदु बंगा बताती हैं कि महाराजा रणजीत सिंह ने भी इसी परंपरा का पालन किया और उन्होंने कभी भी औपचारिक रूप से महाराजा की उपाधि नहीं ली जबकि उन्होंने बहुत बड़ा साम्राज्य स्थापित किया।

तिब्बत से लेकर सिंध तक था साम्राज्य

अपनी किताब ‘रणजीत सिंह: पंजाब के महाराजा’ में खुशवंत सिंह लिखते हैं कि महाराजा रणजीत सिंह का साम्राज्य तिब्बत से लेकर सिंध के रेगिस्तान तक और खैबर दर्रे से लेकर सतलुज तक फैला हुआ था। उनकी सेना एशिया की सबसे ताकतवर सेनाओं में गिनी जाती थी और इसमें न केवल स्थानीय बल्कि यूरोपीय अधिकारी और सैनिक भी शामिल थे।

खुशवंत सिंह लिखते हैं, “हजार सालों में यह पहली भारतीय सेना थी जिसने हिंदुस्तान की उत्तर-पश्चिमी सीमाओं से होने वाले आक्रमणों को रोका।” फिर भी, महाराजा रणजीत सिंह बड़ी उपाधियों से दूर ही रहे।

इतिहासकार हरि राम गुप्ता ने अपनी किताब ‘हिस्ट्री ऑफ द सिख्स: द सिख लायन ऑफ लाहौर’ में उल्लेख किया है कि सिख शासक की मुहर पर “अकाल सहाय रणजीत” अंकित था जिसका मतलब है “ईश्वर रणजीत का रक्षक है”।

प्रकाश सिंह बादल भी करते थे इस्तेमाल

इससे पहले शिरोमणि अकाली दल के संस्थापक और पांच बार पंजाब के मुख्यमंत्री रहे प्रकाश सिंह बादल द्वारा भी सरकार-ए-खालसा शब्द का इस्तेमाल किया जाता था। मुख्यमंत्री रहने के दौरान महाराजा रणजीत सिंह की तस्वीर प्रकाश सिंह बादल के दफ्तर में लगी होती थी और वह जनकल्याणकारी योजनाओं को शुरू करते वक्त भी उनके नाम का उल्लेख करते थे।

महाराजा रणजीत सिंह ढिल्लों गोत्र से थे। ढिल्लों जाट सिखों की एक जाति है। बादल भी ढिल्लों गोत्र के थे और मौजूदा बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष भी ढिल्लों गोत्र के ही हैं।

सिख शासन का स्वर्णिम युग

महाराजा रणजीत सिंह के शासन को सिख शासन का स्वर्णिम युग माना जाता था। महाराजा रणजीत सिंह का शासन न केवल अपनी शक्ति के लिए बल्कि उदारता के लिए भी जाना जाता था। लाहौर के फकीर सैयद वहीद-उद-दीन ने लिखा है कि रणजीत सिंह जाति या धर्म की परवाह किए बिना अपनी प्रजा के साथ समान व्यवहार करते थे।

महाराजा रणजीत सिंह नियमित रूप से हरमंदिर साहिब जाते थे लेकिन वे हिंदू मंदिरों और मुस्लिम तीर्थस्थलों का भी दर्शन करते थे। उन्होंने अलग-अलग समुदायों के धार्मिक स्थलों को खुलकर दान दिया और माना जाता है कि उन्होंने 1835 में वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर के गुंबदों पर सोने की परत चढ़ाने के लिए 1,000 किलो से अधिक सोना दान किया था।

बीजेपी क्यों कर रही सरकार-ए-खालसा की बात?

अब सवाल यह है कि बीजेपी सरकार-ए-खालसा की बात क्यों कर रही है। महाराजा रणजीत सिंह और सरकार-ए-खालसा का उल्लेख करके बीजेपी पंजाब की साझी सांस्कृतिक विरासत को सामने लाना चाहती है।

पंजाब में 2020-21 में हुए किसान आंदोलन के दौरान भाजपा को राज्य में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। इसके अलावा सिख समुदाय में कुछ हद तक पार्टी की हिंदुत्ववादी राजनीति को लेकर भी चिंता है। सरकार-ए-खालसा की बात करने से पंजाबियत की भावना को बढ़ावा मिलता है और यह जाति, धर्म और क्षेत्र की दीवारों से ऊपर उठकर पंजाब की सामूहिक पहचान पर जोर देती है।

अमृतपाल सिंह की पार्टी में शामिल होंगे विधायक अयाली

पंजाब के दाखा से बागी अकाली विधायक मनप्रीत सिंह अयाली चंडीगढ़ में खालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह की पार्टी अकाली दल (वारिस पंजाब दे) में शामिल होने वाले हैं। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर।