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अफगान-शांति वार्ता : भारत का क्या कुछ दांव पर

भारत अफगानिस्तान के 31 प्रांतों में 116 उच्च-प्रभाव वाली सामुदायिक विकास परियोजनाओं पर भी काम कर रहा है। इन परियोजनाओं पर सितंबर 2017 में सहमति बनी थी, जिसके अंतर्गत भारत अफगानिस्तान में पानी, कृषि, सिंचाई, नवीकरणीय ऊर्जा, सूक्ष्म जल विद्युत जैसी परियोजनाओं पर दो बिलियन डॉलर की बड़ी रकम खर्च करेगा।

अफगानिस्तान में शांति के प्रयासों में भारत लगातार हाथ बढ़ाता रहा है।

अफगानिस्तान के विरोधी गुटों ने लंबे संघर्ष के बाद बातचीत शुरू की है। दोहा में चल रही इस वार्ता के सकारात्मक नतीजों की ओर भारत और अमेरिका समेत दुनिया के कई देश टकटकी लगाए देख रहे हैं। वार्ता का एक बड़ा नतीजा यह होगा कि अमेरिका और नाटो सैनिकों की करीब 19 साल के बाद अफगानिस्तान से वापसी का रास्ता साफ होगा। अमेरिका के चुनाव में सैनिकों की वापसी बड़ा मुद्दा बन चुका है।

कतर की राजधानी दोहा में बातचीत शुरू हुई है, जहां अफगानिस्तानी तालिबान का राजनीतिक दफ्तर है। अफगान शांति प्रक्रिया पर आयोजित सम्मेलन में भारत भी शरीक हुआ। वहां विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि भारत की अपेक्षा ये है कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल किसी भी हाल में भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

भारत की अफगान नीति के तहत वहां के दोनों पक्षों से कूटनीति संबंध बेहतर रखा जा रहा है। जयशंकर ने दोनों पक्षों को संबोधित करते हुए कहा कि शांति प्रक्रिया अफगानिस्तान के नेतृत्व में होनी चाहिए और उस पर उसी का नियंत्रण रहना चाहिए। अफगानिस्तान की राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान होना चाहिए। बातचीत ऐसी हो जो मानवाधिकार और लोकतंत्र को बढ़ावा देती हो। अफगानिस्तान और तालिबान के बीच यह बातचीत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन की पहल पर हो रही है।

नवंबर में अमेरिका में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले ट्रंप ने कई कूटनीतिक गतिविधियां शुरू की हैं। वह मध्य पूर्व के देशों के साथ इजराइल को करीब ला रहे हैं। शनिवार को अफगानिस्तान की आंतरिक वार्ता की शुरुआत के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो भी मौजूद रहेंगे। इससे पहले दो खाड़ी देशों- बहरीन ने शुक्रवार को तथा संयुक्त अरब अमीरात ने इस महीने की शुरुआत में अमेरिका की मध्यस्थता में इजराइल को मान्यता दी।

इन हालात में अफगान शांति वार्ता को अहम माना जा रहा है। तालिबान और अफगानिस्तान सरकार के बीच वार्ता को अमेरिका का समर्थन हासिल है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ भी इस वार्ता में शामिल होने के लिए दोहा में हैं। राष्ट्रपति ट्रंप पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि वह अमेरिकी सैनिकों को अंतहीन युद्ध से निकालना चाहते हैं और वह इसी वादे के साथ तीन नवंबर को चुनाव में खुद को दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने की मांग भी कर रहे हैं।

इसी साल मार्च में वार्ता शुरू होनी थी, लेकिन सैकड़ों कट्टर तालिबान लड़ाकों और अफगान बंदियों की अदला-बदली के विवादों के कारण यह प्रक्रिया कई बार स्थगित कर दी गई। राष्ट्रीय सुलह परिषद (एचसीएनआर) के प्रमुख अब्दुल्ला अब्दुल्ला भी इस वार्ता में शामिल हैं।

करीब छह महीने की देरी से शांति वार्ता शुरू हो रही है। अफगान और तालिबान के बीच कैदियों की अदला-बदली के बाद यह संभव हो पाया है। तालिबान ने एक हजार अफगान सैनिक रिहा किए तो काबुल ने 5,000 तालिबानी लड़ाके छोड़े हैं। अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी जारी है और वहां नवंबर तक 4,000 से कम सैनिक बचेंगे। ट्रंप को उम्मीद है कि अफगानिस्तान से सैनिकों की वापसी से अमेरिकी मतदाताओं में उनकी लोकप्रियता बढ़ेगी, जो लगभग दो दशकों से चल रहे इस मुद्दे से तंग आ चुके हैं।

शांति वार्ता के रास्ते में अंतिम बाधा फ्रांसीसी और आॅस्ट्रेलियाई नागरिकों और सैनिकों की हत्या में शामिल छह तालिबान कैदियों की रिहाई थी और इस बाधा के हटने के कुछ ही घंटे बाद शांति वार्ता की शुरुआत की घोषणा की गई।

तालिबान ने पुष्टि की कि कैदी दोहा पहुंच गए हैं। इसके बाद तालिबान वहां बातचीत को राजी हुआ।
भारत के बारे में माना जाता है कि वह भी खासी दिलचस्पी रखता है और चाहता है कि दोनों के बीच बातचीत सफल साबित हो। गुरुवार को छह कैदियों के एक अंतिम समूह की रिहाई के बाद तालिबान ने पुष्टि की कि वे भी इस शांति वार्ता में हिस्सा ले रहे हैं।

इस वार्ता को पहले फरवरी में हुए अमेरिका-तालिबान सुरक्षा समझौते के बाद मार्च में शुरू होना था, लेकिन एक विवादास्पद कैदी की अदला-बदली पर असहमतियों और अफगानिस्तान में लगातार हो रही हिंसा के कारण रुकावट आई।

अब दोनों ही पक्ष राजनीतिक सुलह और हिंसा के दशकों लंबे दौर का अंत चाहते हैं जो वर्ष 1979 में सोवियत आक्रमण के साथ शुरू हुआ था।

अब तक अफगान शांति प्रक्रिया में भारत को शामिल नहीं किया गया था। यह पहली बार है कि भारत शामिल हुआ और विदेश मंत्री के तौर पर जयशंकर ने दोनों प्रतिनिधिमंडलों को संबोधित किया। विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी को वार्ता स्थल में दोहा में मौजूद रखा गया है। अफगानिस्तान में क्षमता निर्माण के साथ संसद भवन, स्कूल-कॉलेज से लेकर विश्वविद्यालय, सड़क, विद्युत लाइन, क्रिकेट स्टेडियम जैसी ढांचागत परियोजनाओं के निर्माण में भारत ने अरबों डॉलर का निवेश किया है।

भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक, अफगानिस्तान में करीब 1700 भारतीय मौजूद हैं, जो वहां स्थित बैंकिंग, सुरक्षा और आइटी सेक्टर की कंपनियों के अलावा अस्पतालों में काम करते हैं। भारत वहां के कृषि, विज्ञान, आइटी और शरणार्थी पुनर्वास के कार्यक्रमों में भी सहयोग दे रहा है।

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