तारीख थी 8 फरवरी 2025। अरविंद केजरीवाल टकटकी लगाए न्यूज़ देख रहे थे। चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही थीं। नाराज़ तो नहीं थे, लेकिन राजधानी में मिल रही अप्रत्याशित हार उन्हें परेशान कर रही थी। आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल के लिए यह वह चुनाव था, जिसमें जीत मिल जाती तो शीला दीक्षित का लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का बड़ा रिकॉर्ड टूट जाता। लेकिन राजनीति को कुछ और ही मंज़ूर था।

पिछली विधानसभा में 64 सीटें जीतने वाली आम आदमी पार्टी महज़ 22 सीटों पर सिमट गई। मनीष सिसोदिया और सौरभ भारद्वाज जैसे बड़े चेहरे भी अपना चुनाव हार गए। घड़ी में दोपहर के 2 बजे थे, जब अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली चुनाव में हार स्वीकार कर ली। इसके बाद वह अचानक सार्वजनिक रूप से नज़र नहीं आए।

पार्टी कार्यकर्ताओं के मुताबिक, आम आदमी पार्टी प्रमुख सिर्फ जनता की नज़रों से दूर हुए थे, लेकिन असल में वह आत्ममंथन कर रहे थे। इसी दौरान अटकलें भी तेज़ हो गईं कि दिल्ली हारने के बाद अरविंद केजरीवाल पंजाब की कमान संभाल सकते हैं या फिर राज्यसभा का रास्ता चुनेंगे। हालांकि पार्टी के ही कुछ नेता बताते हैं कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। उस समय अरविंद केजरीवाल पूरी ताकत से काम में जुटे थे।

वे लगातार सभी प्रत्याशियों से मुलाकात कर रहे थे और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को समीक्षा की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी। पार्टी के एक नेता के मुताबिक, उस दौर में वरिष्ठ नेता लगातार केजरीवाल के संपर्क में थे। यही वह समय था, जब उन्होंने कुछ सबसे मुश्किल फैसले लिए। सभी महत्वपूर्ण राज्यों की ज़िम्मेदारी पार्टी के बड़े नेताओं को सौंपी गई।

एक अन्य कार्यकर्ता बताते हैं कि पार्टी के भीतर कुछ नेताओं को लगने लगा था कि चुनावी हार के बाद अरविंद केजरीवाल शायद राजनीति में ज़्यादा समय तक सक्रिय नहीं रहेंगे। लेकिन हकीकत यह थी कि वह एक बिल्कुल अलग रणनीति पर काम कर रहे थे। उनका लक्ष्य आम आदमी पार्टी का विस्तार करना था और भविष्य की लीडरशिप को अभी से तैयार करना था।

इसी रणनीति के तहत अरविंद केजरीवाल ने मनीष सिसोदिया और दिल्ली के पूर्व मंत्री सत्येंद्र जैन को पंजाब की ज़िम्मेदारी सौंपी। खुद केजरीवाल भी लगातार पंजाब जाते-आते रहे। आतिशी को गोवा भेजा गया, गोपाल राय को गुजरात की कमान दी गई, जबकि सौरभ भारद्वाज को दिल्ली में ही रहने को कहा गया।

केजरीवाल की तरफ से साफ निर्देश थे कि पार्टी को नगर निगम से लेकर विधानसभा स्तर तक मज़बूत किया जाए और किसी भी नेता को तब तक दिल्ली का रुख न करने दिया जाए, जब तक पार्टी ऐसा करने को न कहे। हालांकि पंजाब में इस फैसले की वजह से कुछ चुनौतियां भी सामने आईं। वहां यह नैरेटिव गढ़ा गया कि मुख्यमंत्री भगवंत मान रिमोट कंट्रोल सरकार चला रहे हैं।

एक तरफ जहां पंजाब में खुद को मज़बूत करने की कोशिशें जारी थीं, वहीं राजधानी दिल्ली में भी अरविंद केजरीवाल ने पिछले साल जून में पब्लिक अपीयरेंस दी। इसके बाद आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में विपक्ष की भूमिका मज़बूती से निभानी शुरू की। महिलाओं को ₹2500 देने के मुद्दे से लेकर प्रदूषण तक, सरकार को घेरने की कोशिशें तेज़ हुईं। 25 साल की एक लड़के की नाले में गिरने से हुई मौत को भी बड़ा मुद्दा बनाया गया। अरविंद केजरीवाल ने एक कदम आगे बढ़कर इसे हत्या तक करार दिया।

फिलहाल आम आदमी पार्टी के सूत्रों का कहना है कि पार्टी की तीन बड़ी प्राथमिकताएं हैं—पंजाब में वापसी, गोवा में जीत, और गुजरात व उत्तर प्रदेश में संगठन को मज़बूत करना। ये सभी ऐसे राज्य हैं, जहां अगले साल चुनाव होने हैं और दिल्ली हार के बाद यह पार्टी के लिए एक बड़ा लिटमस टेस्ट साबित होंगे।

पार्टी के नेता बताते हैं कि उत्तर प्रदेश और गुजरात पर खास नजर रखी जा रही है। एक कार्यकर्ता के मुताबिक, “अरविंद जी इस वक्त खुद माइक्रो-लेवल मीटिंग्स कर रहे हैं।” उनके अनुसार, दिल्ली की हार के बाद पार्टी को कई अहम सबक मिल चुके हैं।