ताज़ा खबर
 

गुजरे हुए सात साल, क्या रहे अर्थव्यवस्था के हाल

इकॉनोमी के स्वास्थ्य के द्योतक चिह्नों जैसे जीडीपी, प्रतिव्यक्ति जीडीपी, बेरोजगारी, मुद्रास्फीति, वित्तीय घाटा और रुपए की कीमत आदि की स्थितियां कतई अच्छी नहीं

Edited By ajay shukla नई दिल्ली | Updated: May 31, 2021 6:00 PM
पूर्व पीएम डॉ. मनमोहन सिंह, दूसरी तरफ पीएम नरेंद्र मोदी (फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस)

सात साल पहले जब गुजरात के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री के रूप में केंद्रीय सत्ता संभाली थी, जीडीपी के लिहाज से देश की अर्थव्यवस्था राह भटक चली थी। कीमतें चढ़ रही थीं और प्राइवेट निवेशों में ठहराव आ गया था। देश विकास और अच्छे दिनों की आकांक्षा से लबरेज था। चुनाव प्रचार में मोदी ने इन्हीं दो चीजों को देने का वादा किया था।

वादा कितना निभा? इस सवाल का जवाब इतना सपाट नहीं। बहरहाल, देश की जनता ने पहले से भी ज्यादा बहुमत देते हुए 2019 में मोदी का पुनः वरण कर लिया। 1991 के बाद यह पहला मौका था कि कोई पार्टी अपने दम पर सरकार बनाने में सक्षम थी। बीच की सरकारों में कई दल होते आए थे। यह स्थिति आर्थिक विकास में बाधक बन जाती थी। पहले वाले पांच साल मिला कर मोदी को आए अब सात साल हो चुके हैं। सात साल अगर बड़ा कालखंड नहीं तो छोटा कालखंड भी नहीं। आइए देखते हैं कि इस दौरान विकास और अच्छे दिनों की आकांक्षाएं पूरी हुईं।

इस आकलन के लिए हम सबसे पहले कुछ आधारभूत चीजों को देखेंगे। इन चीजों में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी), बेरोजगारी दर, मुद्रास्फीति दर, सरकार का वित्तीय घाटा, अर्थव्यवस्था में बचत और निवेश की दर, डॉलर के बरअक्स रुपए की कीमत, भुगतान संतुलन, गरीबी का स्तर और आर्थिक असमानता आदि शामिल हैं।

जीडीपीः केंद्र सरकार की ओर से बनाई गई छवि के जीडीपी की विकास दर पिछले पांच साल से चिंता का विषय है। मौजूदा वित्त वर्ष के लिए जारी आरबीआइ की रिपोर्ट में दिए चार्ट से कुछ बातें साफ झलकती हैं।

पहली बात तो यह कि वैश्विक आर्थिक संकट के बाद भारत की अर्थव्यवस्था 2013 से ही मजबूत होने लगी थी। यानी मोदी के आने के एक साल पहले से। लेकिन वित्त वर्ष 2016-17 की तीसरी तिमाही में बड़ी तेज़ गिरावट हुई। हालांकि रिजर्व बैंक अपनी रिपोर्ट में इस बात का कोई जिक्र नहीं करता लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इस पतन का कारण नोटबंदी था। नोटबंदी के बाद दूसरा आघात अधकचरे और हड़बड़ी में लगाया गया गुड्स एण्ड सर्विसेज़ से पड़ा। नतीजा यह था कि 2017 में  जीडीपी विकास मदर जो 8 प्रतिशत थी वह वित्त वर्ष 2019-20 में कोविड फैलने के कुछ दिन पहले मात्र चार रह गई थी। जनवरी में यह जीडीपी विकास दर ने 42 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया। तब मोदी ने कहा था कि हमारी अर्थव्यवस्था में आघात सहने की क्षमता बहुत अधिक है। अर्थव्यवस्था शीघ्र ही उछाल लेगी। जीडीपी की यह दशा उस समय थी जब कोविड को वैश्विक महामारी घोषित होना बाकी था।

प्रतिव्यक्ति जीडीपीः अर्थव्यवस्था को समझने में कई बार प्रतिव्यक्ति जीडीपी से बड़ी मदद मिलती है। प्रतिव्यक्ति जीडीपी निकालने के लिए जीडीपी का कुल आबादी से भाग दे दिया जाता है। इससे पता चलता है कि आम आदमी की अर्थव्यवस्था में क्या स्थिति है। यहां भी भारत हार रहा है। अभी आपने पढ़ा ही होगा कि बांग्लादेश जैसा छोटा मुल्क भी हमसे आगे निकल गया है।

बेरोजगारी दरः यह भी माली हालात समझने का मौलिक तरीका है। इस बिंदु पर जो हालत है वह शायद सबसे बुरी। 2017-18 में सरकार ने खुद माना था कि बेरोजगारी ने 45 साल पुराना रिकार्ड छू लिया है। इसी साल जीएसटी लागू हुआ था। नोटबंदी एक साल पहले हो चुकी थी। फिर 2019 में यह खबर आई कि 2012 और 2018 के बीच भारत में रोजगारशुदा लोगों की संख्या में 90 लाख की गिरावट आई है। आजादी के बाद भारत में ऐसा कभी न हुआ था।

बेरोजगारी दर सामान्यतः 2 से 3 प्रतिशत रहती है। लेकिन कोविड फैलने के पहले के कुछ वर्षों में यह दर 6 से 7 प्रतिशत हो गई। कोविड के बाद के हालत तो और भी ज्यादा खराब हो चुके हैं। इसके आंकड़े अभी नहीं हैं लेकिन माना जाता है कि बेरोजगारी ने नए रिकॉर्ड बना डाले हैं। बेरोजगारी की स्थिति में सुधार होने की गुंजाइश फिलहाल नहीं है क्योंकि फिलहाल विकास भी होता नहीं दिख रहा। विकास की गतिविधियों के बढ़ने से ही तो रोजगारों में बढ़ोतरी होती है।

मुद्रा स्फीतिः मोदी सरकार को कार्यकाल के पहले तीन साल में बड़े मजे रहे। मजे का कारण था क्रूड आयल के दामों का बहुत नीचे चले जाना। 2011 से 2014 तक जो तेल 110 डॉलर बैरल बिक रहा था वह 2015 में 85 डॉलर और 2017 में 50 डॉलर पर आ गया। सस्ते तेल के कारण सरकार को खुदरा मुद्रास्फीति पर काबू करने में मदद मिली ही इस कारण से वह ईंधन से अतिरिक्त टैक्स भी जुटा पाई। लेकिन 2019 की अंतिम चौथाई से भारत को ऊंची खुदरा मुद्रास्फीति से जूझना पड़ रहा है। यहां तक कि लॉकडाउन के कारण खत्म हुई मांग भी मुद्रास्फीति को ठीक नहीं कर पाई।

डॉलर बनाम रुपयाः स्थानीय करेंसी का डॉलर के बरअक्स मजबूत होना अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य का परिचायक होता है। जिस समय मोदी सरकार सत्ता में आई एक डॉलर की कीमत 59 रुपए हुआ करती थी। सात साल बाद यह 73 हो गई है। रुपए की सापेक्ष कीमत भारतीय मुद्रा की क्रय शक्ति में आई कमी का परिचायक है।

वित्तीय घाटाः वित्तीय घाटा बताता है कि सरकार की माली हालत कितनी मजबूत है। इससे यह भी पता चलता है कि अपने खर्च पूरा करने के लिए सरकार को बाजार से कितना कर्ज लेना पड़ रहा है। अत्यधिक कर्ज लेने के दो नुकसान होते हैं। पहला, इससे प्राइवे कारोबारियों के लिए उपलब्ध निवेश योग्य फंड्स की कमी हो जाती है। इससे इन कर्जों का मूल्य भी चढ़ जाता है। दूसरी बुराई यह कि ज्यादा कर्ज लेने से सरकार के चुकाने के लिए कुल ऋण बढ़ जाता है।

ऊपरी तौर पर देखने से लगता है कि भारत का वित्तीय घाटा सामान्य से बस जरा सा ज्यादा है लेकिन सच्चाई यह है कि यह बात भी ओपेन सीक्रेट थी कि वित्तीय घाटा जो दिखाई पड़ रहा है उससे बहुत ज्यादा है। अभी बजट ने सरकार ने खुद माना था कि वित्तीय घाटा कम करके दिखाया जाता रहा है, जीडीपी के दो प्रतिशत के बराबर।

 

Next Stories
1 राहुल ने कहा- जीरो वैक्सीन नीति भारत माता के सीने में चुभा रही खंजर, उधर सिसोदिया बोले- संकट के समय हो रहा था पोल मैनेजमेंट
2 अब क्या करेगी सरकार?- पत्रकार ने पूछा, हंसते हुए केंद्रीय मंत्री का तंज- आपके साथ चैनल पर बातचीत में तय नहीं होता है…मुझ पर छोड़ दें
3 राज्य बनाम केंद्रः क्या हैं सिविल सर्विस अफसरों के लिए सेंट्रल डेपुटेशन के नियम ?
ये पढ़ा क्या?
X